कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता केवल किताबी ज्ञान से नहीं, बल्कि दिनचर्या और मानसिक मजबूती से तय होती है। रांची के प्रतिष्ठित विद्यालय जेवीएम शामली के प्राचार्य बीएन झा ने अपने तीन दशकों से अधिक के शैक्षणिक सफर के आधार पर छात्रों के लिए चार बुनियादी सिद्धांत रेखांकित किए हैं। उनके मार्गदर्शन में अनगिनत विद्यार्थियों ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा में जगह बनाई है, जबकि कई मेधावियों ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की कठिन प्रवेश परीक्षा में भी सफलता का परचम लहराया है। उनका मानना है कि अगर विद्यार्थी इन चार आदतों को अपने जीवन का हिस्सा बना लें, तो किसी भी परीक्षा में जीत हासिल की जा सकती है।
साधारण शिक्षक से प्राचार्य बनने का लंबा सफर
शिक्षा के क्षेत्र में बीएन झा का अनुभव पूरे 33 वर्षों का है। जब उन्होंने जेवीएम शामली में कदम रखा था, तब वे ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाने वाले एक सामान्य पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षक थे। अपनी निष्ठा और निरंतर परिश्रम के बल पर वे पहले शिक्षक प्रभारी बने, उसके बाद उप प्राचार्य की जिम्मेदारी संभाली और आज वे उसी संस्थान के प्राचार्य पद पर कार्यरत हैं। अध्यापन के इस लंबे दौर में उन्होंने हजारों बच्चों की मानसिक बनावट, उनके संघर्ष और उनकी कमजोरियों को बेहद करीब से परखा है। इस जमीनी अनुभव से उन्होंने पाया कि परीक्षा के परिणामों में अंतर केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के दैनिक आचरण और आत्मसंयम से पैदा होता है।
खेल और पढ़ाई के बीच तय करें स्पष्ट विभाजन
प्राचार्य के अनुसार विद्यार्थियों की सबसे बड़ी चूक समय का घालमेल करना है। उनका स्पष्ट संदेश है कि जब खेलने का समय हो, तो बिना किसी अपराधबोध के पूरे उत्साह से खेलें और उस दौरान किताबों की चिंता दिमाग में न लाएं। इसके विपरीत, जब अध्ययन की बारी आए तो खेलकूद और बाहरी आकर्षणों से पूरी तरह ध्यान हटा लें। यदि कोई छात्र खेलने के समय पढ़ाई का तनाव पालेगा या अध्ययन के समय खेल के बारे में सोचेगा, तो दोनों ही काम बिगड़ जाएंगे। इसी तरह सोने और जागने का भी एक निश्चित समय होना चाहिए। जीवन में हर गतिविधि का वक्त पहले से तय होना चाहिए और उस समय सारिणी का कठोरता से पालन करना हर छात्र के लिए अनिवार्य है।
धैर्य का विकास और बड़ों के प्रति सम्मान
मौजूदा पीढ़ी के भीतर सहनशीलता और सब्र की भारी कमी देखी जा रही है। बीएन झा जोर देकर कहते हैं कि जीवन और प्रतियोगी परीक्षाओं में निरंतर उतार चढ़ाव आते हैं, ऐसे में छोटी छोटी बातों पर विचलित हो जाने से प्रगति रुक जाती है। जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से शांत और सहनशील होना बुनियादी शर्त है। इसके साथ ही उन्होंने बड़ों, गुरुओं और शिक्षकों के सम्मान को चरित्र का जरूरी हिस्सा बताया। आज के दौर में मामूली टोकाटाकी पर भी युवा धैर्य खो बैठते हैं और बर्दाश्त नहीं कर पाते। अपने शिक्षकों और मार्गदर्शकों का आदर करना सीखने से विनम्रता आती है, जो किसी भी बड़े लक्ष्य को भेदने के लिए जरूरी है।
दैनिक दिनचर्या में अटूट अनुशासन का पालन
सफलता का कोई छोटा रास्ता नहीं होता और इसका आधार केवल अनुशासन है। स्कूल जाने का समय, स्वाध्याय का घंटा और दैनिक अभ्यास, हर कार्य का एक तय चक्र होना चाहिए। जब कोई छात्र अपनी दिनचर्या को बिना किसी बहानेबाजी के अनुशासन के दायरे में बांध लेता है, तो उसकी जिंदगी खुद ब खुद व्यवस्थित हो जाती है। यह नियमितता परीक्षा के तनाव को खत्म करती है और विद्यार्थी को निरंतर उत्पादक बनाए रखती है। अनुशासित विद्यार्थी कभी भी परीक्षा से ठीक पहले घबराहट का शिकार नहीं होते।
स्मार्टफोन को बनाएं अध्ययन का औजार
आजकल लगभग हर विद्यार्थी के हाथ में मोबाइल फोन मौजूद रहता है, लेकिन इसका उपयोग किस तरह किया जा रहा है, यही सफलता और विफलता का अंतर तय करता है। बीएन झा की सलाह है कि फोन का उपयोग केवल ज्ञान अर्जित करने और खुद को बेहतर बनाने के लिए करें। यदि गूगल का सहारा लेना है, तो उसका इस्तेमाल उपयोगी किताबों को खोजने, अध्ययन सामग्री मंगाने और गंभीर ज्ञान प्राप्त करने में किया जाना चाहिए। फोन की लत से पूरी तरह बचना होगा। जो छात्र तकनीक पर नियंत्रण पा लेते हैं और उसे अपनी पढ़ाई का माध्यम बना लेते हैं, वे न केवल शैक्षणिक और सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में बाजी मारते हैं, बल्कि जीवन की हर कसौटी पर खरे उतरते हैं।























