35 साल पुराने बैंक ऋण मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बैंकिंग प्रणाली की एक गंभीर लापरवाही को उजागर किया है। शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप के बाद, मुकदमे की लंबी प्रक्रिया के दौरान जान गंवा चुके दो आरोपियों के कानूनी वारिसों को 3 करोड़ रुपये से अधिक की बकाया राशि मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। 2010 में हुई नीलामी के बाद से इस रकम पर 15 वर्षों का चक्रवृद्धि ब्याज जुड़ने के कारण अंतिम भुगतान राशि और भी अधिक हो सकती है।
1991 के लोन केस की पृष्ठभूमि और बैंक मैनेजर की बरीयत
यह पूरा मामला 1991 में दर्ज हुई एक एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें इंडियन बैंक की अन्ना नगर शाखा के तत्कालीन मैनेजर पर 13.5 लाख रुपये और 10 लाख रुपये के लोन पास करके खुद हड़पने का आरोप लगाया गया था। करीब साढ़े तीन दशकों तक चली कानूनी प्रक्रिया के दौरान केस के दो मुख्य आरोपियों का निधन हो गया, जबकि केवल बैंक मैनेजर ही जीवित बचे थे। जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए मुकदमे को पूरी तरह मनगढ़ंत पाया और एकमात्र जीवित बचे आरोपी बैंक अधिकारी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
50 लाख की देनदारी के बदले 3.6 करोड़ की संपत्ति नीलामी
आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने एक चौंकाने वाला तथ्य आया। बैंक ने महज 50 लाख रुपये की कुल देनदारी वसूलने के लिए दोनों आरोपियों की संपत्तियों की 3.6 करोड़ रुपये में नीलामी कर दी थी। रिकवरी प्रक्रिया के तहत साल 2010 में पहली संपत्ति को नीलाम करके 1.2 करोड़ रुपये हासिल किए गए, जिनमें से 16.4 लाख रुपये लोन की मूल रकम और ब्याज में समायोजित किए गए। इसके बाद दूसरी संपत्ति की नीलामी से 2.8 करोड़ रुपये की राशि मिली, जिसमें से 40 लाख रुपये की देनदारी का निपटारा किया गया। इस प्रकार रिकवरी के बाद बैंक के पास 3 करोड़ रुपये से अधिक का सरप्लस पैसा बच गया था।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी और सरप्लस रकम का मामला
अदालत ने पाया कि लोन की पूरी रकम वसूल हो जाने के बावजूद बैंक ने अतिरिक्त बची हुई धनराशि आरोपियों के वैध वारिसों को कभी वापस नहीं की। बेंच ने कहा कि 1991-1992 में लिए गए लोन की रिकवरी के लिए 2010 में संपत्ति की नीलामी पूरी हो चुकी थी और बैंक को उसका पूरा बकाया मिल चुका था। सरकारी गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट हुआ कि नीलाम की गई रकम से बची अतिरिक्त राशि पिछले कई सालों से बैंक के पास ही जमा पड़ी है। पीठ ने इस बात पर गहरा आश्चर्य जताया कि बैंक प्रशासन ने कानूनी वारिसों की तलाश करने या उन्हें यह पैसा सौंपने का कोई प्रयास नहीं किया।
रिकॉर्ड पेश करने के निर्देश और 5 अक्टूबर को अगली सुनवाई
शीर्ष अदालत ने इंडियन बैंक की अन्ना नगर शाखा के मैनेजर को निर्देश दिया है कि वे नीलामी से प्राप्त राशि के उपयोग के संपूर्ण रिकॉर्ड और लोन के बदले जमा कराए गए टाइटल डीड अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। हालांकि आपराधिक केस का निपटारा हो चुका है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने के लिए मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर तय की है ताकि 15 साल के चक्रवृद्धि ब्याज के साथ पूरी सरप्लस रकम कानूनी वारिसों तक पारदर्शी तरीके से पहुंच सके।


















