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देह व्यापार की पीढ़ियों पुरानी बेड़ियों को काटने के लिए वाडिया में बच्चियों की सगाई बनी सुरक्षा कवचगुजरात
20 सित॰ 2026, 7:47 pm (22 मिनट पहले)· 1

देह व्यापार की पीढ़ियों पुरानी बेड़ियों को काटने के लिए वाडिया में बच्चियों की सगाई बनी सुरक्षा कवच

गुजरात के बनासकांठा जिले के वाडिया गांव में देह व्यापार के दलदल से बेटियों को बचाने के लिए परिवार कम उम्र में ही उनकी सगाई तय कर रहे हैं, जबकि सामाजिक पहलों से शिक्षा और पुनर्वास की नई राहें भी खुल रही हैं।

अहमदाबाद से लगभग दो सौ किलोमीटर की दूरी पर बसा गुजरात का वाडिया गांव एक लंबे और त्रासद सामाजिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। बनासकांठा जिले के अंतर्गत आने वाले इस छोटे से गांव की कुल आबादी लगभग साढ़े सात सौ लोगों की है। सदियों से घुमंतू समुदाय की पृष्ठभूमि से जुड़े इस गांव में महिलाएं पीढ़ियों से जबरन देह व्यापार के अंधेरे दलदल में धकेली जाती रही हैं। परिवारों के भीतर यह स्थिति इस हद तक सामान्य व्यवस्था मान ली गई थी कि घर के पुरुष ही अपनी पत्नियों और परिवार की अन्य महिलाओं के लिए ग्राहकों का इंतजाम करते थे। अब उसी काले साये से अपनी नई पीढ़ी को बचाने के लिए यहां के लाचार माता-पिता एक अनूठा और विवादास्पद रास्ता अपना रहे हैं, जहां महज सात साल की मासूम बच्चियों की सगाई कर दी जाती है ताकि उन पर किसी की बुरी नजर न पड़े।

हाईवे पर आजीविका की आड़ में चलता था शोषण का जाल

इस गांव के सामाजिक ताने-बाने पर गरीबी और भुखमरी का साया इतना गहरा रहा है कि रोजमर्रा का जीवन भी विकृत नियमों में बंध गया था। हर सुबह गांव के कई पुरुष काम की तलाश के नाम पर पालनपुर-थराद हाईवे की तरफ रुख करते थे। उनका मकसद कोई नियमित रोजगार या मजदूरी ढूंढना नहीं होता था, बल्कि हाईवे से गुजरने वाले ट्रक ड्राइवरों और राहगीरों को बहला-फुसलाकर अपनी ही घर की औरतों के पास ग्राहक बनाकर लाना होता था। यह प्रक्रिया वर्षों तक इतनी सामान्य मानी जाती रही कि कई बेटियों को होश संभालने के बाद यह तक पता नहीं चल पाता था कि जिस व्यक्ति को वे पिता कह रही हैं, वह वाकई उनके जैविक पिता हैं या नहीं। पीढ़ियों तक चले इस अमानवीय सिलसिले ने अनगिनत जिंदगियों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया।

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कुप्रथा की काट बना बचपन की सगाई का अनकहा नियम

कानूनी रूप से देश में बाल विवाह पर पूरी तरह पाबंदी है, लेकिन वाडिया में सात से बारह साल की उम्र में बेटियों की सगाई तय करना उनके लिए किसी रक्षा कवच की तरह काम करता है। स्थानीय समुदाय में एक अघोषित सामाजिक सहमति बन चुकी है कि जिस लड़की की सगाई तय हो जाती है या जिसका रिश्ता पक्का कर दिया जाता है, उसे देह व्यापार के इस गंदे तंत्र से पूरी तरह अलग और सुरक्षित रखा जाएगा। नतीजतन, अपनी संतानों को देह शोषण की इस भयानक त्रासदी से बचाने के लिए माता-पिता कानूनी बुराई समझे जाने वाले बाल सगाई के रिवाज को ढाल की तरह इस्तेमाल करने पर विवश हैं।

इस दर्द भरे माहौल से निकलकर अपनी जिंदगी संवारने वाली उन्नीस साल की एक युवती का अनुभव इस हकीकत को साफ बयां करता है। उस युवती की मां और दादी दोनों इसी दलदल में पिसती रही थीं। हालांकि, उसकी मां ने यह पक्का इरादा कर लिया था कि वह अपनी संतान को किसी भी कीमत पर इस नारकीय व्यवस्था में नहीं जाने देंगी। उस बच्ची की महज ग्यारह साल की उम्र में सगाई करा दी गई और अठारह साल की आयु पूरी होते ही उसकी विधिवत शादी करा दी गई। वर्तमान में वह गांव की सीमाओं से बहुत दूर एक कॉलेज में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही है और सम्मानजनक जिंदगी बिता रही है। इसी तरह पंद्रह साल की उम्र में इस दलदल में झोंक दी गई एक अन्य महिला ने भी अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए बारह साल की उम्र में उसकी सगाई तय कर दी, जिससे उसका बीता हुआ कल बेटी के भविष्य पर ग्रहण न बन सके।

