सामान्य तौर पर हर जगह उगने वाली हरी घास जिसे दूब कहा जाता है, अपने अंदर कई प्रकार के अनमोल गुण छिपाए हुए है। इसके औषधीय लाभ और पारंपरिक महत्व ऐसे हैं जो रोजमर्रा के जीवन में काफी काम आ सकते हैं। शादी विवाह के आयोजनों से लेकर पूजा-पाठ तक, इस पौधे का इस्तेमाल प्राचीन काल से होता आ रहा है।
धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं में महत्व
इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार, दूर्वा को धरती की सबसे मजबूत वनस्पतियों में गिना जाता है और इसके उपयोग धार्मिक कार्यों तक ही सीमित नहीं हैं। भगवान गणेश की पूजा में इसका विशेष स्थान है और कई सांस्कृतिक संस्कारों तथा विवाह की रस्मों में भी इसे अनिवार्य माना गया है। इसके पीछे छिपे स्वास्थ्य लाभ इस वनस्पति को और भी खास बनाते हैं।
पेट और त्वचा के रोगों में असरदार
पाचन से जुड़ी कई परेशानियों के लिए दूर्वा को एक अचूक उपाय माना जाता है। अगर किसी को कुष्ठ रोग की शिकायत है, तो इस घास के रस को कच्चे दूध के साथ मिलाकर लगाने से राहत मिलती है। इसके अलावा महिलाओं में मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होने की स्थिति या फिर नाक से खून बहने की समस्या में इसका रस बहुत फायदा पहुंचाता है। इसमें मौजूद एंटी-इन्फ्लेमेटरी और एंटी-माइक्रोबियल तत्व शरीर की गंदगी को बाहर निकालने का काम करते हैं।
खून साफ करने और घाव भरने में मददगार
यह साधारण दिखने वाली वनस्पति खून को साफ करने के साथ-साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करती है। यदि शरीर में खून की कमी हो या त्वचा संबंधी कोई विकार हो, तो इसका उपयोग काफी कारगर साबित होता है। इसके अलावा सुबह के समय ओस से भीगी दूब पर नंगे पांव टहलने से मानसिक तनाव कम होता है और सिरदर्द की समस्या से भी राहत मिलती है। किसी दुर्घटना में चोट लग जाने या कट जाने पर इस घास को पीसकर लगाने से बहता हुआ खून तुरंत थम जाता है।
आयुर्वेदिक सलाह जरूरी
किसी भी रूप में इस वनस्पति के रस का सेवन करने से पहले योग्य आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श अवश्य करना चाहिए ताकि स्वास्थ्य पर किसी तरह का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।



















