देवों की नगरी कहे जाने वाले झारखंड के देवघर जिले में अनगिनत ऐसे धार्मिक स्थल और पौराणिक आख्यान हैं जो भक्तों और पर्यटकों को आज भी चकित कर देते हैं. इसी पावन भूमि पर स्थित रोहिणी गांव में एक ऐसा अनोखा पीपल का पेड़ है, जिसके तने में समाया त्रिशूल लोगों की अगाध श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है. जनश्रुतियों और स्थानीय इतिहास के अनुसार, यह साधारण धातु का त्रिशूल नहीं है, बल्कि भगवान शिव का वह अस्त्र है जिसे उन्होंने क्रोधवश राजमहल के प्रांगण में खड़े वृक्ष पर दे मारा था. कालचक्र बीत जाने के बाद भी खुले आसमान के नीचे स्थित इस त्रिशूल में आज तक जरा भी जंग नहीं लगी है, जिसे देखने के लिए रोजाना दूर-दूर से श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं.
घटवाल राजपरिवार और रोहिणी स्थित ठाकुरबाड़ी का इतिहास
देवघर के इतिहास में घटवाल राजपरिवार का विशेष योगदान माना जाता है. इस राजपरिवार के तीर्थ पुरोहित जागेश्वर पाण्डेय के अनुसार, राजा के पूर्वज भगवान शिव के अनन्य और परम भक्त थे. उनकी मान्यता थी कि रोहिणी क्षेत्र में स्थित ठाकुरबाड़ी में स्वयं महादेव का साक्षात निवास है. राजपरिवार के सदस्य प्रतिदिन महादेव की उपासना करते थे और उनकी भक्ति भावना इतनी प्रगाढ़ थी कि ऐसा माना जाता था कि भगवान शिव समय-समय पर विभिन्न रूप बदलकर राजा के द्वार पर पधारा करते थे. यही कारण था कि पूरे राज्य और राजपरिवार में शिव भक्ति की एक अटूट परंपरा चली आ रही थी.
शाही शादी का निमंत्रण और बीमार भिखारी का रूप
इस अद्भुत त्रिशूल के स्थापित होने के पीछे एक अत्यंत रोचक कथा जुड़ी हुई है. तीर्थ पुरोहित जागेश्वर पाण्डेय बताते हैं कि एक बार घटवाल राजा के घर में एक भव्य विवाह समारोह का आयोजन हुआ. इस खुशी के अवसर पर राजा ने स्वयं भगवान शिव से विवाह में पधारने की आत्मीय प्रार्थना की और उन्हें विशेष निमंत्रण भेजा. राजा के आग्रह पर महादेव ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि वे शादी समारोह में शामिल होने आए, तो राजा या उनके दरबारी उन्हें पहचान नहीं पाएंगे और न ही संभाल पाएंगे. इसके बावजूद राजा ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक महादेव से आने का हठ किया.
विवाह के शुभ दिन पर भगवान शिव ने राजा की परीक्षा लेने का निर्णय लिया. वे एक अत्यंत निर्धन और बीमार भिखारी का रूप धारण कर राजमहल के द्वार पर पहुंचे. शादी के जश्न में डूबे दरबारी और द्वारपाल भिखारी के जर्जर वेश को देखकर महादेव को पहचान नहीं पाए. उन्होंने उस बीमार भिखारी को एक साधारण याचक समझकर सम्मानपूर्वक अंदर बुलाने के बजाय दरबार के मुख्य द्वार से ही वापस लौटा दिया.
क्रोध में फेंका गया त्रिशूल और जंग न लगने का अजूबा
दरबारियों द्वारा अनादरपूर्वक लौटाए जाने पर भगवान शिव अत्यंत अप्रसन्न हुए. अपने वास्तविक स्वरूप का अहसास कराने और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के उद्देश्य से उन्होंने अपने हाथ में धारण किया हुआ त्रिशूल राजमहल के आंगन में मौजूद एक विशाल पीपल के पेड़ की ओर फेंक दिया. त्रिशूल पेड़ के तने में जाकर गहराई से धंस गया, जिसके बाद महादेव वहां से अदृश्य हो गए. बाद में जब राजपरिवार और प्रजा को सत्य का भान हुआ तो वे अपनी भूल पर पश्चाताप करने लगे और उस स्थान को पवित्र मानकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी.
इस घटना को कई पीढ़ियां बीत चुकी हैं, परंतु वह त्रिशूल आज भी उसी पीपल के पेड़ में ज्यों का त्यों मौजूद है. सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि दशकों और सदियों से बारिश, धूप और हवा का सामना करने के बावजूद इस त्रिशूल की धातु पर आज तक जंग का एक दाग भी नहीं लगा है. लोहे या अन्य धातुओं की वस्तुओं का खुले वातावरण में सालों तक बिना जंग के सुरक्षित रहना एक दुर्लभ चमत्कार माना जाता है, जो स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं की उत्सुकता को और बढ़ा देता है.
धार्मिक आस्था और पारिवारिक परंपराओं का संगम
रोहिणी गांव की यह अलौकिक कहानी केवल किसी पुरातन राजघराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देवभूमि देवघर की समृद्ध धार्मिक विरासत और जन-आस्था का जीवंत प्रतीक है. घटवाल राजपरिवार के तीर्थ पुरोहित जागेश्वर पाण्डेय के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती आ रही यह कथा इतिहास, पारिवारिक मर्यादा और भगवान शिव के प्रति अगाध श्रद्धा के सुंदर संगम को दर्शाती है. आज भी रोहिणी का यह पीपल का पेड़ और उसमें जड़ा त्रिशूल श्रद्धालुओं के लिए पूजनीय है, जहाँ लोग भगवान शिव के इस अनोखा चमत्कार के दर्शन कर मन्नतें मांगते हैं.






















