देश भर में मौसमी बीमारियों के बीच H1N1 स्वाइन फ्लू इंफ्लूएंजा का प्रकोप चिंताजनक रूप लेता दिख रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में स्वाइन फ्लू के मरीजों की संख्या में अचानक इजाफा दर्ज किया गया है, जिसने स्वास्थ्य तंत्र की सतर्कता बढ़ा दी है। इस स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने एक अहम उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक बुलाई। इस बैठक में उन्होंने देश भर के अस्पतालों में स्वाइन फ्लू से निपटने के लिए की गई तैयारियों की विस्तार से समीक्षा की। विशेष रूप से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हालात अधिक गंभीर बने हुए हैं, जहां पिछले कुछ ही दिनों में 1,700 से अधिक स्वाइन फ्लू के मामले दर्ज किए गए हैं। इस भयावह आंकड़े के मद्देनजर दिल्ली सरकार को स्थिति को नियंत्रित करने के लिए तुरंत प्रभावी कदम उठाने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय की आपातकालीन समीक्षा और अस्पतालों को निर्देश
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने देश में इन्फ्लूएंजा की मौजूदा स्थिति की समीक्षा करते हुए निगरानी तंत्र को मजबूत करने पर जोर दिया है। बैठक के दौरान देश भर में इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारियों (ILI) और गंभीर तीव्र श्वसन संक्रमण (SARI) के रुझानों, टेस्ट की गति, प्रयोगशाला निगरानी और मौसमी इन्फ्लूएंजा के मरीजों के इलाज के लिए अस्पतालों की तैयारियों का जायजा लिया गया। स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अस्पतालों को बिस्तरों, आवश्यक दवाओं, ऑक्सीजन आपूर्ति और वेंटिलेटर की उपलब्धता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है, ताकि यदि मामलों में और वृद्धि होती है तो मरीजों को समय पर उचित इलाज मिल सके।
H1N1 स्वाइन फ्लू क्या है और इसका इतिहास
H1N1 इंफ्लूएंजा को आमतौर पर स्वाइन फ्लू के नाम से जाना जाता है क्योंकि शुरुआत में यह वायरस सुअरों में पाया जाता था। हालांकि, वर्ष 2009-10 के दौरान इस वायरस में बदलाव आया और यह इंसानों के बीच फैलने लगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने वर्ष 2009 में H1N1 फ्लू को वैश्विक महामारी घोषित किया था। उस दौरान इस खतरनाक वायरस के संक्रमण की वजह से दुनिया भर में 2,84,400 लोगों की मृत्यु हो गई थी। स्थिति पर नियंत्रण पाने के बाद अगस्त 2010 में WHO ने महामारी के समाप्त होने की आधिकारिक घोषणा की थी। महामारी खत्म होने के बावजूद, H1N1 फ्लू का यह स्ट्रेन पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ, बल्कि यह हर साल फैलने वाले मौसमी फ्लू के वायरस स्ट्रेन में शामिल हो गया। आमतौर पर इससे पीड़ित मरीज सही देखभाल से अपने आप ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह जटिल रूप धारण कर लेता है जो जानलेवा साबित हो सकता है।
वायरस के फैलने का तरीका और शरीर पर इसका जैविक हमला
स्वाइन फ्लू टाइप-A इन्फ्लुएंजा वायरस के संक्रमण के कारण होता है। इसके फैलने का तरीका कोविड-19 या सामान्य सर्दी-जुकाम जैसा ही है। जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है, तो हवा में ड्रॉपलेट्स फैल जाते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि कोई व्यक्ति किसी दूषित सतह को छूने के बाद अपनी नाक, आंख या मुंह को छूता है, तो यह वायरस आसानी से शरीर के भीतर प्रवेश कर जाता है।
मायो क्लीनिक के अनुसार, सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश करने के बाद H1N1 इंफ्लूएंजा वायरस नाक, गले और फेफड़ों की एपिथेलियल कोशिकाओं की सतह पर मौजूद सियालिक एसिड के साथ जुड़ जाता है। कोशिका के अंदर पहुंचते ही यह वायरस अपने आरएनए (RNA) को तेजी से गुणित करने लगता है और स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करने लगता है। इसके जवाब में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम सक्रिय हो जाता है और भारी मात्रा में साइटोकाइन्स नामक प्रोटीन जारी करता है। साइटोकाइन्स की अत्यधिक रिहाई से श्वसन झिल्ली में गंभीर सूजन पैदा होती है, जिससे फेफड़ों में तरल पदार्थ भरने लगता है। फेफड़ों में पानी भरने के कारण शरीर में ऑक्सीजन का आदान-प्रदान बाधित होता है, जिसके परिणामस्वरूप मरीज को निमोनिया या सांस लेने में अत्यंत गंभीर तकलीफ जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है।