मेवाड़ के इतिहास से जुड़े तार और सामाजिक बदलाव की शुरुआत

सरानिया समुदाय के ऐतिहासिक संदर्भ बताते हैं कि कभी इनके पूर्वज मेवाड़ के महाराणा प्रताप की सेना के साथ चला करते थे। उस दौर में इस समुदाय के पुरुष योद्धाओं की तलवारों और ढालों की धार तेज करने का काम संभालते थे, जबकि महिलाएं शिविरों में सैनिकों के मनोरंजन का जरिया बनती थीं। स्वतंत्रता के बाद जब पारंपरिक कार्य समाप्त हो गए और रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हुआ, तो बदहाली और उपेक्षा के चलते इस समुदाय ने देह व्यापार की दिशा पकड़ ली।

साल 2012 में वाडिया गांव के हालात बदलने की दिशा में पहली बड़ी रोशनी नजर आई। गैर-सरकारी संगठनों और समाजसेवियों ने सीधे गांव पहुंचकर लोगों को जागरूक करना शुरू किया। विचरता समुदाय समर्थन मंच की संस्थापक मित्तल पटेल ने गांव के परिवारों के बीच जाकर सघन काउंसलिंग की और उन्हें अपनी बच्चियों को इस दलदल में झोंकने से रोका। इस सामाजिक पहल के चलते गांव में पहली बार सामूहिक विवाह समारोह आयोजित किए जाने लगे, जो परंपरा अब हर साल जारी रखी जाती है। हालांकि कम उम्र में सगाई कराने के फैसले को आदर्श नहीं माना जा सकता, लेकिन स्थानीय लोग इसे देह व्यापार के अमानवीय दलदल में फंसने की तुलना में कहीं बेहतर और सुरक्षित मानते हैं। आज वाडिया की बेटियां स्कूल और कॉलेज जाने लगी हैं, जो यह साबित करता है कि संगठित सामाजिक सहयोग से इस पीढ़ियों पुरानी कुप्रथा को हमेशा के लिए जड़ से मिटाया जा सकता है।

सवाल-जवाब

वाडिया गांव किस राज्य और जिले में स्थित है?
वाडिया गांव गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित है और यह अहमदाबाद से लगभग दो सौ किलोमीटर दूर है।
वाडिया गांव की कुल आबादी कितनी है?
इस गांव की कुल आबादी लगभग साढ़े सात सौ लोगों की है।
माता-पिता अपनी छोटी बेटियों की सगाई इतनी कम उम्र में क्यों कर रहे हैं?
गांव के अनकहे नियम के अनुसार सगाईशुदा लड़कियों को देह व्यापार में नहीं धकेला जाता, इसलिए माता-पिता सात से बारह साल की उम्र में सगाई कराकर उन्हें इस दलदल से बचाते हैं।
वाडिया गांव में बदलाव की शुरुआत किस साल से हुई?
साल 2012 में गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की पहल के बाद गांव में बदलाव की शुरुआत हुई।
विचरता समुदाय समर्थन मंच की किस संस्थापक ने गांव में सुधार की पहल की?
विचरता समुदाय समर्थन मंच की संस्थापक मित्तल पटेल ने परिवारों की काउंसलिंग कर सामूहिक विवाह की शुरुआत कराई।
सरानिया समुदाय का ऐतिहासिक संबंध किससे रहा है?
सरानिया समुदाय के पूर्वज मेवाड़ के महाराणा प्रताप की सेना के साथ चलते थे, जहां पुरुष तलवारों और ढालों की धार तेज करते थे और महिलाएं सैनिकों का मनोरंजन करती थीं।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 मिनट पहले

एक अपराध संवाददाता के रूप में, यह रिपोर्ट हमारे कानून-व्यवस्था तंत्र पर गंभीर सवाल उठाती है। यह अत्यंत चिंताजनक है कि परिवारों को देह व्यापार और मानव तस्करी जैसे जघन्य अपराध से बच्चियों को बचाने के लिए बाल सगाई जैसी सामाजिक रूप से गैर-कानूनी प्रथा का सहारा लेना पड़ रहा है। जब सरकारी सुरक्षा और पुनर्वास योजनाएं जमीन पर कमजोर होती हैं, तब ऐसे विरोधाभास पैदा होते हैं जहां एक बड़े अपराध से बचने के लिए कानून का उल्लंघन ही एकमात्र ढाल बन जाता है। पुलिस, बाल संरक्षण इकाइयों और न्यायिक तंत्र को तुरंत हस्तक्षेप कर मजबूत पुनर्वास नीतियां लागू करनी होंगी ताकि बच्चियों को कानून के दायरे में सुरक्षा मिले।

Rohan Verma@rohan-verma·1 मिनट पहले

करन की बात बिल्कुल सही है। नीतिगत और जमीनी स्तर पर यह स्थिति कानून और सामाजिक सुरक्षा के बीच के गहरे फासले को उजागर करती है। जब तक प्रशासन केवल कानूनी प्रतिबंधों के बजाय पीड़ितों के लिए शिक्षा, रोजगार और व्यावहारिक पुनर्वास के ठोस विकल्प जमीन पर नहीं उतारेगा, तब तक लाचार परिवारों को ऐसे ही विरोधाभासी कदम उठाने पड़ेंगे। बाल सगाई को ढाल बनाना राज्य के सुरक्षा तंत्र की विफलता है। यह बच्चियों के अधिकारों को एक दूसरे दायरे में सीमित करता है। इस अमानवीय चक्र को तोड़ने के लिए व्यापक सामाजिक-आर्थिक नीतिगत हस्तक्षेप और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की तुरंत जरूरत है।

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