कोडरमा जिले के एक समर्पित शिक्षक को उनकी असाधारण सेवाओं के लिए राज्य स्तर पर सम्मानित किए जाने का फैसला लिया गया है। आगामी 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के खास मौके पर शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान देने वाले शिक्षकों को यह सम्मान दिया जाएगा। इस कड़ी में झारखंड शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, रांची की ओर से कोडरमा जिले से सिर्फ एक ही शिक्षक का चयन किया गया है, जिनका नाम ब्रह्मदेव कुमार शर्मा है। वे कोडरमा प्रखंड क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अपग्रेड प्राइमरी स्कूल सपहा में सहायक अध्यापक के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ब्रह्मदेव कुमार शर्मा पिछले 19 लंबे वर्षों से शिक्षा का अलख जगाने का काम कर रहे हैं और बच्चों के भविष्य को संवारने में जुटे हुए हैं।
सपहा गांव जरगा पंचायत के दायरे में आने वाला एक बेहद सुदूरवर्ती इलाका है, जो घने जंगलों के बीच बसा हुआ है। इस पूरे गांव के बच्चों की बुनियादी पढ़ाई का एकमात्र जरिया यही स्कूल है। मौजूदा समय की बात करें तो इस विद्यालय में कक्षा 1 से लेकर कक्षा 5 तक के कुल 34 बच्चे नामांकित हैं। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे विद्यालय की पूरी जिम्मेदारी अकेले सहायक अध्यापक ब्रह्मदेव शर्मा के कंधों पर टिकी हुई है, जो अकेले ही सभी कक्षाओं के बच्चों को संभालते हैं।
उफनती नदी और जंगल का कठिन रास्ता
ब्रह्मदेव शर्मा ने अपने संघर्ष के बारे में साझा करते हुए बताया कि बरसात के दिनों में इस विद्यालय तक पहुंचना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता है। बारिश के मौसम में लगभग तीन महीने तक पास की नदी का जलस्तर काफी ज्यादा बढ़ा रहता है। कई बार तो स्थिति यह हो जाती है कि नदी में चार से पांच फीट तक पानी का बहुत तेज बहाव देखने को मिलता है। इसके बावजूद वह कभी भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटते और हर हाल में नियमित रूप से अपने विद्यालय पहुंचते हैं।
उन्होंने अपनी इस कठिन दैनिक यात्रा के बारे में बताया कि वे नदी के एक किनारे अपनी मोटरसाइकिल को सुरक्षित खड़ी करते हैं और उसके बाद पैदल ही नदी पार करने की कोशिश करते हैं। जब पानी का स्तर बहुत अधिक होता है, तो उन्हें अपने कपड़े बदलकर नदी पार करनी पड़ती है। इस मुश्किल काम के लिए वे हमेशा अपने साथ एक हाफ पैंट साथ रखते हैं। नदी को सफलतापूर्वक पार करने के बाद वे दोबारा अपनी स्कूल ड्रेस पहनते हैं और फिर विद्यालय पहुंचकर बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू करते हैं।
जब विद्यालय परिसर में ही गुजारनी पड़ती है रात
कई बार मौसम इतना खराब हो जाता है और नदी का जलस्तर इतना खतरनाक रूप ले लेता है कि शाम को अपने घर वापस लौटना असंभव साबित होता है। ऐसी गंभीर परिस्थितियों में उन्हें मजबूरन अपनी रात स्कूल के परिसर में ही गुजारनी पड़ती है। इस तरह के आपात हालातों से निपटने के लिए उन्होंने स्कूल के अंदर ही अपने कपड़ों का एक अतिरिक्त सेट भी संभालकर रखा हुआ है। जब नदी का पानी उफान पर होता है और वे चाहकर भी घर नहीं लौट पाते, तब गांव के स्थानीय लोग ही उनके खाने-पीने और भोजन की पूरी व्यवस्था करते हैं।
बच्चों के भविष्य की चिंता और कर्तव्यनिष्ठा
शिक्षक ब्रह्मदेव शर्मा का मानना है कि उनका विद्यालय एक शिक्षकीय विद्यालय है, जहां पढ़ाने वाले वे इकलौते शिक्षक हैं। ऐसी स्थिति में अगर वे जरा सा भी ढील दें और बारिश या खराब मौसम को एक बहाना बनाकर स्कूल न पहुंचें, तो इन मासूम बच्चों के भविष्य का क्या होगा, यही सवाल उन्हें अंदर से झकझोरता रहता है। यही गहरी चिंता उन्हें हर मुश्किल परिस्थिति का सामना करने की ताकत देती है और वे तमाम बाधाओं को पार करके हर कार्य दिवस पर स्कूल पहुंच जाते हैं।
उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया कि वर्तमान समय में सरकारी विद्यालयों के भीतर बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज कराने का सख्त नियम लागू किया गया है। यदि किसी कारणवश उस प्रणाली में हाजिरी दर्ज नहीं हो पाती है, तो उस दिन का वेतन भी कट सकता है। लेकिन उनके लिए वेतन या अन्य चीजों से कहीं बढ़कर बच्चों की शिक्षा और उनका उज्ज्वल भविष्य ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी बना हुआ है।
पुल के निर्माण से दूर हो सकती है वर्षों पुरानी समस्या
सपहा गांव और उसके आसपास के तमाम ग्रामीणों की यह वर्षों पुरानी मांग और समस्या रही है कि नदी पर एक स्थायी पुल का निर्माण किया जाए। ब्रह्मदेव शर्मा का कहना है कि यदि जिला प्रशासन इस गंभीर समस्या पर ध्यान दे और नदी पर जल्द से जल्द एक पुल बनवा दे, तो इससे न केवल शिक्षक और स्कूल आने वाले छोटे बच्चों को फायदा मिलेगा, बल्कि पूरे इलाके के हजारों स्थानीय ग्रामीणों को भी आने-जाने में भारी राहत मिल जाएगी।


