स्वाइन फ्लू के प्रमुख लक्षण और पहचान
H1N1 स्वाइन फ्लू के लक्षण सामान्य मौसमी फ्लू से काफी मिलते-जुलते हैं, लेकिन ये बहुत अचानक और तीव्र गति से उभरते हैं। इस बीमारी के मुख्य लक्षणों में शामिल हैं
- अचानक बहुत तेज बुखार आना और ठंड लगना
- लगातार सूखी या बलगम वाली खांसी होना
- गले में तेज दर्द, खराश या निगलने में परेशानी होना
- सिरदर्द और मांसपेशियों तथा जोड़ों में तेज ऐंठन
- अत्यधिक शारीरिक थकान और कमजोरी महसूस होना
- नाक बहना या नाक बंद होना
वयस्कों के अलावा बच्चों में इसके लक्षण थोड़े भिन्न हो सकते हैं। कुछ मरीजों और विशेषकर छोटे बच्चों में श्वसन संबंधी समस्याओं के साथ-साथ उल्टी और दस्त जैसी पाचन संबंधी तकलीफें भी देखी जा सकती हैं।
कब जरूरी है तत्काल डॉक्टरी परामर्श और आपातकालीन लक्षण
यदि कोई व्यक्ति पूरी तरह से स्वस्थ है और उसमें फ्लू के हल्के लक्षण दिखते हैं, तो उसे तुरंत अस्पताल भागने की आवश्यकता नहीं होती है। हालांकि, उच्च जोखिम वाले समूहों जैसे कि गर्भवती महिलाओं, सांस की बीमारी, अस्थमा, डायबिटीज या हृदय रोग से पीड़ित मरीजों को लक्षण दिखते ही बिना किसी देरी के डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।
वयस्कों में यदि निम्नलिखित में से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो इसे आपातकालीन स्थिति मानकर तुरंत अस्पताल जाना चाहिए
- सांस लेने में अत्यधिक तकलीफ या सांस फूलना
- छाती में लगातार दर्द या दबाव महसूस होना
- लगातार चक्कर आना या मानसिक भ्रम होना
- दौरे पड़ना या मिर्गी जैसी स्थिति बनना
- पेशाब बंद होना या बहुत कम आना
- अत्यधिक कमजोरी जिसके कारण मरीज उठ न सके
बच्चों के मामले में माता-पिता को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए। यदि बच्चे को सांस लेने में कठिनाई हो रही हो, उसकी त्वचा, होंठ या नाखूनों का रंग पीला, भूरा या नीला पड़ने लगे, सीने में दर्द की शिकायत हो, शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) के लक्षण दिखें या मांसपेशियों में असहनीय दर्द हो, तो तुरंत आपातकालीन डॉक्टरी इलाज उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
स्वाइन फ्लू से बचाव के प्रभावी उपाय और टीकाकरण की रणनीति
स्वाइन फ्लू से सुरक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम H1N1 वैक्सीन है। 6 महीने या उससे अधिक उम्र के सभी लोगों को यह वैक्सीन लगवाने की सलाह दी जाती है। यदि वैक्सीन लगवाने के बाद भी व्यक्ति संक्रमित होता है, तो बीमारी का रूप गंभीर नहीं होता और मरीज के अस्पताल में भर्ती होने का जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है। हालांकि, चिकित्सा दिशा-निर्देशों के अनुसार, यह वैक्सीन 50 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) वाले लोगों और अस्थमा से पीड़ित बच्चों को नहीं लगानी चाहिए।
टीकाकरण के अलावा दैनिक जीवन में निम्नलिखित व्यक्तिगत स्वच्छता और व्यावहारिक सावधानियां बरतनी चाहिए
- अपने हाथों को नियमित रूप से कम से कम 20 सेकंड तक साबुन और पानी से धोएं या 60% अल्कोहल वाले सैनिटाइज़र का उपयोग करें।
- खांसते या छींकते समय अपने मुंह और नाक को टिशू या कोहनी से अच्छी तरह ढकें।
- अपने हाथ से चेहरे, आंखों, नाक और मुंह को बार-बार छूने से बचें।
- दरवाजे के हैंडल, स्विच और मोबाइल फोन जैसी बार-बार छुई जाने वाली सतहों को नियमित रूप से डिसइन्फेक्ट करें।
- बीमार व्यक्तियों से सुरक्षित दूरी बनाए रखें और स्वयं लक्षण महसूस होने पर घर पर ही आइसोलेट रहें।
- स्वाइन फार्म (सुअर बाड़ों) या पशु मेलों में जाने से बचें जहां संक्रमण का जोखिम अधिक होता है।



















