सोनम वांगचुक को जबरन खिलाने की मांग वाली याचिका ने खड़ा किया बड़ा सवाल, बिना भोजन कितने दिन जिंदा रह सकता है इंसानपड़ताल
2 घंटे पहले· 2

सोनम वांगचुक को जबरन खिलाने की मांग वाली याचिका ने खड़ा किया बड़ा सवाल, बिना भोजन कितने दिन जिंदा रह सकता है इंसान

सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के 19वें दिन दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल एक याचिका में उन्हें अस्पताल में भर्ती कर जबरन खाना खिलाने की मांग की गई है, जिसने फोर्स फीडिंग की कानूनी बहस और बिना भोजन इंसान कितने दिन जिंदा रह सकता है, इस सवाल को फिर से खड़ा कर दिया है।

सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल आज अपने 19वें दिन में पहुंच गई है और दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल एक नई याचिका ने उनकी बिगड़ती सेहत को एक बड़े कानूनी सवाल से जोड़ दिया है, क्या कोई इंसान जो खुद खाना छोड़ चुका है, उसे डॉक्टर और अदालत के फैसले पर जबरन खिलाया जा सकता है, अगर उसकी जान को सच में खतरा माना जाए।

मामला अदालत तक कैसे पहुंचा

15 जुलाई को जब 59 वर्षीय वांगचुक अपने उपवास के 18वें दिन में दाखिल हुए, तभी दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई, जिसने राजनीति से हटकर एक अलग ही बहस छेड़ दी। यह याचिका वकील और कार्यकर्ता राकेश कुमार सैनी ने दाखिल की है। उन्होंने अदालत से मांग की है कि वांगचुक को अस्पताल में भर्ती कराया जाए और जरूरत पड़ने पर जबरन खाना खिलाने समेत पूरा इलाज दिया जाए। याचिका में कहा गया है कि वांगचुक का वजन भूख हड़ताल शुरू होने के बाद से करीब 8.5 किलो कम हो चुका है, उनकी सेहत लगातार बिगड़ रही है और अगर हड़ताल जारी रही तो उनकी जान को खतरा हो सकता है। याचिका में यह भी बताया गया है कि वांगचुक की मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगी हैं और वे बेहद दर्द में हैं। सैनी की दलील है कि जब एक नागरिक की जिंदगी दांव पर लगी हो तो सरकार सिर्फ तमाशा नहीं देख सकती।

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फोर्स फीडिंग होती क्या है और क्या यह कानूनन मुमकिन है

फोर्स फीडिंग का मतलब है ऐसे शख्स को जबरदस्ती खाना या पोषण देना जो या तो खुद खाने से इनकार कर रहा हो या खाने की हालत में न हो। आमतौर पर यह नाक के जरिए एक ट्यूब पेट तक पहुंचाकर किया जाता है, ताकि शरीर को भूख से बचाया जा सके और जान बचाई जा सके। लेकिन क्या सरकार किसी भूख हड़ताली के साथ ऐसा करने का कानूनी हक रखती है, यह सवाल इतना सीधा नहीं है। भारतीय अदालतें आमतौर पर दो अधिकारों के बीच संतुलन बनाती हैं, एक तरफ किसी इंसान का अपने शरीर को लेकर फैसला लेने का अधिकार, और दूसरी तरफ लोगों की जान बचाने की सरकार की जिम्मेदारी। ऐसा कोई सीधा कानून नहीं है जो अपने आप फोर्स फीडिंग की इजाजत दे देता हो। अदालतें हर मामले को अलग से देखती हैं, यह ध्यान में रखते हुए कि उस शख्स की सेहत किस हालत में है और उसकी जान को कितना असली खतरा है।

