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हार्ट अटैक के लक्षणों को न समझें केवल गैस: महिलाओं के लिए विशेष सावधानी क्यों जरूरी है?स्वास्थ्य
10 जुल॰ 2026, 11:04 pm (45 दिन पहले)· 2

हार्ट अटैक के लक्षणों को न समझें केवल गैस: महिलाओं के लिए विशेष सावधानी क्यों जरूरी है?

छाती में दर्द होने पर अक्सर लोग उसे एसिडिटी समझ लेते हैं, लेकिन अमृता हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजिस्ट के अनुसार यह हार्ट अटैक भी हो सकता है। महिलाओं में इसके लक्षण पुरुषों से अलग होते हैं, जिनमें बिना दर्द वाले संकेत भी शामिल हैं।

फरीदाबाद में हृदय रोग विशेषज्ञों का मानना है कि हार्ट अटैक की समस्या के प्रति बरती गई लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है। लोग अक्सर सीने में होने वाली बेचैनी को साधारण गैस या एसिडिटी का नाम देकर नजरअंदाज कर देते हैं और घरेलू दवाइयां लेना शुरू कर देते हैं। अमृता हॉस्पिटल फरीदाबाद के कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. आशीष कुमार स्पष्ट करते हैं कि हार्ट अटैक एक गंभीर मेडिकल स्थिति है, जिसके संकेतों को पहचानना हर व्यक्ति के लिए बेहद जरूरी है। अधिकांश मामलों यानी करीब 90 फीसदी मरीजों में छाती में दर्द इसका मुख्य लक्षण होता है, जो कंधे, हाथों या पेट के ऊपरी हिस्से तक फैल सकता है। हालांकि, यह दर्द हर मरीज के लिए समान नहीं होता, क्योंकि इसके साथ अत्यधिक पसीना आना, घबराहट महसूस होना, सांस लेने में तकलीफ और कभी-कभी पैरों में सूजन जैसे लक्षण भी दिख सकते हैं।

महिलाओं में हार्ट अटैक के संकेत क्यों होते हैं अलग?

हृदय रोगों के संदर्भ में महिलाओं की स्थिति पुरुषों से काफी अलग होती है। डॉ. आशीष बताते हैं कि महिलाओं और मधुमेह (शुगर) से पीड़ित मरीजों में हार्ट अटैक हमेशा छाती में तेज दर्द के साथ नहीं आता। कई बार इन मरीजों में सीने में दर्द महसूस ही नहीं होता, बल्कि केवल सांस फूलना, पैरों में सूजन आना या अचानक बेहोश होकर गिर जाने जैसी स्थिति सामने आती है। यही कारण है कि महिलाओं में हार्ट अटैक की पहचान अक्सर देरी से होती है, क्योंकि वे इन संकेतों को एसिडिटी या सामान्य थकान मानकर नजरअंदाज करती रहती हैं। कई मामलों में महिलाएं पेट के ऊपरी हिस्से में होने वाली हल्की जलन को गैस की दवा से ठीक करने की कोशिश करती हैं, जबकि असल में वे हार्ट अटैक का शिकार हो चुकी होती हैं।

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गैस और हार्ट अटैक में अंतर कैसे पहचानें?

सामान्य एसिडिटी और हार्ट अटैक के बीच का अंतर समझना बहुत महत्वपूर्ण है। गैस का दर्द अमूमन पेट के ऊपरी हिस्से तक सीमित रहता है, जबकि हार्ट अटैक का दर्द स्पष्ट रूप से छाती से जुड़ा होता है। कई बार हार्ट अटैक में दर्द के बजाय केवल छाती में जलन महसूस हो सकती है, जिसे लोग बाहरी खान-पान से जोड़कर देखते हैं। यदि कोई व्यक्ति एसिडिटी की दवा लेने के बाद भी राहत महसूस नहीं कर रहा है, तो उसे बिल्कुल भी देरी नहीं करनी चाहिए और तुरंत ईसीजी (ECG) टेस्ट करवाना चाहिए। यदि दर्द के साथ पसीना, घबराहट और सांस लेने में कठिनाई हो रही है, तो ईसीजी और ट्रोपोनिन जैसे आवश्यक ब्लड टेस्ट तुरंत करवाए जाने चाहिए, क्योंकि सही समय पर की गई जांच जान बचाने की कुंजी है।

गोल्डन ऑवर का महत्व और बचाव के उपाय

हार्ट अटैक के इलाज में गोल्डन ऑवर सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है। डॉ. आशीष के अनुसार, यदि मरीज घटना के तीन घंटे के भीतर अस्पताल पहुँच जाता है और एंजियोप्लास्टी की प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है, अथवा थ्रोम्बोलाइसिस इंजेक्शन के जरिए नसें खोल दी जाती हैं, तो जान बचने की संभावना 95 फीसदी तक हो जाती है। यह न केवल जीवन की रक्षा करता है, बल्कि हृदय की मांसपेशियों को होने वाले नुकसान को भी सीमित करता है। तीन से 12 घंटे के बीच भी उपचार शुरू करना काफी प्रभावी होता है। हृदय को स्वस्थ रखने के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। फास्ट फूड से परहेज करें, खाना पकाने के लिए बेहतर तेल का चुनाव करें और धूम्रपान या शराब का सेवन बिल्कुल न करें। ताजा घर का बना संतुलित भोजन लेना, घी और चीनी की मात्रा सीमित रखना और कोल्ड ड्रिंक से पूरी तरह दूरी बनाना हार्ट अटैक के जोखिम को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।

सवाल-जवाब

क्या सीने में दर्द हमेशा गैस के कारण होता है?
नहीं, सीने का दर्द हार्ट अटैक का संकेत भी हो सकता है। यदि दर्द के साथ पसीना, सांस में तकलीफ और घबराहट हो, तो इसे नजरअंदाज न करें।
महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण पुरुषों से अलग क्यों होते हैं?
महिलाओं और शुगर के मरीजों में अक्सर सीने में दर्द नहीं होता, बल्कि उन्हें सांस फूलना या बेहोशी जैसे लक्षण महसूस होते हैं।
गैस की दवा लेने के बाद आराम न मिले तो क्या करें?
अगर एसिडिटी की दवा से आराम नहीं मिल रहा है, तो बिना देरी किए तुरंत अस्पताल जाकर ईसीजी और ट्रोपोनिन टेस्ट करवाना चाहिए।
हार्ट अटैक के मामले में 'गोल्डन ऑवर' क्या है?
घटना के शुरुआती तीन घंटे का समय गोल्डन ऑवर कहलाता है। इस दौरान इलाज मिलने पर मरीज के बचने की संभावना 95 फीसदी तक होती है।
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