रूस सालों से दुनिया के लगभग हर कोने में कच्चा तेल बेचता आया है, इसलिए यह सोचना भी मुश्किल लगता है कि उसी देश में पेट्रोल की किल्लत हो सकती है। लेकिन हो ठीक यही रहा है। दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक रूस अब दूसरे देशों से तैयार ईंधन खरीदने पर मजबूर हो गया है, और इनमें से कुछ खेप भारत से रवाना हुई बताई जा रही हैं। रूस के कई हिस्सों में लोग अब पेट्रोल पंप के बाहर घंटों लाइन में खड़े हैं, और सरकार ने तय कर दिया है कि एक बार में कितना पेट्रोल खरीदा जा सकता है। इस अचानक आई किल्लत के पीछे सिर्फ एक वजह है: यूक्रेन के लगातार हो रहे हमले।
इस पूरी कहानी में तीन सवाल सबसे अहम हैं। तेल से भरे-पूरे देश में पेट्रोल की राशनिंग की नौबत आई कैसे? क्या भारत सच में रूस को ईंधन पहुंचा रहा है? और रूस जैसी बड़ी सैन्य ताकत इन हमलों को रोक क्यों नहीं पा रही? आइए एक-एक करके समझते हैं।
तेल का बादशाह अपने ही ईंधन को तरसा
यूक्रेन के साथ जंग शुरू होने के बाद से ही कीव ने रूस की ऊर्जा रीढ़ को अपना निशाना बना रखा है। मार्च 2026 से अब तक यूक्रेनी सेना रूस की तेल रिफाइनरियों पर 50 से ज्यादा हमले कर चुकी है, और इन हमलों ने कच्चे तेल को इस्तेमाल लायक ईंधन में बदलने की रूस की क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया है।
4 जुलाई को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने बताया कि उनकी सेना ने सेंट पीटर्सबर्ग की एक रिफाइनरी पर ड्रोन से हमला किया, जो रूसी सीमा के करीब 850 किलोमीटर अंदर स्थित है। यह अकेली रिफाइनरी हर साल 1.25 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पाद बनाती है, और इससे पहले 3 जून को भी इस पर हमला हो चुका था। मॉस्को के बाहरी इलाके की एक और रिफाइनरी को 18 जून को निशाना बनाया गया।
नुकसान का पैमाना चौंकाने वाला है। यूक्रेनी मीडिया के मुताबिक रूस की 10 सबसे बड़ी रिफाइनरियों में से आठ पर अब तक हमला हो चुका है। इसका असर ईंधन आपूर्ति पर बहुत गहरा पड़ा है। रूस की रिफाइनिंग क्षमता 42.7% गिर चुकी है, और करीब 60 तेल भंडारण केंद्रों को भारी नुकसान पहुंचा है। इन भंडारों में देश के 58% रिफाइंड उत्पाद, यानी पेट्रोल और डीजल, और 42% कच्चा तेल रखा हुआ था।
उत्पादन के आंकड़े भी यही कहानी कहते हैं। इस साल रूस का कुल तेल उत्पादन पिछले साल जून के मुकाबले 25% कम है। खास तौर पर पेट्रोल का उत्पादन पिछले जून के 10 लाख बैरल रोजाना से घटकर अब करीब 8.5 लाख बैरल रोजाना रह गया है, यानी 17% की गिरावट। अगस्त 2025 से अब तक रूस को करीब 1.16 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। रूस के 83 में से 55 से ज्यादा क्षेत्रों में पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर पाबंदियां लगा दी गई हैं।
अब तक सरकारी तेल कंपनियों ने पंप के दाम स्थिर रखे हैं, लेकिन निजी पंपों ने कीमतें बढ़ानी शुरू कर दी हैं। और यह तकलीफ सिर्फ उन इलाकों तक सीमित नहीं है जहां बमबारी हुई। जिन क्षेत्रों की रिफाइनरियां अभी सुरक्षित हैं, वहां भी राष्ट्रीय आपूर्ति की चेन कसने से किल्लत महसूस हो रही है।
ओम्स्क इसकी अच्छी मिसाल है। यहां साइबेरिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी है और इस पर कोई हमला नहीं हुआ, फिर भी यहां लोगों को एक बार में सिर्फ 40 लीटर पेट्रोल मिल पा रहा है। ज़बायकाल्स्की क्राय में एक कचरा उठाने वाली कंपनी ने ईंधन न मिलने के कारण अपना काम पूरी तरह रोक दिया है, और बस रूट भी घटा दिए गए हैं। इरकुत्स्क शहर में किल्लत ने सार्वजनिक परिवहन का खर्च बढ़ा दिया है, और पेट्रोल पंपों के बाहर लाइनें इतनी लंबी हो गईं कि इंतजार कर रहे ड्राइवरों के लिए वहां पोर्टेबल शौचालय तक लगाने पड़े।
क्या भारत चुपके से रूस की मदद कर रहा है?
