पलामू के परिवेश में उगने वाली हर वनस्पति और जीव प्रकृति के किसी न किसी अनछुए रहस्य को अपने भीतर समेटे हुए है। वर्तमान समय में जहां तापमान, बारिश और आंधी-तूफान का सटीक अनुमान लगाने के लिए बड़े-बड़े वेधशाला केंद्र, रडार और अंतरिक्ष आधारित सैटेलाइट सिस्टम का उपयोग किया जाता है, वहीं प्राचीन काल में हमारे बुजुर्गों के पास ऐसा कोई तामझाम नहीं था। वे प्रकृति के अपने संकेतों को परखकर ही मौसम के मिजाज को भाप लेते थे। ऐसा ही एक बेहद अचूक प्राकृतिक संकेतक कांस घास है, जिसे आज के तमाम हाई-टेक सिस्टम से भी अधिक सटीक माना जाता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे Saccharum spontaneum कहा जाता है और यह गन्ने के परिवार की ही एक खास प्रजाति है, जिसे अंग्रेजी में Wild Sugarcane के नाम से जाना जाता है।
फूलों के खिलने से मौसम में बदलाव का संकेत
इस विषय पर जानकारी देते हुए विशेषज्ञ परशुराम तिवारी ने बताया कि जब खेतों की मेड़ों, नदियों के किनारों और बंजर पड़ी जमीनों पर कांस के दूधिया सफेद फूल हवा में लहराने लगते हैं, तो यह नजारा केवल आंखों को सुकून देने वाला नहीं होता। इसे परंपरा के अनुसार मानसूनी बारिश के कमजोर पड़ने और सुहाने शरद ऋतु के आगमन की औपचारिक घोषणा माना जाता है। अगस्त और सितंबर के महीनों के दौरान जब ये फूल नजर आने शुरू होते हैं, तो ग्रामीण आंचल में लोग समझ जाते हैं कि अब बरसात का दौर अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। हालांकि इसे किसी आधुनिक मौसम विज्ञान केंद्र की डिजिटल मशीन का विकल्प तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह ऋतुओं के चक्र में होने वाले बदलाव का एक प्राकृतिक माध्यम जरूर है।
भारतीय साहित्य और रामचरितमानस में भी उल्लेख
उन्होंने आगे बताया कि इस वनस्पति का जिक्र हमारे प्राचीन ग्रंथों और भारतीय साहित्य में भी प्रमुखता से मिलता है। मध्यकाल के महान संत तुलसीदास ने रामचरितमानस के किष्किंधा कांड में बरसात के थमने और शरद ऋतु के आगमन का बहुत ही मनमोहक वर्णन किया है। वहां इसे एक स्पष्ट मौसम संकेतक के रूप में रेखांकित किया गया है। ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि वर्षा ऋतु के बीतने पर अत्यंत सुहानी शरद ऋतु आ गई है, जहां चारों तरफ कांस के फूल खिलकर पूरी धरती पर छा गए हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो वर्षा ऋतु अपनी वृद्धावस्था को प्रकट कर रही हो। यानी कांस के फूलों से जमीन का सफेद चादर ओढ़ लेना इस बात की तस्दीक करता था कि मानसून विदा हो रहा है।
महाकवि घाघ की लोक परंपरा और कहावतें
लोक संस्कृति और परंपराओं का जिक्र करते हुए उन्होंने यह भी साझा किया कि प्राचीन काल के प्रसिद्ध महाकवि घाघ की एक लोकप्रिय कहावत भी सीधे तौर पर इसी घास से जुड़ी हुई है। वह पंक्ति है कि 'उगे अगस्त, फुले कांस, अब छोड़ो वर्षा की आस।' इस कहावत का सीधा अर्थ यह है कि आकाश में अगस्त्य तारे का उदय होना और धरती पर कांस के फूलों का खिलना इस बात का पक्का प्रमाण है कि अब बारिश के थमने का समय आ चुका है और लोगों को मानसूनी फुहारों की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए।
ग्रामीण जीवनशैली और पारंपरिक उपयोगिता
विशेषज्ञ ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस पौधे का महत्व केवल मौसम की भविष्यवाणी करने तक ही सीमित नहीं था। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग इसके लंबे और मजबूत तिनकों का इस्तेमाल कच्चे मकानों की छतों पर छप्पर छाने के लिए करते थे। इसके अलावा इससे घरेलू जरूरत के सामान जैसे झाड़ू और अन्य उपयोगी वस्तुएं भी बड़ी कुशलता से तैयार की जाती थीं। हमारे पारंपरिक ज्ञान के भंडार में इसके अलग-अलग अंगों के उपयोग की लंबी फेरिहर मिलती है।
आधुनिक युग में भी प्रासंगिक है प्राकृतिक ज्ञान
मौजूदा दौर में जब वैज्ञानिक उपकरण मौसम का पूर्वानुमान लगाने में कहीं अधिक सटीक आंकड़े मुहैया कराते हैं, तब भी कांस का यह पौधा हमें यह अहसास कराता है कि प्रकृति अपने आप में एक जीवंत खुली किताब है। हमारे पूर्वजों ने लंबी पीढ़ियों के अनुभवों के बूते इन पौधों और बदलती ऋतुओं के आपसी रिश्तों को बारीकी से समझा और उन्हें अपनी लोककथाओं, परंपराओं तथा साहित्य में संजोकर रखा। यही वजह है कि कांस का यह सफेद फूल केवल एक सुंदर प्राकृतिक दृश्य नहीं है, बल्कि यह मानव और प्रकृति के बीच सदियों पुराने संवाद का एक जीवंत प्रतीक भी है।



















