मानव शरीर की प्राकृतिक बनावट बेहद अद्भुत और जटिल है। त्वचा पर मामूली खरोंच लगने या चोट आने पर शरीर खुद ही उसकी मरम्मत कर लेता है और कुछ ही दिनों में वह त्वचा बिल्कुल पहले जैसी सामान्य हो जाती है। इसके अलावा शरीर में कुछ ऐसे अंग भी हैं जो अत्यधिक क्षति के बाद भी अपनी कोशिकाओं को दोबारा पुनर्जीवित करने की अनोखी क्षमता रखते हैं। इसका सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण हमारा लिवर है। लिवर यदि अपनी कुल क्षमता का मात्र 5 प्रतिशत हिस्सा भी सुरक्षित बचाए रखे, तो वह अपने दम पर खुद को पूरी तरह से दोबारा विकसित कर सकता है। हालांकि इस प्राकृतिक पुनरुत्थान की क्षमता के कुछ अपवाद भी हैं। शरीर में कई ऐसे बेहद अहम हिस्से मौजूद हैं जिनकी कोशिकाएं यदि एक बार नष्ट हो जाएं, तो वे कभी भी दोबारा नहीं बन पाती हैं। ऐसी स्थिति में इंसान हमेशा के लिए कोमा जैसी गंभीर अवस्था में जा सकता है या फिर ब्रेन डेड हो सकता है। चिकित्सा विज्ञान के सामने आज भी ये अंग एक अबूझ पहेली और बड़ी चुनौती बने हुए हैं क्योंकि विज्ञान लाख कोशिशों के बावजूद इनकी प्राकृतिक रिकवरी का पक्का इलाज नहीं ढूंढ पाया है।
हमारे सीने में धड़कने वाला दिल पूरे शरीर में रक्त संचार को सुचारू रूप से बनाए रखने का इकलौता और सबसे महत्वपूर्ण पंपिंग अंग है। लेकिन इस दिल की मांसपेशियों की कोशिकाओं को जिन्हें कार्डियोमायोसाइट्स कहा जाता है, यदि एक बार गंभीर क्षति पहुंच जाए या वे मृत हो जाएं, तो वे कभी भी दोबारा रीजेनरेट नहीं हो सकती हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि दिल की कोशिकाएं नष्ट होने के बाद भी आखिर इंसान जीवित कैसे रहता है। इसका वैज्ञानिक जवाब यह है कि वह अंग हमेशा के लिए कमजोर हो जाता है और मृत कोशिकाओं की जगह फाइब्रस स्कार सेल्स यानी घाव के निशान वाले ऊतक ले लेते हैं जो मूल कोशिकाओं के मुकाबले हमेशा दोयम दर्जे के ही साबित होते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि जन्म के तुरंत बाद से ही कार्डियोमायोसाइट्स अपनी स्वाभाविक वृद्धि प्रक्रिया को पूरी तरह रोक देती हैं और एक स्थायी अवस्था में चली जाती हैं। सेल साइकिल परमानेंट रूप से थम जाने के कारण नई कोशिकाओं के निर्माण का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता है। चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. जयंत ठाकुरिया के अनुसार एक बार जब किसी व्यक्ति को दिल का दौरा यानी हार्ट अटैक पड़ता है, तो वह इन कार्डियोमायोसाइट्स को भयंकर नुकसान पहुंचाता है जिससे इसकी बहुत सी कोशिकाएं हमेशा के लिए नष्ट हो जाती हैं। उनकी जगह पर फाइब्रस स्कार टिशू भर जाते हैं जो कभी भी स्वस्थ मांसपेशियों जैसा काम नहीं कर पाते। इसी वजह से दिल की पंपिंग करने की क्षमता को स्थायी और कभी न भरने वाला नुकसान उठाना पड़ता है। हालांकि इसका कतई यह अर्थ नहीं है कि दिल का रोगी बिल्कुल ठीक नहीं हो सकता। सही समय पर उचित चिकित्सा, कार्डियक रिहैबिलिटेशन और नियमित दवाइयों के सहारे दिल की ब बची हुई मांसपेशियों की रक्षा जरूर की जा सकती है, लेकिन वे कभी भी अपनी पुरानी स्थिति में वापस नहीं लौट सकतीं। यही कारण है कि दिल की मांसपेशियों के बड़े और क्षतिग्रस्त हिस्से को दोबारा तैयार करना आज भी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बना हुआ है।
दिल के अलावा हमारे मस्तिष्क की कोशिकाएं जिन्हें न्यूरॉन्स कहा जाता है और रीढ़ की हड्डी के अंदर मौजूद नसें भी यदि एक बार डैमेज हो जाएं, तो वे अपने आप कभी दोबारा नहीं उगती हैं। हमारे शरीर के न्यूरॉन्स अत्यधिक विशिष्ट प्रकृति की कोशिकाएं होती हैं जो शुरुआती शारीरिक विकास के चरण के बाद कोशिका विभाजन की अपनी क्षमता को पूरी तरह और हमेशा के लिए खो देती हैं। यही वजह है कि जब इनमें किसी प्रकार की क्षति होती है, तो शरीर नई कोशिकाओं को पैदा करने में असमर्थ रहता है। ठीक इसी प्रकार हमारी रीढ़ की हड्डी में भी ऐसी नर्व्स कोशिकाएं पाई जाती हैं जो मस्तिष्क और शरीर के बाकी हिस्सों के बीच संदेशों के