दैनिक जीवन की भागदौड़ में किसी चाबी को रखकर भूल जाना, किसी परिचित व्यक्ति का नाम अचानक याद न आना या कोई जरूरी काम दिमाग से निकल जाना बेहद आम बात है। अधिकतर लोग इसे उम्र बढ़ने का स्वाभाविक नतीजा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि, जब यह भूलने की आदत बार-बार होने लगे और आपकी सामान्य जीवनशैली में बाधा डालने लगे, तो इसे केवल एक साधारण बात मानकर छोड़ देना जोखिम भरा हो सकता है। यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि हर तरह की भूलने की समस्या अल्जाइमर या डिमेंशिया नहीं होती, बल्कि इसके पीछे कई अन्य कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। हमारी रोजमर्रा की आदतें जैसे पर्याप्त नींद न लेना, मोबाइल फोन और एआई पर अत्यधिक निर्भर रहना भी मानसिक क्षमता पर सीधा प्रभाव डालती हैं। मस्तिष्क को लंबे समय तक क्रियाशील और सेहतमंद रखने के लिए किन आदतों को अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए और परिवार के सदस्य किन शुरुआती लक्षणों से किसी गंभीर समस्या को पहचान सकते हैं, इन सभी विषयों पर फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. संजय पांडे ने महत्वपूर्ण चिकित्सकीय दृष्टिकोण साझा किया है।
साधारण भूल और अल्जाइमर के बीच अंतर
अमृता हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. संजय पांडे का कहना है कि भूलने की समस्या किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है। यदि यह समस्या आपकी रोजमर्रा की गतिविधियों को बाधित नहीं कर रही है, तो तुरंत घबराने की आवश्यकता नहीं है। कई बार जब हम कोई सामान कहीं रखकर भूल जाते हैं या चाबी ढूंढनी पड़ती है, तो यह दिमाग की किसी बीमारी के कारण नहीं बल्कि केवल ध्यान भटकने यानी अटेंशन में कमी की वजह से होता है।
हालांकि, जब स्थिति यह बनने लगे कि घर के लोग बार-बार एक ही सवाल दोहराने की शिकायत करें, व्यक्ति अपने ही किसी जानने वाले को सामने देखकर भी न पहचान पाए, या फिर जाना-पहचाना रास्ता भूलने लगे, तो इसे सतर्क होने का संकेत माना जाना चाहिए। ऐसे लक्षण साधारण ध्यान भटकने की सीमा से बाहर होते हैं और इनके लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है।
उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त में बदलाव की सच्चाई
बुढ़ापे के साथ याददाश्त का पूरी तरह खत्म हो जाना एक गलत धारणा है। डॉ. संजय पांडे के अनुसार, अगर कोई बुजुर्ग व्यक्ति अपने दैनिक कार्य खुद कर रहा है, लोगों को पहचान रहा है और अपनी दिनचर्या सुचारू रूप से चला रहा है, तो कभी-कभार कुछ भूल जाने को बीमारी नहीं कहा जा सकता। उम्र बढ़ने पर मस्तिष्क का रिस्पॉन्स टाइम यानी प्रतिक्रिया देने की गति थोड़ी धीमी जरूर हो सकती है, लेकिन याददाश्त पूरी तरह नष्ट नहीं होती।
डॉ. संजय पांडे बताते हैं कि 94 और 95 वर्ष की आयु में भी कई बुजुर्ग मानसिक रूप से पूरी तरह से स्वस्थ और सजग पाए जाते हैं। समस्या तब मानी जाती है जब कोई व्यक्ति साधारण जोड़-घटाव भूलने लगे, रुपयों का लेन-देन या हिसाब न कर पाए, अथवा अपनी रोजमर्रा की वस्तुओं को व्यवस्थित रखने में असमर्थ होने लगे। ऐसी स्थिति में याददाश्त की न्यूरोलॉजिकल जांच कराना जरूरी हो जाता है।
अधूरी नींद और मस्तिष्क स्वास्थ्य का संबंध
पर्याप्त और गहरी नींद का मस्तिष्क के कामकाज से सीधा और गहरा संबंध होता है। यदि रात में नींद पूरी न हो, तो अगले दिन एकाग्रता के स्तर में भारी गिरावट आती है। लंबे समय तक नींद की कमी रहने से सोचने-समझने और याद रखने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है।
