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डेरा प्रमुख को 21 दिन की फरलो मिलने से गहराया विवाद, अंशुल छत्रपति ने सरकारी तंत्र की नीयत पर दागे तीखे सवालहरियाणा
26 अग॰ 2026, 8:29 pm (1 घंटे पहले)· 3

डेरा प्रमुख को 21 दिन की फरलो मिलने से गहराया विवाद, अंशुल छत्रपति ने सरकारी तंत्र की नीयत पर दागे तीखे सवाल

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 21 दिनों की नई फरलो मिलने के बाद हरियाणा में कानूनी और राजनीतिक बहस छिड़ गई है। शहीद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के पुत्र अंशुल छत्रपति ने इस रिहाई को लेकर शासन और न्याय प्रणाली की भूमिका पर सख्त ऐतराज जताया है।

हरियाणा के रोहतक में स्थित सुनारिया जेल के दरवाजे एक बार फिर खोल दिए गए हैं और साध्वियों के यौन शोषण सहित कई गंभीर जुर्मों के लिए 20 साल की बामशक्कत जेल काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह बाहर आ चुके हैं। जेल प्रशासन द्वारा 21 दिनों की फरलो स्वीकृत किए जाने के तुरंत बाद वे कई गाड़ियों के काफिले में सवार होकर सिरसा में बने अपने आश्रम की तरफ निकल गए। उनकी इस नई रिहाई की खबर से हरियाणा के राजनीतिक और विधिक हलकों में एक बार फिर गर्माहट पैदा हो गई है। बार-बार दी जा रही इस रियायत के बाद यह सवाल जोर पकड़ने लगा है कि क्या देश का संविधान और कानूनी संहिताएं आम जनता और ताकतवर रसूखदारों के लिए दो अलग-अलग पैमानों पर काम करती हैं।

आदतन अपराधियों को राहत देने की कार्यप्रणाली पर सवाल

इस फैसले के सामने आते ही शहीद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के पुत्र अंशुल छत्रपति ने बेहद व्यथित और आक्रामक अंदाज में प्रशासनिक व्यवस्था के दोहरे मापदंडों पर सवाल खड़े किए हैं। अंशुल छत्रपति ने गंभीर ऐतराज जताते हुए कहा कि जो व्यक्ति पहले से ही संगीन जुर्म में सजा पा चुका है और जिसके विरुद्ध हत्या से जुड़े कई संवेदनशील मामले विभिन्न अदालतों के समक्ष विचाराधीन हैं, उसे बार-बार पैरोल या फरलो सौंपना न्याय प्रणाली के साथ मजाक जैसा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आदतन अपराधियों को इस प्रकार बार-बार छूट प्रदान करने से पूरी कानूनी प्रक्रिया का इकबाल कमजोर पड़ता है और जनता के बीच गलत संदेश जाता है।

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चुनावी फायदे और वोट बैंक के लिए सत्ता की मेहरबानी

प्रशासनिक नीयत पर कड़ा हमला बोलते हुए अंशुल छत्रपति ने इसे राजनीतिक संरक्षण का नतीजा करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में सत्ता में चाहे कोई भी दल बैठा हो, हर दौर के हुक्मरानों ने चुनावी लाभ और वोट बैंक के समीकरणों को साधने की खातिर इस मुजरिम पर निरंतर मेहरबानी दिखाई है। जब-जब चुनाव करीब आते हैं या सियासी आवश्यकता महसूस होती है, तब-तब जेल के फाटक अचानक खोल दिए जाते हैं। इस तरह के कदमों से यह स्पष्ट होता है कि शासन व्यवस्था के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों और कानून के शासन से ऊपर राजनीतिक जरूरतें बन चुकी हैं।

सरकारी तंत्र का भ्रम और उच्च न्यायपालिका का संज्ञान

सिस्टम की खामोशी की आलोचना करते हुए अंशुल छत्रपति ने कहा कि आम जनता को अपने प्रश्न पीड़ित परिजनों से पूछने के स्थान पर सीधे प्रदेश के मुख्यमंत्री और समूचे प्रशासनिक ढांचे से करने चाहिए। सरकारी तंत्र जिस प्रकार का भ्रम तथा असत्य फैलाकर इस छूट को सही ठहराने का प्रयास करता है, उससे अदालतों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है। उन्होंने मांग की कि देश के उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च अदालत को इस समूचे मामले का स्वतः संज्ञान लेना चाहिए, ताकि विधिक खामियों को दूर किया जा सके और आम नागरिकों का देश की न्याय व्यवस्था पर विश्वास कायम रहे।

सवाल-जवाब

गुरमीत राम रहीम सिंह को इस बार जेल से कितने दिनों की रिहाई मिली है?
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को रोहतक की सुनारिया जेल से 21 दिनों की नई फरलो मंजूर हुई है।
जेल से बाहर आने के बाद गुरमीत राम रहीम कहां गया है?
रिहाई के तुरंत बाद गाड़ियों के काफिले के साथ गुरमीत राम रहीम सिंह सिरसा स्थित अपने आश्रम चला गया है।
अंशुल छत्रपति कौन हैं और उन्होंने इस रिहाई पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
अंशुल छत्रपति शहीद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे हैं, जिन्होंने बार-बार फरलो दिए जाने को न्याय प्रणाली का मजाक और राजनीतिक मेहरबानी बताया है।
राम रहीम किस मामले में और कितनी सजा काट रहा है?
गुरमीत राम रहीम साध्वियों के यौन शोषण और जघन्य अपराधों के मामले में 20 साल की कठोर कैद की सजा काट रहा है।
अंशुल छत्रपति के अनुसार इस मामले में उच्च न्यायपालिका को क्या करना चाहिए?
उनका मानना है कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च अदालत को सरकारी तंत्र द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम और प्रशासनिक खामियों पर तुरंत कड़ा संज्ञान लेना चाहिए।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·14 मिनट पहले

डेरा प्रमुख को बार-बार मिल रही यह रियायत इस बात की ओर इशारा करती है कि कैसे प्रशासनिक और कानूनी प्रावधानों के बीच की कमजोरियों का राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यदि अदालतों और जेल नियमावली के मौजूदा प्रावधानों की सख्त समीक्षा नहीं की गई, तो यह प्रवृत्ति न्याय व्यवस्था में आम जनता के विश्वास को गंभीर रूप से ठेस पहुँचा सकती है। आगामी दिनों में इस तरह के मामलों पर न्यायिक संज्ञान और बढ़ सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·13 मिनट पहले

यह मामला केवल एक व्यक्ति की रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जेल नियमावली और प्रशासनिक मशीनरी की उस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है जहाँ कानूनी प्रावधानों की व्याख्या राजनीतिक सुविधानुसार की जाती है। यदि जेल मैनुअल में पैरोल और फरलो के नियमों को अधिक पारदर्शी और कठोर नहीं बनाया गया, तो क्षेत्रीय चुनावों और राजनीतिक समीकरणों के समय ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति से विधिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा कमजोर होगा। आने वाले समय में यह स्थिति न्यायिक निगरानी और जनहित याचिकाओं के नए दौर को जन्म दे सकती है।

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