पश्चिम एशिया के अशांत रणक्षेत्र में नए कूटनीतिक समीकरणों ने इस्लामाबाद के हुक्मरानों को एक अप्रत्याशित दोराहे पर खड़ा कर दिया है। रियाद के साथ किए गए एक बहुचर्चित सुरक्षा समझौते के चलते पाकिस्तान अब एक ऐसे क्षेत्रीय टकराव के मुहाने पर पहुंच चुका है, जहां से कदम पीछे खींचना उसके लिए आर्थिक तौर पर महंगा साबित हो सकता है और आगे बढ़ना घरेलू सुरक्षा के लिए विनाशकारी। यमन सीमा पर हूती लड़ाकों की ओर से तेज हुए हमलों और ईरान समर्थित विद्रोही गुटों के साथ फिर से शुरू हुई तल्खी ने पाकिस्तानी सेना के शीर्ष नेतृत्व को असहज स्थिति में डाल दिया है।
आर्थिक लाभ की उम्मीद और बदलती जमीनी हकीकत
बीते वर्ष सितंबर माह में जब सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ रियाद के मंच पर दिखे थे, तब इस रणनीतिक साझेदारी को मुल्क की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के लिए जीवनदान माना गया था। इस व्यवस्था का मुख्य खाका यह था कि रियाद इस्लामाबाद की झोली में भारी-भरकम कर्ज और अरबों डॉलर का प्रत्यक्ष निवेश डालेगा, जबकि बदले में पाकिस्तानी फौज सऊदी सैनिकों को आधुनिक युद्धक प्रशिक्षण मुहैया कराएगी और बाहरी आक्रमण की स्थिति में उसकी क्षेत्रीय संप्रभुता की ढाल बनेगी।
उस वक्त पाकिस्तानी रणनीतिकारों ने यह पूर्वधारणा बना रखी थी कि वाशिंगटन और तेहरान के कूटनीतिक संबंध सुधर जाएंगे, जिसके नतीजे में खाड़ी क्षेत्र में पनप रहा सैन्य तनाव खुद-ब-खुद शांत हो जाएगा। लेकिन यह कूटनीतिक गणित पूरी तरह उलट गया। अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरानी ठिकानों पर की गई बमबारी और उसके पलटवार के रूप में खाड़ी देशों पर तेहरान के मिसाइल हमलों ने इस पूरे इलाके को बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया।
मक्का रक्षा समझौते का विस्तार और सामूहिक सुरक्षा की शर्त
अगस्त के महीने में इस द्विपक्षीय समझौते में एक तीसरा साझेदार तुर्की भी शामिल हो गया। तीन देशों के इस समूह ने अपने साझा सहयोग को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते का औपचारिक नाम दिया। इस त्रिपक्षीय संधि का सबसे कठोर और संवेदनशील प्रावधान यह तय किया गया कि तीनों में से किसी भी एक सदस्य मुल्क पर हुआ सैन्य हमला बाकी दोनों देशों पर हमला समझा जाएगा।
यही सामूहिक सुरक्षा का नियम अब पाकिस्तान के गले की फांस बन चुका है। यमन में सक्रिय हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के साथ पूर्व में बनी नाजुक सहमति को तोड़ते हुए कई इलाकों पर नियंत्रण कर लिया और सीमा पार ड्रोन व मिसाइलें दागना शुरू कर दिया। रियाद ने भी जवाबी हवाई कार्रवाई तेज कर दी है। रक्षा विश्लेषक आयशा सिद्दीका के अनुसार, मुनीर इस क्षेत्र के वास्तविक खतरों को भांपने और पाकिस्तानी सैनिकों की अग्रिम मोर्चे पर जल्द तैनाती की अनिवार्यता का आकलन करने में नाकाम रहे।
रियाद की तकनीकी ताकत और जमीनी जंग का अनुभव
सऊदी अरब के पास अत्याधुनिक लड़ाकू विमान और विश्वस्तरीय रक्षा उपकरण मौजूद हैं, मगर जब बात हूती जैसे छापामार लड़ाकों के विरुद्ध सीधे जमीनी टकराव की आती है, तो उसकी सेना के पास व्यावहारिक तजुर्बे की भारी कमी खलती है। इसी कमी को पाटने के लिए पाकिस्तानी सैनिकों की भूमिका रियाद के लिए अपरिहार्य मानी जा रही है, क्योंकि पाकिस्तानी सुरक्षा बल लंबे समय से सीमाई विद्रोहों और हिंसक चुनौतियों से निपटने का लंबा अनुभव रखते हैं।
यदि सऊदी हुकूमत ने मक्का संधि के सुरक्षा प्रावधानों को लागू करने की औपचारिक मांग रख दी, तो इस्लामाबाद को युद्ध क्षेत्र में अपने दस्ते भेजने के लिए विवश होना पड़ सकता है। इसमें वे हजारों पाकिस्तानी फौजी भी शामिल हो सकते हैं जो पहले से ही सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों के तहत सऊदी अरब की धरती पर तैनात हैं। पाकिस्तान इस दबाव को आसानी से नजरअंदाज इसलिए नहीं कर सकता, क्योंकि रियाद ने हाल ही में उसे 8 अरब डॉलर यानी 6 अरब पाउंड का विशाल आर्थिक पैकेज दिया है, जिसके जरिए रक्षा उत्पादन और दोनों देशों के बीच व्यापारिक निवेश की जमीन तैयार की गई थी।
ईरान सीमा का संकट और घरेलू बगावत का खतरा
इस्लामाबाद के नीति निर्माताओं को सबसे बड़ा डर यह सता रहा है कि यमन के विद्रोही गुटों के खिलाफ मैदान में उतरते ही वह सीधे तौर पर तेहरान के सामने खड़ा नजर आएगा। पाकिस्तान की लंबी सीमा ईरान से लगती है और वहां पहले से ही अलगाववादी गतिविधियों और सीमाई उथल-पुथल का माहौल बना रहता है। हूती गुट के खिलाफ खुला मोर्चा खोलने का सीधा संदेश यह जाएगा कि पाकिस्तान ने ईरान के खिलाफ एक पक्ष चुन लिया है, जिसका खामियाजा उसे अपनी पश्चिमी सरहद पर भुगतना पड़ सकता है।
संसद के भीतर भी इस मसले पर गंभीर विरोध के सुर उभर रहे हैं। पाकिस्तान की सीनेट में विपक्ष के नेता राजा नासिर अब्बास ने साफ चेतावनी दी है कि मुल्क को ऐसे युद्ध में कूदने से बचना चाहिए क्योंकि यह भारी तबाही लाएगा। उनका तर्क है कि पाकिस्तान पहले से ही दो खतरनाक आंतरिक विद्रोहों से जूझ रहा है और आम जनता कमरतोड़ महंगाई व ढहती अर्थव्यवस्था से त्रस्त है।
पवित्र स्थल की सुरक्षा और समुद्री व्यापार पर गहराता साया
यह क्षेत्रीय संघर्ष केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि ऊर्जा बुनियादी ढांचे और समुद्री व्यापार मार्गों के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है। हालिया घटनाक्रमों में पवित्र शहर मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को सऊदी वायु रक्षा प्रणाली ने हवा में ही नष्ट कर दिया। इस तरह की घटनाओं ने पूरे इलाके में खतरे की घंटी बजा दी है, जिससे पाकिस्तान के लिए इस समझौते के तहत तटस्थ बने रहना दिन-ब-दिन नामुमकिन होता जा रहा है।



