डॉ. संजय पांडे के अनुभव के अनुसार, डिमेंशिया के कई मरीजों में बीमारी के शुरुआती लक्षणों के रूप में नींद न आने की समस्या ही सबसे पहले देखी जाती है। ऐसे मामलों में कई लोग बिना डॉक्टरी परामर्श के नींद की दवाइयां खाना शुरू कर देते हैं, जिससे स्थिति सुधरने के बजाय और अधिक गंभीर हो सकती है। यदि नींद न आने की समस्या लगातार बनी रहे, तो इसे नजरअंदाज न करके तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।
डिजिटल निर्भरता और एआई का दिमाग पर असर
आधुनिक दौर में मोबाइल, कैलकुलेटर और एआई पर बढ़ती निर्भरता हमारे दिमाग के स्वाभाविक इस्तेमाल को सीमित कर रही है। पहले समय में लोग छोटे-बड़े हिसाब अपने दिमाग में ही कर लिया करते थे, लेकिन आज बेहद आसान गणनाओं, जैसे 5 प्लस 5 के लिए भी लोग फोन का कैलकुलेटर इस्तेमाल करने लगे हैं।
स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों पर यह अति-निर्भरता हमारी मानसिक क्षमता और गणना करने की ताकत को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है। जब हम अपने दिमाग से सोचने और याद रखने का अभ्यास छीन लेते हैं, तो आने वाले समय में मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर इसका प्रतिकूल प्रभाव दिखना स्वाभाविक है।
सही दिनचर्या और ब्रेन हार्मोन्स की भूमिका
मस्तिष्क को लंबे समय तक सेहतमंद रखने के लिए अनुशासित दिनचर्या का होना सबसे अनिवार्य कारक है। आजकल अनियंत्रित जीवनशैली, देर रात तक जागने और अनियमित ट्रैवल शेड्यूल के कारण शरीर की जैविक घड़ी यानी बायोलॉजिकल क्लॉक प्रभावित हो रही है।
शरीर की पूरी बायोलॉजी हमारी दिनचर्या से जुड़ी होती है। ठीक उसी तरह जैसे भोजन करने के बाद शरीर में इंसुलिन रिलीज होता है, सही समय पर सोने से मस्तिष्क में कई महत्वपूर्ण हार्मोन्स का स्राव होता है। याददाश्त से जुड़े हार्मोन्स और डोपामाइन का सही स्तर बनाए रखने के लिए सही समय पर सोना और जागना बेहद जरूरी है। यदि दिनचर्या नियमित रहेगी, तो मस्तिष्क का फंक्शन भी लंबे समय तक बेहतर स्थिति में बना रहेगा।
परिवार के लिए चेतावनी भरे शुरुआती संकेत
परिवार के सदस्यों को अपने बुजुर्गों या परिजनों के व्यवहार में आ रहे सूक्ष्म बदलावों पर नजर रखनी चाहिए। यदि परिवार का कोई सदस्य बार-बार एक ही बात पूछ रहा हो, दैनिक खर्चों या रुपयों का साधारण हिसाब न कर पा रहा हो, या परिचित रास्तों पर भटक रहा हो, तो इन संकेतों को केवल बुढ़ापे की साधारण बात मानकर टालना नहीं चाहिए।
डॉ. संजय पांडे का कहना है कि हर भूलने की वजह डिमेंशिया ही हो ऐसा जरूरी नहीं है। इसके पीछे कई अन्य शारीरिक या मानसिक कारण भी हो सकते हैं, इसलिए शुरुआती लक्षण दिखते ही कारण की पहचान करना आवश्यक है।
न्यूरोलॉजिस्ट से परामर्श और विटामिन B12 की भूमिका
यदि परिजनों को लगे कि किसी व्यक्ति की याददाश्त में लगातार गिरावट आ रही है, तो समय गंवाए बिना न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए। शुरुआती चरण में जांच होने से समस्या के वास्तविक कारण का सटीक पता लगाया जा सकता है।
कई मामलों में याददाश्त में कमी की वजह कोई गंभीर बीमारी न होकर शरीर में पोषक तत्वों की कमी होती है। उदाहरण के लिए, शरीर में विटामिन B12 की कमी भी याददाश्त कमजोर होने का एक बड़ा कारण बनती है। दूध और डेयरी उत्पादों में विटामिन B12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यदि मेडिकल टेस्ट में विटामिन B12 की कमी पाई जाती है, तो इसका सही इलाज और सप्लीमेंटेशन कराके याददाश्त से जुड़ी समस्या को ठीक किया जा सकता है। इसलिए लगातार बढ़ रही भूलने की शिकायत को केवल उम्र का असर न मानें और समय पर सही जांच कराएं।



















