शिक्षक दिवस के अवसर पर रांची स्थित जेईपीसी सभागार में आयोजित राज्य स्तरीय समारोह के दौरान पलामू के समर्पित शिक्षक परशुराम तिवारी को उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। राज्य शिक्षक योगदान 2026 कार्यक्रम के तहत पूरे प्रदेश से चुने गए 190 शिक्षकों में पलामू जिले के 12 शिक्षक शामिल थे, जिनमें परशुराम तिवारी का नाम प्रमुखता से दर्ज हुआ। उन्हें मुख्य रूप से शिक्षण में लाइव स्ट्रीमिंग, प्रभावी नेतृत्व संवाद और शोध प्रस्तुति के क्षेत्र में किए गए विशिष्ट कार्यों के लिए यह राज्य स्तरीय पहचान मिली है। वर्तमान में पलामू सदर प्रखंड के राजकीयकृत मध्य विद्यालय रजवाडीह में प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यरत परशुराम तिवारी का यह सम्मान उनकी दशकों की लगन और प्रयोगधर्मी सोच का प्रतिफल है।
पीढ़ियों पुराना पारिवारिक नाता और शिक्षा की विरासत
राजकीयकृत मध्य विद्यालय रजवाडीह के साथ परशुराम तिवारी का संबंध केवल एक कर्मचारी या शिक्षक का नहीं, बल्कि पीढ़ियों पुराना है। जिस विद्यालय की बागडोर आज वे संभाल रहे हैं, उसी विद्यालय में उनके दादा स्वर्गीय राजकुमार तिवारी ने पहला छात्र नामांकन लिया था। उनके दादा भी स्वयं एक सम्मानित शिक्षक थे, जिन्हें क्षेत्र के लोग आदर से 'कुमारी गुरुजी' के नाम से पुकारते थे। परशुराम के पिता ने भी अध्यापन के क्षेत्र में ही अपनी सेवाएं दीं। इस तरह परिवार से मिली शिक्षा की समृद्ध परंपरा को परशुराम तिवारी आगे बढ़ा रहे हैं।
50 रुपये की ट्यूशन से बीपीएससी पास करने तक का संघर्ष
परशुराम तिवारी बताते हैं कि बचपन से ही उनका सपना शिक्षक बनने का था और खेल-खेल में भी वे अक्सर शिक्षक की भूमिका निभाना पसंद करते थे। हालांकि, इस सपने को पूरा करने की राह बेहद कठिन और चुनौतियों से भरी थी। उच्च शिक्षा के दौरान भारी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। पढ़ाई और परीक्षा फॉर्म का खर्च उठाने के लिए उन्होंने खुद छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। वे प्रति छात्र केवल 50 रुपये फीस लेकर सुबह से शाम तक लगभग 32 बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे। ट्यूशन से मिलने वाले पैसों को जोड़कर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और वर्ष 1996 में बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) की परीक्षा सफलतापूर्वक पास करके शिक्षक सेवा में कदम रखा।
2015 से विद्यालय में नवाचार, तकनीक और बेहतर उपस्थिति
वर्ष 2015 से राजकीयकृत मध्य विद्यालय रजवाडीह में प्रभारी प्रधानाध्यापक का पदभार संभालने के बाद परशुराम तिवारी ने स्कूल की सूरत बदलने के लिए कई तकनीकी व सामाजिक प्रयोग किए। वर्तमान में इस विद्यालय में कुल 140 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं, जहां छात्रों की नियमित उपस्थिति 80 से 90 प्रतिशत तक बनी रहती है। जो बच्चे नियमित रूप से स्कूल नहीं आते, परशुराम खुद उनके घर जाकर अभिभावकों से संवाद करते हैं और बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने स्कूल में स्मार्ट क्लास, आईसीटी लैब, पुस्तकालय और प्रॉपर हैंडवॉश पॉइंट जैसी आधुनिक सुविधाएं स्थापित की हैं। इसके अतिरिक्त वे नियमित योग, पीटी, अभिभावक-शिक्षक बैठकों और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी लगातार बढ़ावा देते हैं।
कोरोना काल में 'पड़बे करब' अभियान का ऐतिहासिक प्रयास
वैश्विक महामारी कोरोना के दौरान जब स्कूल पूरी तरह बंद हो गए थे और बच्चों की पढ़ाई ठप होने की नौबत आ गई थी, तब परशुराम तिवारी ने 'पड़बे करब' नाम से एक विशेष अभियान की शुरुआत की। वे स्वयं गांव में घर-घर पहुंचे और बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखा। शुरुआती दौर में उन्होंने बच्चों को मास्क और सैनिटाइजर वितरित किए और बाद में छोटे-छोटे अध्ययन समूह बनाकर पढ़ाई जारी रखी। उनके इस नवाचार की सराहना जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक हुई, जिसके लिए उन्हें कोविड काल के दौरान भी विशेष सम्मान से नवाजा गया था।
शिक्षण दर्शन, साहित्यिक लेखन और पिछले सम्मान
परशुराम तिवारी का मानना है कि शिक्षक की सच्ची सफलता बच्चों के चेहरे की मुस्कान में निहित होती है। यदि कक्षा खत्म होने के बाद बच्चे खुश और संतुष्ट नहीं हैं, तो पढ़ाने का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाता है। शिक्षण के साथ-साथ वे साहित्य के क्षेत्र में भी काफी सक्रिय हैं। उन्होंने अपने प्रेरणास्रोत गुरु सुभाष चंद्र मिश्र के जीवन पर आधारित 'सबकी आस सुभाष' नामक जीवनी लिखी है, जिसके लिए उन्होंने अनेक लोगों से जानकारियां जुटाईं। इसके अलावा वे कई साझा संकलन पुस्तकों के सह-लेखक भी रहे हैं। उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें पूर्व में 15 अगस्त और 26 जनवरी के मुख्य जिला स्तरीय समारोहों में सम्मानित किया जा चुका है तथा राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए भी उनका नाम नामांकित किया जा चुका है।





















