क्या आपने कभी किसी दुकान में डीजे सिस्टम की जोरदार धमक से सामान को नीचे गिरते हुए देखा है? यदि नहीं देखा तो इंटरनेट पर ऐसे तमाम वीडियो आसानी से मिल जाएंगे, जहां दवाइयों की दुकानों में भारी कंपन के कारण दवाएं अपनी जगहों से नीचे गिरती नजर आती हैं। जरा सोचिए कि जो आवाज किसी ठोस स्लैब पर रखे सामान को हिलाकर रख सकती है, वह हमारे नाजुक कानों पर कितना बुरा असर डालती होगी। मानव कान इतनी अत्यधिक तेज आवाज को झेलने के लिए बिल्कुल नहीं बने हैं, और जिस हाई वॉल्यूम पर आज के दौर में गाने बजाए जाते हैं, वह सुनने की शक्ति को बहुत कम समय में स्थायी रूप से कमजोर कर सकती है।
शोर की तीव्रता और डेसिबल का पैमाना
आवाज की ताकत को मापने के लिए डेसिबल यानी dB इकाई का इस्तेमाल किया जाता है। ध्वनि जितनी ज्यादा तीव्र होगी, हमारे कानों के पर्दे और आंतरिक तंत्र पर उसका दबाव उतना ही अधिक बढ़ता जाएगा। आम बातचीत और रोजमर्रा की सामान्य आवाजें करीब 70 dB तक होती हैं, और इस स्तर पर लंबे वक्त तक रहने से सुनने की क्षमता को कम खतरा होता है। हालांकि, जब शोर 85 dB के स्तर तक पहुंच जाता है, तो लगातार सुनने पर कानों को नुकसान पहुंचने की आशंका काफी बढ़ जाती है।
इसके मुकाबले 100 dB का स्तर बेहद तेज माना जाता है, जहां लंबे समय तक हेडफोन का इस्तेमाल करना या डीजे के करीब बैठना खतरनाक साबित हो सकता है। वहीं, 120 dB की आवाज बेहद खतरनाक श्रेणी में आती है, जिससे कानों में गंभीर दर्द और तेज घंटियां बजने जैसी समस्याएं तुरंत शुरू हो सकती हैं। यदि आवाज 140 dB या उससे भी ऊपर चली जाए, तो कान के पर्दे फट सकते हैं और सुनने की क्षमता हमेशा के लिए जा सकती है।
ट्रक पर लगे डीजे सिस्टम से इतना खतरा क्यों
विवाह समारोहों और शोभायात्राओं में उपयोग किए जाने वाले विशाल डीजे सेटअप में केवल अधिक आवाज ही नहीं होती, बल्कि उनमें बेहद भारी लो फ्रिक्वेंसी बेस भी शामिल होता है। यह शक्तिशाली बेस आसपास की हवा में तेज कंपन पैदा करता है, जिसकी वजह से खिड़कियों के कांच, दरवाजे और दुकानों के काउंटर तक हिलने लगते हैं। इस प्रकार के सिस्टम के ठीक पास खड़े रहने वाले व्यक्तियों के कानों तक आवाज बेहद खतरनाक तीव्रता के साथ पहुंचती है। शोर का स्तर वक्ता से दूरी, स्पीकर की क्षमता और उसके रुख पर भी निर्भर करता है, इसलिए डीजे के ठीक सामने खड़े होकर लंबे समय तक नाचना स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक हो सकता है।
आम जनता और विशेष वर्गों पर प्रभाव
तेज आवाज का दुष्प्रभाव केवल डीजे के सामने नृत्य कर रहे युवक तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास मौजूद बच्चे, बुजुर्ग और अन्य नागरिक भी इसकी चपेट में आते हैं। छोटे बच्चे इतनी तेज आवाज से असहज हो जाते हैं और लंबे समय तक ऐसा शोर सहने से उनकी श्रवण शक्ति प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, वरिष्ठ नागरिकों या जिन्हें पहले से सुनने में दिक्कत है, उनके लिए यह शोर और अधिक कष्टदायक होता है। निरंतर तेज आवाज के संपर्क में रहने से तीव्र सिरदर्द, मानसिक चिड़चिड़ापन, तनाव और अनिद्रा जैसी गंभीर परेशानियां भी पैदा होने लगती हैं।
कानूनी सीमाएं और नियम
देश के विभिन्न क्षेत्रों के लिए शोर के अधिकतम मानक पहले से तय किए गए हैं। आवासीय क्षेत्रों में दिन के वक्त शोर की सीमा 55 dB और रात के समय 45 dB निर्धारित है, जबकि व्यावसायिक क्षेत्रों में दिन में 65 dB और रात में 55 dB की सीमा तय की गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि सड़कों पर दौड़ने वाले डीजे यदि निर्धारित मानकों से अत्यधिक ऊंचे स्वर में बज रहे हैं, तो वे कानूनी और स्वास्थ्य संबंधी सीमाओं को पार कर जाते हैं, विशेषकर रात्रि के समय यह आम जनता की नींद और चैन में खलल डालता है।
कानों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम
यदि किसी आयोजन में लाउडस्पीकर या डीजे बहुत तेज स्वर में बज रहा हो, तो उसके बिल्कुल समीप खड़े होने से हमेशा परहेज करना चाहिए। दूरी बढ़ने के साथ ही कानों तक पहुंचने वाली ध्वनि का प्रभाव कम हो जाता है। लंबे समय तक शोर में रहने के बजाय बीच-बीच में किसी शांत स्थान पर जाना भी फायदेमंद साबित होता है। यदि तेज आवाज सुनने के बाद कानों में लगातार सीटी या घंटी बजने की आवाज आए, कान सुन्न महसूस हों या सुनने में कठिनाई हो, तो इस स्थिति को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।



















