भारत सरकार विदेशी दान से जुड़े कानूनों को और अधिक पारदर्शी और सख्त बनाने के उद्देश्य से विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) में बड़े बदलाव करने जा रही है। लोकसभा में 25 मार्च 2026 को पेश किए गए संशोधन विधेयक को लेकर देश के राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अमेरिकी जनप्रतिनिधियों की ओर से इस पर प्रतिक्रियाएं आई हैं। संसद के वर्तमान सत्र में इस विधेयक पर होने वाली चर्चा के दौरान गृह मंत्री अमित शाह सरकार का पक्ष रख सकते हैं। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य किसी गैर सरकारी संगठन (NGO) का पंजीकरण समाप्त या रद्द होने की स्थिति में विदेशी दान से खड़ी की गई संपत्तियों की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए एक सरकारी प्राधिकरण की व्यवस्था करना है। हालांकि, इस प्रावधान को लेकर अल्पसंख्यक संस्थाओं, ईसाई मिशनरियों और विपक्षी दलों की ओर से विरोध दर्ज कराया जा रहा है, जिससे सरकार के सामने एक नया रणनीतिक समीकरण बन गया है।
विदेशी फंडिंग कानून का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पिछले संशोधन
भारत में विदेशी अंशदान को नियंत्रित करने वाले FCRA कानून का इतिहास काफी पुराना है। इसकी शुरुआत 1976 में आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा की गई थी। उस समय कानून बनाने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि विदेशी ताकतें धन का प्रलोभन देकर गैर सरकारी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक न्यासों के माध्यम से भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न कर सकें। समय के साथ विभिन्न सरकारों ने इस कानून में आवश्यकतानुसार संशोधन किए।
साल 2010 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने इस कानून के नियमों को और अधिक कड़ा बनाया था। इसके बाद साल 2020 में नरेंद्र मोदी सरकार ने इसमें ऐतिहासिक बदलाव किए। 2020 के संशोधनों के तहत एनजीओ द्वारा प्रशासनिक खर्चों पर विदेशी फंड के उपयोग की सीमा को 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया। इसके अलावा, विदेशी दान प्राप्त करने के लिए नई दिल्ली स्थित भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की मुख्य शाखा में ही खाता खोलना अनिवार्य कर दिया गया। साथ ही, सब-ग्रांट व्यवस्था पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे बड़े संगठन अब अपनी फंडिंग का हिस्सा छोटे सहयोगी संगठनों को हस्तांतरित नहीं कर सकते।
साल 2026 में सरकार द्वारा उठाए गए तीन बड़े कदम
साल 2026 में गृह मंत्रालय ने विदेशी फंडिंग की निगरानी को और प्रभावी बनाने के लिए तीन महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इनमें से दो नियम जून 2026 में लागू किए जा चुके हैं, जबकि तीसरा प्रावधान विधेयक के रूप में संसद के विचाराधीन है।
पहला नियम, जो जून 2026 में लागू हुआ, उसके अनुसार अब प्रत्येक पंजीकृत संस्था को अपने पंजीकरण प्रमाण पत्र पर यह स्पष्ट लिखना होगा कि वह किस विशिष्ट कार्य के लिए और किस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में विदेशी धन का उपयोग करेगी। पहले सामाजिक या धार्मिक जैसे व्यापक श्रेणियों का उल्लेख होता था, लेकिन अब सूक्ष्म स्तर पर कार्यक्षेत्र की जानकारी देना अनिवार्य है।
दूसरा नियम भी जून 2026 में लागू किया गया, जिसके तहत विदेशी फंडिंग के जरिए की जाने वाली धार्मिक गतिविधियों की सीमाएं तय की गई हैं। नए नियमों के अनुसार, विदेशी पैसे से पूजा स्थल बनाना, धार्मिक शिक्षा देना या सत्संग आयोजित करना जैसे कार्य किए जा सकते हैं, परंतु विदेशी फंड का उपयोग किसी भी स्थिति में धर्मांतरण कराने के लिए नहीं किया जा सकता।