वांगचुक आखिर भूख हड़ताल पर क्यों बैठे हैं

वांगचुक दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे उस प्रदर्शन में शामिल हुए थे, जिसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफे की मांग की जा रही है। आरोप है कि नीट समेत कई परीक्षाओं में गड़बड़ियां हुई हैं। यह प्रदर्शन जून के महीने में ही शुरू हो गया था। वांगचुक ने खुद 28 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की और तब से बिना रुके इस पर डटे हुए हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि इस उपवास का मकसद परीक्षा गड़बड़ियों की तरफ देश का ध्यान खींचना और जिम्मेदार लोगों से जवाबदेही मांगना है।

क्या पानी और खाना दोनों के बिना इंसान बच सकता है

ज्यादा देर तक नहीं। डॉक्टरों के मुताबिक, अगर पानी मिलता रहे तो इंसान बिना खाने के कई हफ्तों, कुछ मामलों में तो महीनों तक भी जिंदा रह सकता है। लेकिन अगर पानी और खाना दोनों बंद हो जाएं, तो जिंदा रहने का समय बहुत तेजी से घट जाता है। ज्यादातर लोग बिना पानी के करीब एक हफ्ते से ज्यादा नहीं टिक पाते, हालांकि यह उम्र, सेहत और आसपास के माहौल जैसे तापमान पर भी निर्भर करता है।

सिर्फ खाना छोड़ने पर शरीर कितने दिन साथ देता है

खाना बंद करते ही शरीर एकदम से काम करना बंद नहीं कर देता। शुरुआती एक-दो दिन शरीर ग्लूकोज और जमा ग्लाइकोजन से ऊर्जा लेता है। यह भंडार खत्म होते ही शरीर जमा चर्बी को जलाना शुरू कर देता है। न्यूरोलॉजिस्ट डॉ सुधीर कुमार बताते हैं कि करीब तीन दिन के उपवास के बाद दिमाग चर्बी से बने कीटोन्स को ईंधन की तरह इस्तेमाल करने लगता है, जिससे मांसपेशियां बचती हैं और शरीर लंबे समय तक काम करता रहता है। करीब दो हफ्तों तक जमा चर्बी ही शरीर की मुख्य ऊर्जा बनी रहती है। दो हफ्ते बीतने के बाद शरीर मांसपेशियों को तोड़कर ऊर्जा निकालना शुरू कर देता है, ऊर्जा भंडार तेजी से गिरने लगता है और दिल, किडनी और लिवर जैसे अंगों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। अलग-अलग अध्ययनों में सामने आया है कि कुछ भूख हड़ताली 28 से 40 दिन तक जिंदा रहे, जबकि 1981 के उत्तरी आयरलैंड भूख हड़ताल में मौतें 46 से 73 दिन बाद हुई थीं। कुल मिलाकर, अगर पर्याप्त पानी मिलता रहे तो इंसान बिना खाने के करीब 45 से 70 दिन तक जिंदा रह सकता है, यह उसकी सेहत, वजन और शरीर में पानी की मात्रा पर निर्भर करता है। लेकिन पानी भी न मिले तो यह समय घटकर सिर्फ 3 से 7 दिन रह जाता है।

खाने से ज्यादा पानी जरूरी क्यों माना जाता है

खाना शरीर को ऊर्जा देता है, लेकिन शरीर के जरूरी सिस्टम को चलाए रखने का काम पानी करता है। पानी शरीर का तापमान संतुलित रखता है, पोषक तत्वों को शरीर में पहुंचाता है, खून का बहाव बनाए रखता है और गंदगी बाहर निकालता है। खाना छोड़ने पर शरीर जमा चर्बी और बाद में मांसपेशियों से ऊर्जा निकाल लेता है। लेकिन पानी न मिलने पर डिहाइड्रेशन बहुत तेजी से बढ़ता है, खून की मात्रा घट जाती है, अंगों तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व कम पहुंचते हैं, किडनी ठीक से काम करना बंद कर देती है और अंग फेल होने का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। यही वजह है कि इंसान बिना पानी के मुकाबले बिना खाने के कहीं ज्यादा दिन टिक सकता है।

