आजकल की तेज रफ्तार जिंदगी, पढ़ाई का बढ़ता बोझ और डिजिटल उपकरणों की लत किशोरों के मानसिक संतुलन पर गहरा प्रभाव डाल रही है। देर रात तक स्मार्टफोन का उपयोग करना, सुबह जल्दी उठकर विद्यालय जाने की आपाधापी, परीक्षाओं की चिंता और दिन भर स्क्रीन के सामने समय गंवाना अब युवाओं की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। यह अस्त-व्यस्त जीवनशैली न सिर्फ उनकी नींद में बाधा डालती है बल्कि दिमागी सेहत और शैक्षणिक प्रदर्शन को भी बुरी तरह प्रभावित कर रही है। अंबाला शहर स्थित मुख्य नागरिक चिकित्सालय के होम्योपैथिक अनुभाग की ओपीडी में मानसिक तनाव, अनिद्रा और अवसाद से परेशान मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी देखी जा रही है। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी घटना या परेशानी के विषय में बार-बार सोचते रहना इंसान के दिमागी स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाता है।
अत्यधिक सोच और डिप्रेशन के विभिन्न पहलू
अंबाला के सरकारी चिकित्सालय में अपनी सेवाएं दे रहीं होम्योपैथी विशेषज्ञ डॉ. रजिता के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी बीते वाकये या समस्या के बारे में अनवरत विचार करता है तो मस्तिष्क पर अत्यधिक दबाव बनता है। यही स्थिति समय बीतने के साथ मानसिक अशांति और तनाव का रूप धारण कर लेती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि डिप्रेशन का एकमात्र कारण अत्यधिक सोचना ही नहीं है। इसके पीछे घरेलू परिस्थितियां, दीर्घकालिक मानसिक दबाव, आनुवंशिक कारक तथा अन्य कई मनोवैज्ञानिक वजहें भी उत्तरदायी हो सकती हैं। स्वास्थ्य के संदर्भ में पर्याप्त विश्राम न मिलने का दुष्परिणाम भी सामने आया है। कानपुर के एक हृदय रोग विशेषज्ञ द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक रोजाना 7 घंटे से कम नींद लेने वाले व्यक्तियों को दिल का दौरा पड़ने की संभावना काफी अधिक रहती है।
वर्षा और कड़कती बिजली का दृष्टांत: सकारात्मक दृष्टिकोण का महत्व
डॉ. रजिता ने एक प्रेरक वाकये का उल्लेख करते हुए बताया कि एक समय जब भारी बारिश हो रही थी, तब एक मां अपने बच्चे के विद्यालय से घर वापस आने को लेकर बहुत चिंतित हो उठी। तेज वर्षा को देखकर वह लगातार यही मान बैठी कि उसका बालक राह में किसी परेशानी में फंस गया होगा। घबराहट में जब वह अपने बेटे तक पहुंची तो उसने देखा कि बच्चा एकदम प्रसन्न और उल्लसित था। बालक ने अपनी माता से कहा कि वह बारिश से जरा भी परेशान नहीं है, बल्कि आकाश में चमकती बिजली को देखकर उसे लग रहा है कि ईश्वर अलग-अलग भंगिमाओं में उसकी फोटो खींच रहे हैं। होम्योपैथिक चिकित्सक के मतानुसार, इस दृष्टांत से हमें यह सीख मिलती है कि विकट परिस्थिति उत्पन्न होने पर नकारात्मक आशंकाओं में घिरने के स्थान पर धैर्य और सकारात्मक सोच के साथ स्थिति का सामना करना चाहिए।
किशोरों और बच्चों में दिमागी तनाव पैदा करने वाले कारक
वर्तमान दौर में कम उम्र के बच्चों और युवाओं में मानसिक अस्वस्थता फैलने के अनेक कारण हैं। डॉ. रजिता के मुताबिक पारिवारिक माहौल में अशांति, माता-पिता के मध्य होने वाले झगड़े, अध्ययन और परीक्षा का अत्यधिक दबाव, स्कूल में सहपाठियों द्वारा प्रताड़ित किया जाना या बुलिंग, अतीत की किसी दुखद घटना का आघात और खानदान में पहले से चली आ रही मानसिक बीमारियों का रिकॉर्ड इसके मुख्य कारण हो सकते हैं। जब कोई बच्चा इन विकट स्थितियों से अकेले गुजरता है तो वह धीरे-धीरे मानसिक रूप से कमजोर होने लगता है।
इन लक्षणों को सामान्य समझकर अनदेखा न करें
मनोचिकित्सा के जानकारों का कहना है कि यदि किसी बालक में निरंतर उदासी छाई रहे, उसकी पढ़ाई अथवा मनपसंद खेलकूद व रचनात्मक कार्यों में दिलचस्पी खत्म होने लगे, सोने की दिनचर्या में बदलाव आ जाए, बहुत अधिक चिड़चिड़ापन दिखाई दे या फिर स्वयं को चोट पहुंचाने वाले विचार मन में आएं, तो अभिभावकों को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। इन संकेतों को महज "अधिक सोचने की आदत" मानकर टाल देना बच्चे के जीवन के लिए जोखिम भरा हो सकता है। ऐसे मामलों में बिना देर किए किसी कुशल एवं अनुभवी मानसिक रोग विशेषज्ञ से परामर्श एवं चिकित्सकीय जांच प्राप्त करना अनिवार्य है।
तनाव प्रबंधन के व्यावहारिक तरीके और योग
मानसिक संताप को दूर करने और चित्त को शांत रखने के लिए डॉ. रजिता ने कुछ बेहद उपयोगी परामर्श दिए हैं। यदि कुटुंब में कोई समस्या खड़ी हो जाए तो किसी एक सदस्य द्वारा अकेले घुटने के बजाय सभी परिजनों को एक साथ बैठकर विचार-विमर्श करना चाहिए। अपनी समस्या को किसी विश्वसनीय मित्र या सगे-संबंधी के समक्ष व्यक्त करने से भी मन हल्का हो जाता है। यदि मानसिक तनाव लंबे समय तक बरकरार रहे तो चिकित्सकीय परामर्श लेना आवश्यक है। इसके साथ ही नियमित योग भी मन को स्थिर करने में सहायक होता है। बालासन का अभ्यास, सेतुबंधासन posture, शवासन तथा भ्रामरी श्वास क्रिया दिमाग को शांत करने और तनाव का स्तर घटाने में विशेष रूप से असरदार साबित होती हैं।



