बताया जा रहा है कि 1 जुलाई को भारतीय तेल कंपनी नायरा एनर्जी ने रूस को दो पेट्रोल टैंकर भेजे, जिनमें कुल मिलाकर करीब 60,000 मीट्रिक टन ईंधन था। रूस की सरकारी तेल कंपनी रोसनेफ्ट की नायरा एनर्जी में 49% हिस्सेदारी है, जिससे इस खेप के पीछे एक तर्क बनता है, हालांकि नायरा ने खुद इसकी पुष्टि नहीं की है।
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव यह मान चुके हैं कि रूस दशकों में पहली बार ईंधन आयात करने की तैयारी कर रहा है और इसके लिए कई देशों से बातचीत चल रही है। लेकिन भारत ने इस बात को सिरे से खारिज किया है कि वह सीधे मॉस्को को ईंधन दे रहा है। भारत के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने साफ कहा: "न तो भारत सरकार और न ही निजी भारतीय कंपनियां रूस को सीधे ईंधन की आपूर्ति कर रही हैं। हो सकता है कि रूस अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के जरिए भारतीय मूल का ईंधन खरीद रहा हो।"
यह फर्क मायने रखता है। किसी तेल कंपनी से सीधे सौदा करने के बजाय खरीदार अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के जरिए भी ईंधन ले सकता है। ये बिचौलिए कई देशों से ईंधन जुटाते हैं, उसे सिंगापुर, यूएई के फुजैराह और रॉटरडैम जैसे बड़े कारोबारी केंद्रों तक पहुंचाते हैं, जरूरत पड़ने पर अलग-अलग खेप को आपस में मिलाते हैं, और फिर यह मिला-जुला उत्पाद रूस जैसे ग्राहकों को बेच देते हैं। इस तरह भारत से निकला ईंधन बिना भारत के सीधे बेचे रूस के टैंकों तक पहुंच सकता है।
पंप चालू रखने के लिए रूस और क्या कर रहा है
पेट्रोल का आयात इस पूरी कवायद का बस एक हिस्सा है। रूस अब हर महीने अलग-अलग देशों से करीब 4 लाख टन पेट्रोल मंगा रहा है। उप प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक के मुताबिक अकेला पड़ोसी बेलारूस हर महीने 1 से 1.5 लाख मीट्रिक टन पेट्रोल भेज रहा है।
बेलारूस से आने वाला यह आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। मई के पहले पखवाड़े में रूस ने बेलारूस से 70,000 टन ईंधन मंगाया, जो पहले के मुकाबले तीन गुना ज्यादा है। उसने जुलाई-अगस्त के दौरान कजाकिस्तान से 50,000 टन खरीदने का सौदा भी किया है, और जापान से 2 लाख बैरल जेट ईंधन आने की उम्मीद है।
निर्यात और घरेलू बिक्री पर लगाम
दूसरा तरीका है ईंधन को अपने ही पास रोक कर रखना। रूस ने नवंबर 2025 में समुद्री और जेट ईंधन के निर्यात पर कसना शुरू किया था। तब से यह निर्यात 2025 के 30,000 बैरल रोजाना से गिरकर इस साल सिर्फ 13,000 बैरल रोजाना रह गया है। 1 अप्रैल से 31 जुलाई तक पेट्रोल निर्यात पर रोक लगी हुई है। कई क्षेत्रों में लोग एक बार में सिर्फ 20 से 30 लीटर पेट्रोल ले पा रहे हैं, और कैन में ईंधन भरकर ले जाने पर भी पाबंदी लगा दी गई है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि मॉस्को डीजल निर्यात पर भी रोक लगाने पर विचार कर रहा है।
साथ ही, कम ग्रेड वाले ईंधन की बिक्री के नियम ढीले कर दिए गए हैं, ताकि रिफाइनरियों में जमा भंडार बेकार पड़े-पड़े खराब न हो जाए। पुतिन ने हालात को हल्का दिखाने की कोशिश करते हुए कहा: "रिफाइनरियों पर हमलों से ईंधन की किल्लत हुई है, लेकिन हालात गंभीर नहीं हैं। पेट्रोल का भंडार पिछले साल के मुकाबले सिर्फ 4% कम है।"
रूस यह किल्लत कब तक झेल सकता है?