तीसरा और सबसे प्रमुख प्रावधान वह संशोधन विधेयक है जो 25 मार्च 2026 को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था। इसके तहत यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस समाप्त हो जाता है या सरकार द्वारा रद्द कर दिया जाता है, तो उस संस्था की विदेशी दान से निर्मित संपत्तियों और शेष धनराशि का प्रबंधन, रखरखाव और सुरक्षा सरकार द्वारा नियुक्त एक अधिकृत प्राधिकारी संभालेगा।
सरकारी तर्क और प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता
विधेयक के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि इन संशोधनों का मुख्य मकसद FCRA कानून की पुरानी विसंगतियों और व्यावहारिक कमियों को दूर करना है। अब तक ऐसा कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा मौजूद नहीं था जो यह तय करता कि लाइसेंस रद्द होने की स्थिति में संबंधित संस्था की संपत्तियों और बैंक खातों में जमा विदेशी पैसों का क्या होगा।
सरकार का मानना है कि नया कानूनी प्रावधान इस शून्य को भरने का काम करेगा। गृह मंत्रालय के अनुसार, इन बदलावों का अंतिम लक्ष्य पूरी वित्तीय पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करना है ताकि विदेशी संसाधनों का दुरुपयोग रोका जा सके और संपत्ति की देखरेख एक वैधानिक संस्था द्वारा की जा सके।
अल्पसंख्यक संस्थाओं, विशप्स और अमेरिकी नेताओं की चिंताएं
इस संशोधन विधेयक को लेकर ईसाई संस्थाओं, चर्चों, एनजीओ और विपक्षी नेताओं द्वारा कई तरह की शंकाएं जताई गई हैं। सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि वर्षों के प्रयास और सामाजिक सेवा से निर्मित ढांचे का नियंत्रण सरकार के पास चला जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी सांसद राइली मूरे ने इस विधेयक पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, "यह ईसाइयों पर सीधा हमला है।" वहीं भारत में कैथोलिक विशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) ने गृह मंत्री अमित शाह से संपर्क कर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। CBCI का कहना है कि कागजी कार्रवाई और फॉर्म भरने के दौरान तकनीकी या लिपिकीय गलतियां होना स्वाभाविक है। ऐसे में सामान्य प्रशासनिक भूल के लिए लाइसेंस रद्द करने या संपत्ति जब्त करने जैसी सख्त कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, बल्कि ऐसी कार्रवाई केवल देशविरोधी गतिविधियों के प्रमाणित मामलों तक ही सीमित रहनी चाहिए।
पुराने मामलों पर इस कानून के प्रभाव को लेकर जताई जा रही आशंकाओं पर गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया है कि यह संशोधन पिछली तारीख से लागू नहीं होगा, अर्थात पुराने मामलों पर इसका असर नहीं पड़ेगा। इसके बावजूद विरोध के स्वर बने हुए हैं। ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के अध्यक्ष विशप जोसेफ डी'सूजा ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "यह कानून ईसाई संस्थाओं और उनकी संपत्तियों की सीधी लूट और चोरी है।" वहीं कांग्रेस नेता के. सी. वेणुगोपाल ने आरोप लगाया, "यह विधेयक अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए जा रहे एनजीओ और सामाजिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाएगा।"
विदेशी फंडिंग में गिरावट और सामाजिक सेवाओं पर प्रभाव
