भारतीय राजनीति में सरकारी आवासों, मंत्रालयों और विशिष्ट शहरों से जुड़े अंधविश्वासों की कई किस्से प्रचलित रहे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में कई बड़े नेता अपनी कुर्सी जाने के डर से खास बंगलों और इलाकों से दूरी बनाते रहे हैं, लेकिन अब ऐसा ही एक नया मामला झारखंड से सामने आया है। राज्य में लगातार तीन शिक्षा मंत्रियों के असामयिक निधन के बाद राजनीतिक गलियारों में डर और अंधविश्वास की चर्चा तेज हो गई है। हाल ही में सुदिव्य सोनू के निधन के बाद इस पद से जुड़ी मान्यताओं को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है।
झारखंड के शिक्षा मंत्रालय में तीन मंत्रियों का असामयिक निधन
झारखंड में शिक्षा मंत्रालय को लेकर बनी यह धारणा हालिया दुखद घटनाओं के बाद गहरा गई है। वर्ष 2019 में जब हेमंत सोरेन ने भाजपा को हराकर राज्य की सत्ता संभाली, तो टाइगर के नाम से मशहूर जगरनाथ महतो को शिक्षा मंत्री बनाया गया था। कोविड महामारी के दौरान उनके फेफड़ों में गंभीर संक्रमण हो गया और 6 अप्रैल 2023 को उनका निधन हो गया। जगरनाथ महतो के जाने के बाद रामदास सोरेन को शिक्षा मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया, लेकिन महज एक साल के भीतर उनका भी निधन हो गया। इसके बाद हेमंत सोरेन सरकार के संकटमोचक और जेएमएम के वरिष्ठ नेता सुदिव्य सोनू को राज्य का तीसरा शिक्षा मंत्री बनाया गया। हालांकि, 6 सितंबर 2026 को सुदिव्य सोनू का भी असामयिक निधन हो गया। एक ही मंत्रालय में लगातार तीन नेताओं के निधन से राजनीतिक हलकों में इस पद को स्वीकार करने को लेकर झिझक देखी जा रही है। वर्तमान में नए शिक्षा मंत्री के नाम को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। चर्चा है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस बार यह मंत्रालय कांग्रेस कोटे के किसी विधायक को दे सकते हैं। वहीं एक अन्य चर्चा यह भी है कि यदि कोई नेता तैयार नहीं हुआ तो हेमंत सोरेन अपनी विधायक पत्नी कल्पना सोरेन को मंत्रिमंडल में शामिल कर उन्हें शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी सौंप सकते हैं।
बिहार में 3, देशरत्न मार्ग और भूतिया बंगले का किस्सा
राजनीतिक अंधविश्वास की कहानियाँ सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बिहार में भी सरकारी आवासों को लेकर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। पटना में कई सरकारी आवासों को मंत्री अशुभ मानते रहे हैं। ऐसा ही एक चर्चित मामला लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप से जुड़ा है। जब नीतीश कुमार ने राजद के साथ मिलकर सरकार बनाई थी, तब तेज प्रताप स्वास्थ्य मंत्री बने थे। बाद में जब नीतीश कुमार ने राजद का साथ छोड़कर भाजपा के साथ सरकार बना ली, तो महागठबंधन की सरकार गिर गई और तेज प्रताप को मंत्री पद गंवाना पड़ा। यह घटनाक्रम 1918 का है। मंत्री रहने के दौरान तेज प्रताप को मुख्यमंत्री आवास से सटा 3, देशरत्न मार्ग का बंगला मिला था। मंत्री पद जाने का मुख्य कारण राजनीतिक परिस्थितियाँ थीं, लेकिन तेज प्रताप ने अपने सरकारी आवास को ही अशुभ घोषित कर दिया। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि इस बंगले में भूत रहते हैं। तेज प्रताप ने आरोप लगाया था कि भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी (अब दिवंगत) और नीतीश कुमार ने मिलकर उनके आवास में भूत भेज दिए हैं ताकि कोई भी वहाँ शांति से न रह सके।
पटना के अन्य अशुभ बंगले और प्रशासनिक संयोग
पटना में केवल 3, देशरत्न मार्ग ही नहीं, बल्कि कई अन्य सरकारी बंगलों को लेकर भी ऐसी ही धारणाएँ रही हैं। माना जाता रहा है कि 39, हार्डिंग रोड और स्ट्रैंड रोड का बंगला नंबर 6 भी अशुभ है और जो भी मंत्री इनमें रहता है, वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाता। इन आवासों में रहने वाले मंत्रियों की राजनीतिक स्थिति बिगड़ने के कई उदाहरण दिए जाते रहे हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल एक संयोग मानते हैं जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। तेज प्रताप के मामले में भी मंत्री पद जाना पूरी तरह से राजनीतिक फेरबदल का परिणाम था, क्योंकि नीतीश कुमार के राजद से अलग होने पर उनका पद जाना तय था। बाद में यह 3, देशरत्न मार्ग का बंगला विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह को आवंटित कर दिया गया।
उत्तर प्रदेश में नोएडा का राजनीतिक खौफ और इतिहास
उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नोएडा शहर को लेकर लंबे समय तक ऐसा ही अंधविश्वास कायम रहा। माना जाता था कि जो भी मुख्यमंत्री रहते हुए नोएडा का दौरा करता है, उसकी कुर्सी छिन जाती है। इस डर के कारण कई दशकों तक मुख्यमंत्रियों ने नोएडा जाने से परहेज किया। इस अंधविश्वास के पीछे कुछ ऐतिहासिक घटनाक्रमों का हवाला दिया जाता था
- जून 1988 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह नोएडा गए और उसके कुछ ही दिनों बाद उन्हें अपने पद से हटना पड़ा।
- 1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन.डी. तिवारी ने नोएडा का दौरा किया और उनकी भी कुर्सी चली गई।
- इसके बाद मुख्यमंत्री रहते हुए मुलायम सिंह यादव, मायावती और कल्याण सिंह ने जब भी नोएडा की यात्रा की, उन्हें अपनी सत्ता गँवानी पड़ी।
इसी खौफ के चलते वर्ष 2012 से 2017 तक यूपी के मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव कभी नोएडा जाने की हिम्मत नहीं जुटा सके। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठकें कीं, लेकिन व्यक्तिगत रूप से नोएडा जाने से बचते रहे।
योगी आदित्यनाथ ने तोड़ा दशकों पुराना अंधविश्वास
नोएडा से जुड़े इस सालों पुराने अंधविश्वास को आखिरकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाप्त किया। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने इस राजनीतिक भय की परवाह किए बिना बार-बार नोएडा का दौरा किया। जेवर एयरपोर्ट के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस बात का जिक्र किया था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि पहले के राजनीतिक नेतृत्व कुर्सी गँवाने के डर से नोएडा आने से बचते थे, लेकिन वर्तमान सरकार ने इस अंधविश्वास को दरकिनार कर विकास को प्राथमिकता दी है।



