आदान-प्रदान का काम करती हैं। चोट लगने की स्थिति में इस जगह पर भी फाइब्रस स्कार टिश्यू का निर्माण हो जाता है, जो शरीर के नए न्यूरल कनेक्शन बनने के पूरे रास्ते को ही अवरुद्ध कर देता है। इसलिए मस्तिष्क और रीढ़ यानी स्पाइनल कॉर्ड की गंभीर चोटों को ठीक करना डॉक्टरों के लिए बेहद कठिन चुनौती साबित होता है। हालांकि नियमित देखरेख और आधुनिक थेरेपी के विभिन्न माध्यमों से इस स्थिति को थोड़ा बहुत प्रबंधित जरूर किया जा सकता है, लेकिन इन्हें पूरी तरह से ठीक करना असंभव है। डॉक्टर सत्येंद्र कातेवा बताते हैं कि न्यूरॉन्स के अंदर रीजनरेट होने की क्षमता बेहद सीमित होती है। यही मुख्य कारण है कि एक बार जब इन हिस्सों में चोट लग जाती है, तो हमेशा के लिए स्थायी समस्याएं पैदा होने की भारी आशंका बनी रहती है। इसलिए मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी की दुर्घटना के बाद मरीज के ठीक होने का मतलब यह कतई नहीं होता कि नष्ट हुए ऊतक दोबारा से जीवित हो गए हैं। बल्कि रिहैबिलिटेशन और उन्नत थेरेपी की मदद से तंत्रिका तंत्र केवल नए रास्ते तलाशने और खुद को उस स्थिति में ढालने का प्रयास करता है, भले ही मूल रूप से क्षतिग्रस्त हुए रास्ते दोबारा कभी न पनप सकें।
हमारे पूरे शरीर के ढांचे में कार्टिलेज एक बेहद मजबूत लेकिन रबर की तरह लचीला कनेक्टिव टिश्यू होता है। यह हमारी हड्डियों की तुलना में काफी नरम होता है लेकिन मांसपेशियों के मुकाबले यह काफी सख्त और कड़ा होता है। शरीर के जोड़ जैसे कि घुटने, कोहनी, कान, नाक और रीढ़ की हड्डी के हिस्सों में कार्टिलेज मुख्य रूप से पाया जाता है। इसका मुख्य और अहम काम दो हड्डियों के बीच में एक कुशन यानी गद्दी की तरह सहारा देना होता है ताकि हड्डियां आपस में रगड़ न खाएं। जब हम चलते-फिरते हैं, दौड़ते हैं, कूदते हैं या शरीर को कोई झटका लगता है, तो यह कार्टिलेज हड्डियों को आपस में टकराने और घिसने से सुरक्षित बचाता है। इसके अलावा यह नाक और कान जैसे बाहरी अंगों को एक निश्चित ढांचा और जरूरी लचीलापन भी प्रदान करता है। यदि यह कार्टिलेज एक बार पूरी तरह खत्म हो जाए, तो यह भी कभी दोबारा खुद से नहीं बन सकता है। इसके निर्माण और पोषण की प्रक्रिया अपने आप में बेहद अनोखी होती है। कार्टिलेज तक जरूरी पोषक तत्वों को पहुंचाने के लिए शरीर की तरफ से कोई भी डायरेक्ट ब्लड वैसल्स का नेटवर्क सीधे तौर पर नहीं जुड़ा होता है। ऐसी स्थिति में कार्टिलेज अपना पूरा पोषण डिफ्यूजन प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त करता है। इसका मतलब यह है कि दूर मौजूद ब्लड वैसल्स दबाव के जरिए यहां तक पोषक तत्वों को भेजती हैं और ठीक इसी तरह वापस आर्टरीज के रास्ते अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकाला जाता है। डॉक्टर काटेवा का यह भी कहना है कि इस टिश्यू के अंदर पर्याप्त रक्त आपूर्ति यानी ब्लड सप्लाई न होने की वजह से कुछ विशेष प्रकार के कार्टिलेज में ठीक होने की प्राकृतिक क्षमता बहुत ही कम होती है। यही कारण है कि कार्टिलेज को पहुंचने वाला नुकसान बहुत ही धीमी गति से ठीक होता है और कभी-कभी यह शरीर के संबंधित जोड़ों में आजीवन बनी रहने वाली बड़ी समस्याओं का मूल कारण बन जाता है। ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़ा कार्टिलेज का नुकसान इसी वजह से हमेशा के लिए एक स्थायी क्षति बनकर रह जाता है।
हार्ट की पेशीय कोशिकाओं, कार्टिलेज, ब्रेन सेल्स और रीढ़ की हड्डी के नर्व्स के अलावा भी हमारे शरीर में ऐसे कई अन्य हिस्से हैं जो एक बार नष्ट हो जाएं तो दोबारा रीजेनरेट नहीं हो पाते हैं। इनमें हमारे शरीर की बहुत सी हड्डियां, किडनी के नेफ्रॉन्स, फेफड़ों के अंदर मौजूद एल्वियोली और आंखों की रोशनी से जुड़ी ऑप्टिक नर्व जैसे बेहद महत्वपूर्ण अंग शामिल हैं। इन तमाम अंगों और ऊतकों में यदि एक बार स्थायी रूप से नुकसान पहुंच जाए, तो आधुनिक चिकित्सा के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें दोबारा प्राकृतिक रूप से ठीक नहीं किया जा सकता है।



