विदेशी अंशदान के कड़े नियमों का असर भारत के सामाजिक क्षेत्र पर भी दिखाई दे रहा है। आंकड़ों का हवाला देते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि पूर्व में लागू किए गए सख्त प्रावधानों के कारण विदेशी फंडिंग में 87 प्रतिशत तक की भारी कमी आई है, जिसके चलते देश भर में हजारों स्वयंसेवी संस्थाएं बंद हो चुकी हैं।
वर्तमान में भारत में लगभग 16 हजार संस्थाएं FCRA के तहत पंजीकृत हैं, जिन्हें प्रतिवर्ष लगभग ₹22 हजार करोड़ का विदेशी दान प्राप्त होता है। यह धनराशि देश के दूर-दराज इलाकों में स्कूल, अस्पताल, राहत कार्य और सामाजिक कल्याण की योजनाएं चलाने में उपयोग की जाती है। संस्थाओं को डर है कि नए नियमों के लागू होने से इस पूरे सामाजिक सेवा ढांचे के वित्तीय आधार पर असर पड़ सकता है।
संसद के दोनों सदनों का गणित और विधायी समीकरण
तकनीकी रूप से FCRA संशोधन विधेयक एक साधारण विधेयक है, जिसे संसद के दोनों सदनों में पास कराने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत (50 प्रतिशत + 1) की आवश्यकता होती है।
लोकसभा के कुल 543 सदस्यों में से 3 सीटें वर्तमान में रिक्त हैं। यदि सभी 540 सदस्य मतदान में भाग लेते हैं, तो बहुमत का आंकड़ा 271 होता है। वर्तमान में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के पास 318 सदस्य हैं, जो आवश्यक बहुमत के आंकड़े से काफी अधिक है।
वहीं 245 सदस्यों वाली राज्यसभा में साधारण बहुमत के लिए 123 वोटों की जरूरत होती है, जबकि एनडीए के पास 152 सीटें हैं। इस प्रकार, विशुद्ध संसदीय गणित के दृष्टिकोण से सरकार के पास इस विधेयक को दोनों सदनों में स्वतंत्र रूप से पारित कराने के लिए पर्याप्त संख्याबल मौजूद है।
परिसीमन विधेयक की प्राथमिकता और राजनीतिक धर्मसंकट
संसदीय बहुमत के बावजूद सरकार के सामने एक बड़ा राजनीतिक धर्मसंकट खड़ा हो गया है। सरकार की प्राथमिक प्राथमिकता FCRA विधेयक के बजाय परिसीमन विधेयक को पारित कराना है, जिसके लिए संविधान संशोधन के तहत दो-तिहाई विशेष बहुमत की आवश्यकता है। बजट सत्र के दौरान यह विधेयक पारित नहीं हो सका था और सरकार बहुमत के आंकड़े से 54 वोट दूर रह गई थी।
परिसीमन विधेयक के लिए सरकार अन्य दलों से समर्थन जुटाने के प्रयास में लगी है। जून 2026 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसदों और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के 6 सांसदों ने एनडीए समर्थित दलों का रुख किया। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी झामुमो के 3 सांसद भी समर्थन पर विचार कर रहे हैं। इसके अलावा एम. के. स्टालिन की द्रमुक (22 सांसद) और सुप्रिया सुले की राकांपा (शरद पवार गुट, 8 सांसद) से भी बातचीत हुई है। यदि ये दल समर्थन देते हैं तो आंकड़ा 351 तक पहुंच जाता है, जो परिसीमन विधेयक के लिए आवश्यक बहुमत के करीब है।
परंतु FCRA विधेयक के चलते यह राजनीतिक गणित उलझ गया है। द्रमुक, राकांपा (शरद पवार) और बजट सत्र में समर्थन देने वाली वाईएसआर कांग्रेस पार्टी इस संशोधन विधेयक का विरोध कर रही हैं। इन क्षेत्रीय दलों को डर है कि विधेयक का समर्थन करने से उनका ईसाई और मुस्लिम वोट बैंक प्रभावित हो सकता है। यदि सरकार इन दलों की सहमति के बिना FCRA विधेयक पास कराती है, तो परिसीमन विधेयक पर उनका समर्थन मिलना कठिन हो जाएगा। दूसरी ओर, यदि ये दल FCRA विधेयक का विरोध कर परिसीमन विधेयक में सरकार का साथ देते हैं, तो उनकी राजनीतिक छवि पर सवाल उठ सकते हैं। यही वजह है कि सरकार इस विधेयक को आगे बढ़ाने में फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।


















