महाराष्ट्र में डॉक्टरों द्वारा की जा रही हड़ताल पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। राज्य भर के सरकारी और नगर निगम अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़े गंभीर असर को देखते हुए अदालत ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया। सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने प्रदर्शनकारी डॉक्टरों को कड़ी फटकार लगाई और स्पष्ट निर्देश दिया कि वे दोपहर के भोजन के अवकाश के तुरंत बाद काम पर लौट आएं। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि डॉक्टर ड्यूटी पर वापस आने से इनकार करते हैं, तो राज्य सरकार को उनका वेतन रोकने का आदेश जारी कर दिया जाएगा। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि हड़ताल के दौरान नगर निगम के अस्पतालों में एक भी मरीज की मौत हो जाती है, तो उसकी जवाबदेही किस पर होगी।
मरीजों की जान का जोखिम और अदालत के सवाल
सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने डॉक्टरों की हड़ताल के तरीके और उससे आम जनता पर पड़ रहे प्रभाव पर गहरी चिंता जताई। अदालत ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रतिनिधियों से सवाल किया कि मान लीजिए बाद में आपकी याचिका स्वीकार हो जाती है और आप कानूनी लड़ाई जीत जाते हैं, लेकिन इस हड़ताल की अवधि के दौरान यदि 50 मरीजों की जान चली जाती है, तो उस नुकसान की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? पीठ ने डॉक्टरों से कहा कि आम जनता और मरीजों के जीवन की सुरक्षा सबसे ऊपर है। अदालत ने प्रदर्शनकारी डॉक्टरों को आश्वस्त किया कि काम पर लौटने के बाद उनकी सभी मांगों और आपत्तियों को पूरे ध्यान से सुना जाएगा, लेकिन इलाज रोकने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
ब्रिज कोर्स और एलोपैथी प्रैक्टिस का विवाद
इस पूरे विवाद की जड़ महाराष्ट्र सरकार और महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल का वह निर्णय है, जिसके तहत होम्योपैथी डॉक्टरों को मॉडर्न फार्माकोलॉजी में सर्टिफ़िकेट कोर्स (CCMP) करने के बाद एलोपैथी दवाइयां लिखने की अनुमति दी गई है। राज्य सरकार ने एक ब्रिज कोर्स के माध्यम से होम्योपैथिक चिकित्सकों को एलोपैथिक उपचार की प्रैक्टिस करने का अधिकार दिया है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और रेजिडेंट डॉक्टरों का तर्क है कि मात्र 90 दिनों का संक्षिप्त प्रशिक्षण पूरा करके होम्योपैथी डॉक्टरों को एमबीबीएस और एमडी डॉक्टरों के समकक्ष नहीं रखा जा सकता। डॉक्टरों का कहना है कि यह निर्णय मरीजों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने जैसा है।
आजाद मैदान में प्रदर्शन और 'नो CCMP' का नारा
सरकारी फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र एसोसिएशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स (MARD) और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू किया है। मुंबई स्थित प्रसिद्ध आजाद मैदान में बड़ी संख्या में रेजिडेंट डॉक्टर, मेडिकल छात्र और संघ के सदस्य एकत्र हुए। हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर प्रदर्शनकारियों ने 'नो CCMP' के नारे लगाए और सरकार से 3 अगस्त को जारी किए गए सरकारी आदेश को तुरंत वापस लेने की मांग की। डॉक्टरों का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से किसी भी स्थिति में समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
12 सालों से लंबित याचिका और डॉक्टरों की आपत्ति
अदालत में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के वकीलों ने पक्ष रखते हुए कहा कि होम्योपैथी डॉक्टरों को एलोपैथी प्रैक्टिस की अनुमति देने के सरकारी फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पिछले 12 सालों से उच्च न्यायालय में लंबित है। वकीलों ने बताया कि राज्य सरकार ने 3 अगस्त के सरकारी आदेश के माध्यम से एक विशेष समिति का गठन किया था। हालांकि, उस समिति का काम पूरा होने और रिपोर्ट आने से पहले ही होम्योपैथी डॉक्टरों का पंजीकरण शुरू कर दिया गया। डॉक्टरों ने इसी जल्दबाजी पर अपनी तीखी आपत्ति दर्ज कराई और कहा कि जब मामला अदालत के विचाराधीन है, तब इस प्रकार पंजीकरण प्रक्रिया आरंभ करना अनुचित है।



