लंबी भूख हड़ताल में भूख का एहसास कम क्यों होने लगता है

आमतौर पर माना जाता है कि भूख हड़ताल जितनी लंबी चलेगी, भूख उतनी ही बढ़ती जाएगी, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि हकीकत इसके उलट है। शुरुआती कुछ दिनों के बाद भूख का एहसास खुद ही कम होने लगता है। डॉ सुधीर कुमार के मुताबिक भूख सबसे ज्यादा उपवास के पहले एक-दो दिन में महसूस होती है। जैसे-जैसे शरीर भूखे रहने का आदी होता है, हार्मोन का स्तर बदलता है और भूख धीरे-धीरे कम होती जाती है। वे कहते हैं, एक बार शुरुआती दौर निकल जाने के बाद शरीर खुद को ढाल लेता है। हार्मोन में बदलाव की वजह से भूख कम हो जाती है। वे आगे बताते हैं, इंसान को शायद बहुत भूख महसूस न हो, लेकिन उसकी कमजोरी लगातार बढ़ती जाती है। चलना, सीढ़ियां चढ़ना या कोई भी शारीरिक मेहनत मुश्किल होती चली जाती है। डॉ कुमार के मुताबिक दिमाग काम करता रहता है क्योंकि वह ऊर्जा के लिए कीटोन्स का इस्तेमाल शुरू कर देता है, इसलिए इंसान होश में रहता है और सामान्य तरीके से फैसले भी ले पाता है, हालांकि ध्यान लगाने की क्षमता, एकाग्रता और प्रतिक्रिया की रफ्तार धीरे-धीरे कम होती जाती है।

धरना स्थल का हाल

अपने उपवास के 17वें दिन तक वांगचुक सिर्फ नमक मिले पानी के सहारे टिके हुए थे और उनका वजन 8.5 किलो घट चुका था। उनके पीछे धरना स्थल पर कॉकरोच जनता पार्टी का एक बैनर लगा था, जिस पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग लिखी थी। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत डिपके ने कहा, सरकार बात करने तक को तैयार नहीं है। उन्होंने उसे मरने के लिए छोड़ दिया है।

सवाल-जवाब

सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल कब शुरू हुई थी?
उन्होंने 28 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी और आज इसका 19वां दिन है।
वांगचुक ने अब तक कितना वजन घटाया है?
याचिका के मुताबिक भूख हड़ताल शुरू होने के बाद से उनका वजन करीब 8.5 किलो कम हो चुका है।
दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका किसने दाखिल की है?
यह याचिका वकील और कार्यकर्ता राकेश कुमार सैनी ने दाखिल की है।
याचिका में क्या मांग की गई है?
याचिका में मांग है कि वांगचुक को अस्पताल में भर्ती कराया जाए और जरूरत पड़ने पर जबरन खाना खिलाने समेत इलाज दिया जाए।
फोर्स फीडिंग क्या होती है?
यह उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें खाने से इनकार कर रहे या खा न पाने वाले शख्स को नाक के जरिए ट्यूब से जबरन पोषण दिया जाता है ताकि भूख से उसकी जान न जाए।
वांगचुक भूख हड़ताल पर क्यों बैठे हैं?
वे जंतर मंतर पर चल रहे उस प्रदर्शन का हिस्सा हैं जिसमें नीट समेत परीक्षाओं में गड़बड़ी को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफे की मांग की जा रही है।
बिना पानी के इंसान कितने दिन जिंदा रह सकता है?
ज्यादातर लोग बिना पानी के करीब एक हफ्ते से ज्यादा नहीं टिक पाते, हालांकि यह उम्र और सेहत पर भी निर्भर करता है।
सिर्फ पानी के सहारे इंसान बिना खाने के कितने दिन जिंदा रह सकता है?
डॉक्टरों के मुताबिक पर्याप्त पानी मिलने पर इंसान बिना खाने के करीब 45 से 70 दिन तक जिंदा रह सकता है।

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