बिजनेस कंसल्टेंसी मैक्रो-एडवाइजरी के सीईओ क्रिस वीफर का कहना है कि रूस के पास कुल मिलाकर ईंधन की कमी नहीं है, दिक्कत बस यह है कि ईंधन गलत जगहों पर पड़ा है। वे कहते हैं, "असली समस्या ईंधन को उन इलाकों तक पहुंचाने की है जहां किल्लत है। यह बहुत बड़ा लॉजिस्टिक्स का काम है और इसमें कई हफ्ते लग सकते हैं।"
टूटी रिफाइनरियों को ठीक करना और भी धीमा और मुश्किल काम है। मरम्मत के लिए जरूरी कई मशीनें और स्पेयर पार्ट्स बाहर से मंगाने पड़ते हैं, और रूस अब भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार पाबंदियों में घिरा है, जिससे इन्हें जुटाना कठिन है। वीफर के अंदाजे के मुताबिक अकेली मॉस्को रिफाइनरी की मरम्मत में कम से कम तीन महीने लगेंगे, और यह अकेला संयंत्र मॉस्को और आसपास के इलाकों में इस्तेमाल होने वाले करीब 40% ईंधन की आपूर्ति करता है।
तेल बाजार विश्लेषक गैरी पीच कहते हैं कि जो रिफाइनरियां ठीक भी हो जाएंगी, वे भी जल्दी पूरी क्षमता से नहीं चल पाएंगी, क्योंकि नुकसान बहुत बड़ा है। उन्हें अगस्त से पहले पूरी रिफाइनिंग शुरू होने की उम्मीद नहीं है। पीच एक और तीखी बात भी कहते हैं कि जब तक कोई युद्धविराम या शांति समझौता नहीं होता, तब तक बहुत सारी रिफाइनरियों को दोबारा बनाने का कोई खास मतलब नहीं, क्योंकि मरम्मत की गई रिफाइनरी बस फिर से निशाना बनने के लिए तैयार खड़ी रहेगी। वहीं वीफर मानते हैं कि हमले पूरी तरह रुक भी जाएं तो किल्लत सितंबर तक खिंच सकती है, क्योंकि खेती के मौसम में ईंधन की मांग सबसे ऊपर पहुंच जाती है।
रूस ड्रोन हमलों को रोक क्यों नहीं पा रहा
यह जंग अब अपने पांचवें साल में है, और यूक्रेन ने रूस की रिफाइनरियों तक पहुंचने के लिए मुख्य रूप से लंबी दूरी के ड्रोन का सहारा लिया है। इन ड्रोन को रूस आसमान से गिरा नहीं पा रहा, और इसकी तीन बड़ी वजहें हैं।
1. ये ड्रोन बचकर निकलने के लिए बने हैं
फायर पॉइंट का बनाया यूक्रेन का FP-1 ड्रोन 1,900 किलोमीटर से ज्यादा उड़ सकता है। इसका इस्तेमाल मॉस्को और साइबेरिया की ट्युमेन रिफाइनरी तक गहरे हमलों में हुआ है। यूक्रेन के पास मोरोक और बार्स जैसे दूसरे लंबी दूरी के हमलावर ड्रोन भी हैं। FP-1 सिर्फ सैटेलाइट नेविगेशन पर निर्भर रहने के बजाय स्टारलिंक कनेक्टिविटी का सहारा लेता है, जिससे ऑपरेटर इसे मिशन के आखिरी पल तक चला सकते हैं और इसे गिराना कहीं ज्यादा मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा यूक्रेन AI की मदद वाली ड्रोन तकनीक भी इस्तेमाल कर रहा है, जिसे अमेरिकी कंपनियों की मदद से तैयार किया गया है, ताकि रूसी रडार और वायु रक्षा की कमजोर कड़ियों को पहचाना जा सके और उनके बीच से सुरक्षित रास्ते चुने जा सकें।
