भारतीय रसोई और पारंपरिक पकवानों में केसर का एक खास स्थान है। चाय, खीर, हलवा, मिठाई और पुलाव जैसी डिश का स्वाद बढ़ाने के अलावा सर्दी और जुकाम में राहत पाने के लिए भी इसका उपयोग काफी लोकप्रिय है। तासीर में गर्म होने के कारण लोग ठंड के मौसम में इसका सेवन अधिक करते हैं। भारत में कश्मीर का क्षेत्र केसर की उच्च गुणवत्ता वाली पैदावार के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। बाजार में इसकी भारी मांग और अत्यधिक कीमत के कारण इसमें मिलावट का खेल भी बड़े पैमाने पर चलता है। महज 1 या 2 ग्राम केसर की डिब्बी भी सैकड़ों रुपये में बिकती है। ऐसे में कश्मीरी केसर विक्रेताओं ने कुछ खास और सटीक तरीके साझा किए हैं, जिनके जरिए कोई भी ग्राहक असली और मिलावटी केसर के बीच का अंतर आसानी से समझ सकता है।
पानी और रंग से करें असली केसर की जांच
केसर की शुद्धता परखने का सबसे प्रभावी तरीका पानी में उसके रंग छोड़ने की प्रक्रिया है। जब आप शुद्ध और असली केसर के धागों को पानी में डालते हैं, तो वह तुरंत रंग नहीं छोड़ती। असली केसर बहुत धीरे-धीरे पानी में घुलती है और पानी का रंग हल्का पीला कर देती है। सबसे खास बात यह है कि पूरा रंग पानी में आने के बाद भी केसर के धागे अपने मूल लाल रंग में ही बने रहते हैं और उनका आकार वैसा ही रहता है। इसके विपरीत, नकली या रासायनिक रंग चढ़ी केसर को पानी में डालते ही वह तुरंत और बहुत गहरा रंग छोड़ने लगती है। नकली केसर पानी में हल्का नारंगी रंग छोड़ती है और रंग निकलने के बाद उसके धागे बिल्कुल फीके तथा हल्के पड़ जाते हैं। कई मामलों में नकली धागे पानी में पूरी तरह घुलकर गायब भी हो जाते हैं।
स्वाद और प्राकृतिक खुशबू से पहचानें फर्क
असली केसर का स्वाद और उसकी गंध बहुत विशिष्ट होती है, जिसे चबाकर परखा जा सकता है। शुद्धता की जांच के लिए केसर के 2 से 3 धागे मुंह में रखकर चबाएं। असली केसर का स्वाद हल्का कड़वा और थोड़ा तीखा महसूस होता है, साथ ही इसमें से एक सौंधी प्राकृतिक खुशबू आती है। दूसरी ओर, नकली केसर का स्वाद हल्का मीठा लगता है क्योंकि उसमें मिठास या सिंथेटिक कोटिंग मिलाई गई होती है। कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल होने के कारण नकली केसर से अक्सर तेज या अजीब गंध आती है। इसके अलावा, नकली धागों को चबाने पर उनका रंग तुरंत जीभ और दांतों पर छप जाता है, जो शुद्ध केसर में कभी नहीं होता।
पानी में तैरने की क्षमता और फूलों के धागों की बनावट
भौतिक परीक्षण के लिए पानी के गिलास का इस्तेमाल किया जा सकता है। जब असली केसर के धागे पानी की सतह पर डाले जाते हैं, तो वे ऊपर ही तैरते रहते हैं और नीचे नहीं बैठते। इसके उलट नकली केसर के कुछ धागे पानी में डालते ही भारी होकर नीचे तली में डूब जाते हैं। इस मिलावट के पीछे केसर के फूल की आंतरिक बनावट का फायदा उठाया जाता है। केसर के फूल में दो तरह के रेशे होते हैं। केसर के रंग वाले धागों को मेल कहा जाता है, जिनका उपयोग असली केसर के रूप में होता है। इसके अलावा फूल में सफेद रंग के रेशे भी होते हैं जिन्हें फीमेल कहा जाता है। कुछ मुनाफाखोर इन सफेद फीमेल रेशों को कृत्रिम रंगों में रंगकर असली केसर के नाम पर बाजार में बेच देते हैं।
बाजार में केसर खरीदते समय ध्यान रखने योग्य जरूरी बातें
बाजार से केसर की खरीदारी करते समय केवल उसके रंग पर भरोसा न करें। बहुत ज्यादा चमकीले या गहरे लाल रंग के धागे देखकर भ्रमित न हों, क्योंकि अक्सर अत्यधिक लाल दिखने वाले धागों पर मिलावटी केमिकल रंग चढ़ा होता है। यदि केसर के पैकेट से अजीब सी दुर्गंध आ रही हो या उसमें नमी महसूस हो रही हो, तो ऐसी केसर बिल्कुल न खरीदें। बाजार से पिसी हुई केसर का पाउडर खरीदने के बजाय हमेशा साबुत धागे खरीदना ही सुरक्षित माना जाता है। केसर का पैकेट लेते समय उसकी लेबलिंग को ध्यान से जांचें। पैकेट पर उत्पाद का नाम, शुद्ध मात्रा, बैच विवरण और निर्माता की जानकारी स्पष्ट लिखी होनी चाहिए। बिना लेबल वाली या खुली बिकने वाली केसर को खरीदने से पूरी तरह बचें।



















