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बुकर पुरस्कार से लेकर कश्मीर विवाद तक, जानिए दो ध्रुवों में क्यों बंटी है अरुंधति रॉय की पहचानजम्मू-कश्मीर
7 अग॰ 2026, 10:12 pm (2 घंटे पहले)· 0

बुकर पुरस्कार से लेकर कश्मीर विवाद तक, जानिए दो ध्रुवों में क्यों बंटी है अरुंधति रॉय की पहचान

लेखिका अरुंधति रॉय के नए संस्मरण के हिंदी संस्करण का लोकार्पण होते ही उनकी साहित्यिक प्रतिभा और विवादित राजनीतिक बयानों को लेकर बहस एक बार फिर छिड़ गई है।

साहित्यिक जगत में बुकर पुरस्कार जीतने की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि से लेकर कश्मीर के मुद्दों पर अपने तीखे और विवादित बयानों तक, प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय हमेशा जनचर्चा के केंद्र में रही हैं। भारत में उनके लेखन के प्रशंसक जितने बड़ी संख्या में मौजूद हैं, कश्मीर पर उनके राजनीतिक रुख के आलोचक भी उतने ही मुखर हैं। हाल के दिनों में यह दोहरी छवि एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आ गई है। इस नई चर्चा की मुख्य वजह उनकी प्रसिद्ध पुस्तक मदर मैरी कम्स टू मी का हिंदी अनुवाद है, जिसे मेरी माँ मेरी गैंगस्टर के नाम से प्रकाशित किया गया है। यह पुस्तक दुनिया भर की 45 भाषाओं में अनूदित की जा चुकी है, जो उनकी वैश्विक पहुंच को दर्शाती है।

पटना और दिल्ली के आयोजनों से पुनर्जीवित हुई चर्चा

अरुंधति रॉय की इस नई किताब के हिंदी संस्करण का आधिकारिक लोकार्पण 18 जुलाई 2026 को बिहार की राजधानी पटना स्थित अर्थशिला में आयोजित किया गया था। इस गरिमामय कार्यक्रम में लेखिका स्वयं उपस्थित रहीं और श्रोताओं से संवाद किया। इसके पश्चात, 3 अगस्त को देश की राजधानी दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक विशेष परिचर्चा एवं बुक साइनिंग कार्यक्रम रखा गया। इस आयोजन में पाठकों और प्रशंसकों की इतनी भारी भीड़ उमड़ी कि पूरे हॉल में खड़े होने तक की जगह नहीं बची थी। जहां एक तरफ इन साहित्यिक मंचों पर उनकी पुस्तक की जमकर सराहना हुई, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर उनके पुराने बयानों और तस्वीरों को शेयर करते हुए उनके राजनीतिक विचारों की तीखी आलोचना भी देखने को मिली।

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संस्मरण में मातृत्व, सत्ता और संघर्ष के अनुभव

यह नई पुस्तक मूल रूप से एक संवेदनशील संस्मरण है, जिसमें अरुंधति अपनी दिवंगत माँ मैरी रॉय के साथ अपने गहरे और जटिल संबंधों की परतें उघाड़ती हैं। इस आत्मकथात्मक कृति में प्रेम, वैचारिक टकराव, मातृत्व, स्त्री अस्मिता और सामाजिक-राजनीतिक सत्ता जैसे गंभीर विषयों को बड़ी बारीकी से पिरोया गया है। लेखिका ने इसमें 16 साल की उम्र में पहली बार दिल्ली आगमन के अपने शुरुआती दिनों से लेकर अपनी माँ के जीवन के अंतिम पलों तक की कई पुरानी स्मृतियों को पाठकों के साथ साझा किया है। मां-बेटी के इस अनूठे रिश्ते की कहानी ने पाठकों को गहराई से प्रभावित किया है।

अंतरराष्ट्रीय ख्याति और निर्भीक लेखन की पहली छवि

अरुंधति रॉय की पहली पहचान एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत और साहसी लेखिका की है। वर्ष 1997 में प्रकाशित उनके पहले उपन्यास द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स ने प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार जीतकर इतिहास रचा था। किसी भारतीय नागरिक के लिए यह अत्यंत गौरवशाली उपलब्धि थी और इस पुस्तक ने वैश्विक साहित्य जगत में तहलका मचा दिया था। इसके बाद उन्होंने अपना दूसरा चर्चित उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस लिखा, जिसे भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पढ़ा गया। इसके अलावा उन्होंने नर्मदा बाँध परियोजना, आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के अधिकार, जाति व्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण जैसे ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर अनेक निबंध संग्रह लिखे। सत्ता प्रतिष्ठान की निडर आलोचना करने वाली उनकी तीखी शैली के कारण एक वर्ग उन्हें अत्यंत साहसी और स्वतंत्र विचारक मानता है।

कश्मीर संबंधी बयानों से उपजा विवाद और दूसरी छवि

हालांकि, उनकी इस प्रतिष्ठित साहित्यिक छवि के साथ ही एक अत्यंत विवादित राजनीतिक छवि भी जुड़ी हुई है, जिसने देश के एक बड़े वर्ग को नाराज किया है। यह विवाद मुख्य रूप से कश्मीर पर दिए गए उनके बयानों से संबंधित है। अरुंधति रॉय ने विभिन्न अवसरों पर यह विचार व्यक्त किया है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है। 21 अक्टूबर 2010 को दिल्ली में आयोजित आज़ादी - द ओनली वे शीर्षक वाले एक सेमिनार में बोलते हुए उन्होंने कहा था कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं रहा और यह एक ऐतिहासिक तथ्य है जिसे भारतीय सरकार ने भी संयुक्त राष्ट्र में स्वीकार किया है। उन्होंने यह भी जोड़ा था कि भारत को कश्मीर से आजादी की उतनी ही जरूरत है जितनी कश्मीर को भारत से।

