जलवायु परिवर्तन, बेमौसम बारिश और लंबे सूखे के बाद अचानक तेज जलभराव के कारण बिहार सहित कई राज्यों में कटहल के बाग गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। 'पोषण सुरक्षा का पेड़' कहे जाने वाले कटहल के पौधों में इन दिनों जड़ सड़न और मुरझान रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ा है। इस समस्या के कारण हरे-भरे पेड़ अचानक सूखने लगे हैं। फल रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार, यदि समय रहते सही कदम न उठाए जाएं तो पूरा का पूरा बाग नष्ट हो सकता है।
कटहल की जड़ों पर हमला करने वाले मुख्य कवक और कारण
कटहल की खेती हाल के वर्षों में बिहार, झारखंड, बंगाल और केरल जैसे राज्यों में काफी तेजी से फैली है। हालांकि, मौसम के बदलते मिजाज, अनिश्चित बारिश और बढ़ते तापमान ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह का कहना है कि जब लंबे सूखे के बाद अचानक भारी बारिश होती है और बागों में पानी ठहर जाता है, तो मिट्टी में फफूंद का संक्रमण बहुत तेजी से पनपता है। यह घातक समस्या मुख्य रूप से फाइटोफ्थोरा, फ्यूजेरियम और पिथियम नामक तीन हानिकारक फफूंद के कारण उत्पन्न होती है। ये फफूंद सीधे पौधों की जड़ों पर आक्रमण करते हैं, जिससे जड़ें अंदर से गलने लगती हैं और पौधे तक पोषण की आपूर्ति पूरी तरह बंद हो जाती है।
जड़ सड़न और मुरझान रोग की पहचान के प्रमुख लक्षण
बागवानों को अपने कटहल के पेड़ों में इस बीमारी के शुरुआती संकेतों पर पैनी नजर रखनी चाहिए ताकि समय पर उपचार किया जा सके। प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार, इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों में पौधों की बढ़वार अचानक रुक जाती है और पत्तियां हल्की पीली पड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे पत्तियों के किनारे सूखने लगते हैं और वे गिरना शुरू हो जाती हैं। इसके अलावा, पेड़ पर लगने वाले फल बहुत छोटे रह जाते हैं। यदि संक्रमण का संदेह हो और पेड़ के पास की मिट्टी खोदकर जड़ों की जांच की जाए, तो वे भूरी या काली पड़ी हुई और पूरी तरह सड़ी मिलती हैं। इन सड़ी हुई जड़ों से तेज बदबू भी आती है। साथ ही, पौधे के मुख्य तने के आसपास की छाल ढीली होकर बेहद आसानी से निकलने लगती है, जो इस रोग के गंभीर स्तर तक पहुंचने का स्पष्ट संकेत है।
प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह द्वारा सुझाए गए 4 वैज्ञानिक बचाव उपाय
कटहल के बागों को इस तबाही से बचाने के लिए प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह ने चार महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपाय साझा किए हैं
- जल निकासी की उचित व्यवस्था: कटहल का पौधा तने के आसपास जलभराव को बिल्कुल सहन नहीं कर सकता। इसलिए नए बाग हमेशा ऊंची मेड़ या क्यारी पर ही स्थापित करने चाहिए। मानसून के दौरान यदि खेत में अतिरिक्त पानी जमा हो, तो उसे तुरंत बाहर निकालने का प्रबंध करें। सिंचाई के लिए ड्रिप प्रणाली का उपयोग करें और पानी को हमेशा तने से सुरक्षित दूरी पर रखें।
- जैविक कवकनाशी का प्रयोग: जड़ों को स्वस्थ रखने और हानिकारक फफूंद को खत्म करने के लिए सड़ी हुई गोबर की खाद में ट्राइकोडर्मा और बैसिलस जैसे मित्र कवकनाशी मिलाकर पौधों के जड़ क्षेत्र में डालें। यह मिश्रण नुकसानदायक फफूंद को नष्ट कर जड़ों को नई मजबूती देता है।
- वार्षिक कंपोस्ट और जैविक खाद: हर साल पेड़ों की जड़ों में पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद और कंपोस्ट डालें। इससे मिट्टी में उपयोगी जीवाणुओं की संख्या बढ़ती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता सुधरती है और पौधों की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।
- रसायनों से ड्रेंचिंग (अंतिम विकल्प): यदि बीमारी बाग में बहुत अधिक फैल चुकी हो और जैविक उपायों से नियंत्रित न हो रही हो, तो मेटालैक्सिल + मैंकोजेब या फॉसेटाइल-एएल जैसी फफूंदनाशक दवाओं के घोल से जड़ क्षेत्र की ड्रेंचिंग करें। हालांकि, प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह ने स्पष्ट किया है कि रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल केवल अंतिम उपाय के रूप में ही किया जाना चाहिए।



