2. सस्ते ड्रोन गिराना बेहद महंगा पड़ता है
रूस की वायु रक्षा S-300, S-400 और S-500 जैसी प्रणालियों पर टिकी है, जो तेज रफ्तार लड़ाकू विमानों, बैलिस्टिक मिसाइलों और दूसरे ऊंचाई पर उड़ने वाले खतरों को गिराने के लिए बनी हैं। यूक्रेनी ड्रोन इसके ठीक उलट काम करते हैं, ये करीब 150 किलोमीटर प्रति घंटे की धीमी रफ्तार से और जमीन से महज 50 मीटर की ऊंचाई पर उड़ते हैं, जिससे इन्हें पकड़ना और मार गिराना बहुत मुश्किल हो जाता है। यूक्रेन अपने ड्रोन को रूस की वायु रक्षा प्रणालियों पर भी दाग रहा है, जिससे उनकी पहले से चेतावनी देने की क्षमता कमजोर पड़ रही है।
इसका अर्थशास्त्र रूस के खिलाफ है। एक FP-1 ड्रोन की कीमत करीब 47 लाख रुपये है, और इस साल अप्रैल तक यूक्रेन पहले के मुकाबले करीब तीन गुना ड्रोन बना रहा था। एक ड्रोन को गिराने के लिए रूस अक्सर टोर, पैंटसिर या S-400 प्रणाली से एक इंटरसेप्टर मिसाइल दागता है, जिनमें से हर एक की कीमत कई करोड़ रुपये होती है, यानी बचाव उस हमले से कहीं ज्यादा महंगा पड़ जाता है जिसे वह रोकना चाहता है। पश्चिमी देशों की पाबंदियों ने हालात और बिगाड़ दिए हैं, क्योंकि इनसे रूस को वे उन्नत इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जे नहीं मिल पा रहे जिनकी जरूरत नए एंटी-ड्रोन सिस्टम बनाने में होती है।
3. सबसे बड़ा देश होना ही उल्टा पड़ रहा है
रूस का विशाल आकार, जो आम तौर पर उसकी ताकत है, अब एक कमजोरी बन गया है और यूक्रेन इसका पूरा फायदा उठा रहा है। रूस के पास इतने वायु रक्षा लॉन्चर ही नहीं हैं कि वह अपनी सीमा में फैली हर रिफाइनरी, हर ईंधन डिपो और हर एयरबेस की रक्षा कर सके। यह धरती का सबसे बड़ा देश है, जो करीब 1.7 करोड़ वर्ग किलोमीटर में फैला है, यानी धरती की कुल जमीन के 11% से भी ज्यादा। इतने बड़े इलाके की एक साथ रखवाली करना लगभग नामुमकिन है। इन सबके बावजूद राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आत्मविश्वास से भरे नजर आए और बोले: "हमने अपनी वायु रक्षा प्रणाली को मजबूत किया है, और क्षतिग्रस्त रिफाइनरियों की मरम्मत भी जल्द पूरी कर ली जाएगी।"