विवादित सार्वजनिक मंच और कानूनी कार्रवाई की मांग

दिल्ली के इस आयोजन के ठीक तीन दिन बाद, 24 अक्टूबर 2010 को उन्होंने जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में भी इन्हीं विचारों को दोहराया था। अगले दिन 25 अक्टूबर 2010 को देश के एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्र ने उनके इस वक्तव्य को मुख्य पृष्ठ पर स्थान देते हुए खबर प्रकाशित की थी। इन टिप्पणियों के सार्वजनिक होते ही देश भर में भारी आक्रोश फैल गया था और उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई किए जाने की मांग उठने लगी। आलोचकों का स्पष्ट मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार किसी को भी देश की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के खिलाफ बोलने की अनुमति नहीं देता। सैयद अली शाह गिलानी जैसे भारत विरोधी रुख रखने वाले अलगाववादी नेताओं के साथ मंच साझा करने और कश्मीर में हिंसा का समर्थन करने वाली विचारधारा के करीब खड़े होने को लेकर अधिकांश भारतीयों ने सख्त आपत्ति जताई है।

साहित्यिक अभिव्यक्ति और राष्ट्रीय अखंडता का संतुलन

अरुंधति रॉय का यह साहित्यिक और राजनीतिक विरोधाभास उनकी किताबों में भी दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, उनके उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस में कश्मीरी पृष्ठभूमि वाले पात्र शामिल हैं, वहीं उनके निबंधों में भारत सरकार की नीतियों पर तीखे प्रहार मिलते हैं। वे स्वयं को केवल एक लेखिका न मानकर एक सक्रिय और जागरूक नागरिक के रूप में प्रस्तुत करती हैं। लेकिन उनके आलोचकों का सवाल है कि क्या नागरिक सक्रियता के नाम पर देश विरोधी रुख रखने वाले अलगाववादियों के विचारों का समर्थन करना उचित है? लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान होना आवश्यक है, परंतु एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध व्यक्ति के रूप में उनकी सामाजिक जिम्मेदारी भी बनती है, क्योंकि उनके विचार युवाओं के दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकते हैं।

विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं के प्रति एकसमान रुख

यदि अरुंधति रॉय के राजनीतिक इतिहास का विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि उनका रुख किसी एक विशेष राजनीतिक दल के प्रति नहीं, बल्कि समग्र रूप से भारतीय राज्य व्यवस्था की नीतियों के खिलाफ रहा है। केंद्र में कांग्रेस शासनकाल के दौरान भी उनके तेवर उतने ही तीखे थे जितने कि वर्तमान भाजपा सरकार के दौर में हैं। नर्मदा बाँध, परमाणु नीति, कश्मीर समस्या और आदिवासी अधिकारों जैसे संवेदनशील मामलों पर उन्होंने 2008 और 2010 के दौरान कांग्रेस नीत सरकार के समय भी जोरदार आवाज उठाई थी। उस समय कांग्रेस और भाजपा दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों ने उनके कश्मीर संबंधी बयानों की एकसुर में आलोचना की थी।

निष्कर्ष

संक्षेप में, अरुंधति रॉय की साहित्यिक सफलता और उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान पूरी तरह से निर्विवाद है, जिसकी पुष्टि उनकी नई किताब का 45 भाषाओं में अनूदित होना करता है। लेकिन इसके विपरीत, कश्मीर और देश की संप्रभुता पर उनका स्टैंड आज भी बहुसंख्यक देशवासियों के लिए सर्वथा अस्वीकार्य है। साहित्य की रचनात्मक स्वतंत्रता और देश की अखंडता के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है, और यही कारण है कि अरुंधति रॉय का व्यक्तित्व आज भी दो स्पष्ट ध्रुवों में बंटा हुआ नजर आता है।

सवाल-जवाब

अरुंधति रॉय की किस नई पुस्तक के हिंदी संस्करण का लोकार्पण हुआ है?
उनकी पुस्तक 'मदर मैरी कम्स टू मी' के हिंदी अनुवाद 'मेरी माँ मेरी गैंगस्टर' का लोकार्पण हुआ है, जो उनकी माँ मैरी रॉय के साथ उनके संबंधों पर आधारित संस्मरण है।
इस पुस्तक का हिंदी लोकार्पण कहाँ और कब आयोजित किया गया?
इस पुस्तक के हिंदी संस्करण का लोकार्पण 18 जुलाई 2026 को पटना के अर्थशिला में हुआ, और इसके बाद 3 अगस्त को नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया।
अरुंधति रॉय को किस उपन्यास के लिए बुकर पुरस्कार मिला था?
उन्हें 1997 में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स' के लिए प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
अरुंधति रॉय का कश्मीर पर क्या विवादित बयान रहा है?
21 अक्टूबर 2010 को दिल्ली में आयोजित एक सेमिनार में उन्होंने कहा था कि कश्मीर कभी भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं रहा और यह एक ऐतिहासिक तथ्य है।
क्या अरुंधति रॉय के बयानों का विरोध किसी एक ही राजनीतिक दल ने किया था?
नहीं, कश्मीर पर दिए गए उनके बयानों की आलोचना कांग्रेस और भाजपा दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों ने वर्ष 2008 और 2010 के दौरान की थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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