बरसात के दिनों में नींबू के बगीचों में अक्सर फलों के फटने की शिकायत देखने को मिलती है। इससे न केवल फल की गुणवत्ता खराब होती है, बल्कि पैदावार पर भी बुरा असर पड़ता है। जिला उद्यान अधिकारी डॉ पुनीत कुमार पाठक के अनुसार, इस समस्या का मुख्य कारण पौधों द्वारा पानी का अचानक असंतुलित अवशोषण है। जब लंबे समय तक सूखे के मौसम के बाद पौधे को एकाएक बहुत अधिक पानी मिलता है, तो फल के अंदर का गूदा तेजी से बढ़ने लगता है। हालांकि, बाहरी छिलका उतनी तेजी से विकसित नहीं हो पाता, जिससे छिलका दबाव सहन नहीं कर पाता और फल बीच में से फट जाता है। इस शारीरिक असंतुलन से बचने के लिए शुरुआती स्तर पर ही सही जल प्रबंधन और पौधों की देखभाल बेहद जरूरी मानी जाती है।
मिट्टी में नमी का असंतुलन और जल निकासी की व्यवस्था
मानसून में लगातार होने वाली बारिश की वजह से बगीचे की मिट्टी में नमी का स्तर बहुत तेजी से बढ़ता है। सूखे के दौर से गुजर चुके पौधों की जड़ें अचानक अधिक मात्रा में पानी सोखने लगती हैं। इस तेजी से अवशोषित जल के कारण फल के आंतरिक भाग का विस्तार होता है, जबकि बाहरी सतह इसका मुकाबला नहीं कर पाती। डॉ पुनीत कुमार पाठक का सुझाव है कि इस समस्या को रोकने के लिए बगीचे में जल निकासी की पुख्ता व्यवस्था करनी चाहिए। तने के चारों तरफ मिट्टी की इस तरह भराई की जानी चाहिए कि पानी जमा हुए बिना आसानी से बाहर निकल जाए। जड़ों के पास पानी ठहरने से पौधों की श्वसन प्रक्रिया बाधित होती है और उनकी पोषक तत्व सोखने की क्षमता घटने लगती है।
सूक्ष्म पोषक तत्वों कैल्शियम और बोरॉन का महत्व
पौधों में आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी नींबू के फटने का एक प्रमुख कारण बनती है। विशेष रूप से कैल्शियम और बोरॉन फल की बाहरी त्वचा की मजबूती के लिए जिम्मेदार होते हैं। जहां कैल्शियम छिलके को बाहरी मजबूती प्रदान करता है, वहीं बोरॉन इसकी लोच और संरचनात्मक मजबूती बनाए रखने में मदद करता है। लगातार होने वाली बारिश में मिट्टी से यह दोनों तत्व बहकर नष्ट हो जाते हैं। इसी कारण से मानसून की शुरुआत होते ही पौधों की जड़ों के आसपास इन पोषक तत्वों का छिड़काव करना अथवा खाद देना बेहद लाभकारी सिद्ध होता है। सही समय पर इन पोषक तत्वों की पूर्ति करने से छिलका मजबूत होता है और फल फटने की आशंका काफी कम हो जाती है।
जैविक खाद का प्रयोग और मल्चिंग की असरदार तकनीक
बरसात के मौसम में रासायनिक उर्वरकों का ज्यादा इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, क्योंकि बारिश के पानी के साथ वे आसानी से बह जाते हैं और पौधों को उनका पूरा लाभ नहीं मिल पाता। इसके स्थान पर सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग करना चाहिए। मिट्टी में जैविक खाद मिलाने से उसकी जल धारण क्षमता में सुधार आता है, जिससे नमी में आने वाले अचानक बदलाव का असर फलों पर नहीं पड़ता। इसके अलावा, मिट्टी में नमी के स्तर को स्थिर बनाए रखने के लिए मल्चिंग की तकनीक बहुत प्रभावी मानी जाती है। तने के चारों ओर सूखी घास, पुआल या सूखे पत्तों की एक परत बिछाने से बारिश की सीधी बूंदें मिट्टी पर नहीं पड़तीं और नमी का स्तर एकसमान बना रहता है।
टहनियों की छंटाई और नीम के तेल से कीट नियंत्रण
मानसून के दौरान नींबू के पौधों की हल्की छंटाई करना अत्यंत आवश्यक होता है। पौधे के अंदर सूखी, अत्यधिक घनी और बीमार शाखाओं को काटकर हटा देना चाहिए ताकि हवा और धूप पौधे के अंदरूनी हिस्सों तक आसानी से पहुंच सके। अत्यधिक घने पौधों में नमी लंबे समय तक टिकी रहती है, जिससे फंगल संक्रमण और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ ही, बरसात में कीटों का हमला भी बढ़ जाता है जो फल के छिलके को चबाकर या नुकसान पहुंचाकर कमजोर कर देते हैं। इससे बचाव के लिए हर 15 से 20 दिन के अंतराल पर नीम के तेल के घोल का पौधों पर नियमित छिड़काव करना चाहिए।
पके फलों की समय पर तुड़ाई और नियमित निरीक्षण
बरसात के दिनों में जो फल पूरी तरह से पक चुके हैं, उन्हें पेड़ पर अधिक समय तक नहीं छोड़ना चाहिए। पके हुए नींबू बारिश के पानी को बहुत जल्दी अवशोषित करते हैं और फटने लगते हैं। जैसे ही फल तैयार हों, उनकी तुड़ाई तुरंत कर लेनी चाहिए। इसके साथ ही, किसानों और बागवानों को अपने पौधों का लगातार निरीक्षण करते रहना चाहिए। समय पर पौधों की जांच करने से किसी भी बीमारी या फटने की शुरुआती स्थिति का तुरंत पता चल जाता है और सही रोकथाम के उपाय समय रहते लागू किए जा सकते हैं।



















