बारिश का मौसम भले ही चारों तरफ हरियाली बिखेर देता हो, लेकिन घर की बगिया और किचन गार्डन के लिए यही मौसम सबसे मुश्किल भरा भी होता है. लगातार बरसात, पानी का जमाव, तेज हवाएं और फंगस का हमला अक्सर महीनों की मेहनत से लगाए गए पौधों को चंद दिनों में बर्बाद कर देता है. लेकिन अगर मानसून शुरू होते ही कुछ जरूरी सावधानियां बरत ली जाएं, तो बेल वाली सब्जियों से लेकर पत्तेदार साग, कंद वाली फसलें और फलदार पौधे तक पूरे सीजन हरे-भरे और सेहतमंद बने रह सकते हैं.
सोहावल विकासखंड की उद्यान विकास अधिकारी सुधा पटेल का कहना है कि बरसात के दिनों में पौधों को बचाने की पूरी कुंजी तीन बातों में छिपी है, सही जल निकासी, जैविक तरीकों का इस्तेमाल और समय पर की गई देखभाल. उनका मानना है कि अगर किसान और घर पर बागवानी करने वाले लोग इन बातों का ध्यान रखें, तो बेहतर पैदावार के साथ-साथ अपनी बगिया को भी सुरक्षित रख सकते हैं.
जल निकासी का इंतजाम सबसे पहले करें
सुधा पटेल के मुताबिक बरसात में पौधों को सबसे ज्यादा नुकसान जमीन में जमा हो जाने वाले अतिरिक्त पानी से होता है. इसलिए पौधों को कभी भी सपाट जमीन पर नहीं बल्कि क्यारियां बनाकर लगाना चाहिए. हर क्यारी के साथ नालियां या फरो जरूर बनाई जाएं, जिससे बारिश का फालतू पानी तुरंत बाहर निकल जाए और जड़ों के पास रुके नहीं. साथ ही क्यारियों को जमीन की सतह से थोड़ा ऊपर उठाकर यानी रेज्ड बेड की शक्ल में तैयार करना चाहिए. इससे जड़ों में जरूरत से ज्यादा नमी नहीं टिकती और पौधे स्वस्थ बने रहते हैं.
तेज हवा और मूसलधार बारिश से पौधों को सहारा दें
मानसून के दौरान तेज हवाएं और मूसलधार बारिश टमाटर, मिर्च और बैंगन जैसे पौधों के तनों को आसानी से तोड़ सकती हैं. ऐसे पौधों के पास मजबूत लकड़ी या बांस गाड़कर उन्हें रस्सी से बांध देना चाहिए, इस तरीके को स्टेकिंग कहा जाता है. इसके अलावा पौधों की नीचे वाली पुरानी पत्तियों को समय-समय पर हटाते रहना जरूरी है, ताकि मिट्टी में छिपा फंगस सीधे पत्तियों तक न पहुंच सके और पौधों के बीच हवा का आवागमन भी बना रहे.
बेल वाली सब्जियों को जमीन से दूर रखें
लौकी, तोरई, करेला और कद्दू जैसी बेल वाली सब्जियों को जमीन पर फैलने देने के बजाय बांस, तार या प्लास्टिक नेट की मदद से मचान यानी ट्रेलिस पर चढ़ा देना चाहिए. इससे फल सीधे गीली मिट्टी और जमा पानी के संपर्क में नहीं आते, जिससे सड़न और फंगस लगने का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है. इसका एक और फायदा यह भी है कि फल साफ-सुथरे रहते हैं और उनकी क्वालिटी भी अच्छी बनी रहती है.
कंद और पत्तेदार सब्जियों की सुरक्षा का तरीका अलग है
आलू, शकरकंद, गाजर और मूली जैसी कंद वाली सब्जियों के लिए ऊंची क्यारियां सबसे कारगर साबित होती हैं. इनके बीच में गहरी नालियां बनाकर पानी की निकासी सुनिश्चित करनी चाहिए, क्योंकि जलभराव होने पर कंद जमीन के भीतर ही सड़ने लगते हैं. वहीं पालक, धनिया और चौलाई जैसी पत्तेदार सब्जियां तेज बारिश की सीधी मार जल्दी झेल नहीं पातीं. इनके ऊपर अस्थायी शेड नेट या पारदर्शी प्लास्टिक की पन्नी लगाकर बचाव किया जा सकता है, जिससे तेज बारिश का सीधा असर काफी कम हो जाता है.
फलदार पौधों की जड़ों में पानी जमा न होने दें
नींबू, अमरूद, पपीता और अनार जैसे फलदार पौधों के मामले में सबसे जरूरी बात यह है कि इनकी जड़ों के आसपास पानी बिल्कुल जमा न हो. इसके लिए मुख्य तने के चारों तरफ मिट्टी का एक ऊंचा घेरा बनाना चाहिए, जिसे रिंग मेथड कहा जाता है. इससे पानी सीधे तने को नहीं छूता और अतिरिक्त पानी आसानी से बाहर निकल जाता है. इस तरीके को अपनाने से जड़ों के सड़ने और पौधों के कमजोर पड़ने का खतरा काफी कम हो जाता है.
कीट और फंगस से बचाव के जैविक उपाय
बरसात के मौसम में फंगस और कीटों का हमला तेजी से बढ़ता है. इससे निपटने के लिए एक लीटर पानी में पांच मिली नीम का तेल और थोड़ा सा शैम्पू मिलाकर पौधों पर छिड़काव करना चाहिए. इससे रस चूसने वाले कीट और इल्लियों पर अच्छा नियंत्रण मिलता है. अगर कीटों का हमला ज्यादा गंभीर हो जाए, तो घर पर तैयार किया गया दशपर्णी अर्क और अग्न्यास्त्र भी काफी असरदार माना जाता है. फंगस से बचाव के लिए ट्राइकोडर्मा विरिडी या स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस को पांच ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर जड़ों और पत्तियों पर छिड़का जा सकता है. इसके अलावा तांबे के बर्तन में तैयार ताम्रयुक्त मट्ठा और बोर्डो मिश्रण भी जैविक कवकनाशी के तौर पर काफी उपयोगी साबित होते हैं.
खाद और खरपतवार प्रबंधन का सही समय
सुधा पटेल के अनुसार, इस मौसम में हमेशा अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कंपोस्ट का ही इस्तेमाल करना चाहिए. पौधों को जल्दी पोषण देने के लिए जीवामृत, पंचगव्य या वेस्ट डी-कंपोजर का घोल तैयार कर हर 10 से 15 दिन में मिट्टी में डालना फायदेमंद रहता है. हालांकि भारी बारिश शुरू होने से ठीक पहले खाद डालने से बचना चाहिए. बारिश थमने के बाद जब मिट्टी में हल्की नमी बची हो, तभी खाद और जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है. इसके साथ ही बगीचे में उगने वाले खरपतवारों को समय-समय पर हटाते रहना चाहिए, क्योंकि ये पौधों का पोषण छीनने के साथ-साथ बीमारियां भी बढ़ाते हैं. नियमित रूप से गुड़ाई करते रहने से मिट्टी में हवा का संचार बना रहता है और पौधों की जड़ें भी मजबूत होती हैं.













