महिला स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में स्तन कैंसर का प्रकोप तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। देश भर में इस गंभीर बीमारी से जूझने वाली महिलाओं के आंकड़ों पर नज़र डालें तो एक डरावनी सच्चाई सामने आती है। भारत में स्तन कैंसर से पीड़ित लगभग 60% महिलाओं में इस मर्ज की पहचान तब जाकर होती है, जब बीमारी काफी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है। जब कैंसर इतनी उन्नत स्थिति में पहुंच जाता है, तो चिकित्सीय उपचार बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसके चलते मरीज के पूरी तरह स्वस्थ होने या बचने की उम्मीदें भी काफी घट जाती हैं। अधिकांश मामलों में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह देखने को मिलता है कि महिलाओं को अपने स्तन में असामान्य गांठ का अहसास तो होता है, लेकिन वे यह सोचकर डॉक्टर के पास नहीं जातीं कि इसमें कोई दर्द नहीं है तो खतरे की कोई बात नहीं होगी। दर्द न होने को सुरक्षित मान लेना सबसे भ्रामक और खतरनाक धारणा है, जिसे तोड़ा जाना बेहद जरूरी है।
शुरुआती लक्षणों में दर्द की गैरहाजिरी बनती है सबसे बड़ा धोखा
आमतौर पर लोगों के मन में यह पक्की धारणा बैठी होती है कि जब तक शरीर में तेज दर्द या बेचैनी न हो, तब तक कोई गंभीर बीमारी नहीं हो सकती। लेकिन कैंसर के मामलों में यह सोच जानलेवा साबित हो सकती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, स्तन में बनने वाली शुरुआती कैंसर की गांठों में लगभग हमेशा दर्द नहीं होता है। भारतीय समाज में दर्द को ही खतरे की एकमात्र निशानी मानने की आदत पड़ चुकी है, जो महिलाओं के लिए घातक सिद्ध हो रही है। रजत बजाज, डायरेक्टर और यूनिट हेड, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, फोर्टिस नोएडा के मुताबिक, स्तन में कैंसर की शुरुआती गांठ में आमतौर पर दर्द नहीं होता। यदि किसी महिला को अपने स्तन में या बगल के हिस्से में किसी भी तरह की बिना दर्द वाली सूजन या गांठ महसूस होती है, तो उसे बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, ताकि बीमारी को खतरनाक स्तर पर पहुंचने से पहले ही नियंत्रित किया जा सके।
किन सामाजिक और व्यावहारिक वजहों से डॉक्टर तक पहुंचने में होती है देरी
भारतीय परिवेश में महिलाओं द्वारा इलाज में देरी करने के पीछे कई सामाजिक, पारिवारिक और बुनियादी ढांचागत कारण जिम्मेदार हैं, जो उनकी सेहत पर भारी पड़ते हैं
- परिवार को प्राथमिकता और खुद की अनदेखी: भारतीय समाज में महिलाएं अमूमन पूरे परिवार का मुख्य आधार होती हैं। वे दिन-रात अपने घर-परिवार, बच्चों और घरेलू जिम्मेदारियों को संभालने में जुटी रहती हैं। इस निरंतर व्यस्तता के चलते वे अपनी स्वयं की शारीरिक तकलीफों और सेहत को लगातार नजरअंदाज करती रहती हैं।
- शर्म, संकोच और बातचीत का अभाव: पारंपरिक सामाजिक परिवेश के कारण आज भी महिलाओं के अंगों और उनसे जुड़ी समस्याओं पर खुलकर चर्चा नहीं की जाती है। इस झिझक और लोकलाज के डर से पीड़ित महिलाएं अपने शरीर में आ रहे किसी भी असामान्य बदलाव को अपने पति, मां या परिवार की अन्य महिलाओं के साथ साझा करने से कतराती हैं।
- जागरूकता की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में जांच सुविधाओं का अभाव: ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाओं के बीच अपने शरीर और स्तनों की खुद जांच करने की बुनियादी पद्धतियों की बहुत कम जानकारी है। इसके अलावा, देश के दूर-दराज़ और पिछड़े क्षेत्रों में मैमोग्राम जैसी बुनियादी जांच सुविधाओं और आधुनिक परीक्षण केंद्रों का भी भारी अभाव बना हुआ है।
नियमित स्व-जांच और सतर्कता से बच सकती है अनमोल जान
किसी भी परिवार का सुख और स्वास्थ्य घर की महिला की तंदुरुस्ती पर टिका होता है। इसलिए महिलाओं को अपनी शारीरिक अवस्था के प्रति सजग रहना चाहिए और अपनी सेहत की उपेक्षा करने से बचना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि महिलाएं हर महीने अपने लिए थोड़ा समय निकालें। माहवारी चक्र समाप्त होने के ठीक बाद आईने के सामने खड़े होकर केवल पांच मिनट का समय निकालकर अपने स्तनों की भली-भांति जांच करें। इस दौरान यदि स्तन में कोई नई अथवा सख्त गांठ नजर आए, स्तन के सामान्य आकार या बनावट में कोई असामान्य बदलाव दिखे, त्वचा पर कोई खिंचाव या परिवर्तन महसूस हो, या फिर निप्पल से किसी तरह का असामान्य स्राव निकले, तो तुरंत सतर्क हो जाएं। यदि ऐसी कोई बिना दर्द वाली गांठ महसूस भी हो तो न तो घबराएं और न ही इसे छिपाने का प्रयास करें। तुरंत अपने परिवार को भरोसे में लेकर किसी कैंसर विशेषज्ञ से परामर्श लें, क्योंकि समय पर शुरू हुआ सही इलाज मरीज की जान बचा सकता है।


















