बॉलीवुड के मशहूर कलाकार रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण के परिवार में एक बार फिर नन्हीं किलकारी गूंजी है। राधाष्टमी के शुभ पर्व पर इस चर्चित दंपति के आंगन में दूसरी नन्हीं परी का आगमन हुआ है। अपने जीवन के इस बेहद खास पड़ाव की जानकारी दोनों कलाकारों ने सोशल मीडिया मंच पर एक संयुक्त पोस्ट साझा करके दी। इस घोषणा पत्र में नवजात बच्ची के पैरों के खूबसूरत निशान दिखाए गए हैं, जिस पर उसके इस दुनिया में आने की तारीख भी अंकित है। इस सुखद ऐलान से महज एक रोज पहले दोनों सितारे मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर में गणपति बप्पा की पूजा-अर्चना करने पहुंचे थे, जिसके दृश्य इंटरनेट पर लोगों के बीच तेजी से चर्चा में आ गए थे।
इस खुशी के माहौल के बीच चिकित्सा जगत और अभिभावकों के बीच यह अहम विमर्श फिर शुरू हो गया है कि एक संतान के जन्म के बाद दूसरी गर्भावस्था की योजना बनाने के लिए कितना समय अंतराल सबसे उचित माना जाता है। प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों के अनुसार, दो प्रसवों के बीच का समय केवल पारिवारिक सुविधा का विषय नहीं है, बल्कि यह महिला की शारीरिक मजबूती, आंतरिक अंगों की रिकवरी और होने वाले नए शिशु के संपूर्ण स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ा हुआ है।
दो संतानों के जन्म के बीच कितना फासला रखना है सबसे सुरक्षित
स्त्री रोग एवं प्रजनन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, दो बच्चों के जन्म के बीच न्यूनतम 18 महीने से लेकर 3 वर्ष, यानी डेढ़ से तीन साल का फासला सबसे उपयुक्त माना गया है। चिकित्सीय दिशा-निर्देशों के अनुसार, पहली डिलीवरी के बाद दोबारा गर्भधारण करने से पहले कम से कम 18 से 24 महीने का विराम लेना बेहद जरूरी है। नौ महीने के गर्भकाल और उसके बाद स्तनपान कराने के दौरान महिला के शरीर से भारी मात्रा में पोषक तत्वों का दोहन होता है। इस वजह से हड्डियों, गर्भाशय और रक्त कोशिकाओं को दोबारा सामान्य स्थिति में लौटने के लिए एक निश्चित समय की दरकार होती है।
यदि कोई महिला पहले प्रसव के तुरंत बाद गर्भधारण कर लेती है, तो उसके शरीर को आराम का मौका नहीं मिलता। नतीजतन, मां और गर्भस्थ शिशु दोनों पर गंभीर चिकित्सीय जोखिम मंडराने लगते हैं। इसलिए डॉक्टरों की राय है कि कम से कम डेढ़ से दो साल की दूरी रखना हर लिहाज से सेहतमंद फैसला साबित होता है।
कम अंतराल में दोबारा गर्भधारण करने के नुकसान
जब दो बच्चों के बीच का समय अंतराल बहुत कम रखा जाता है, तो महिला के शरीर पर कई स्तरों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसके प्रमुख प्रभाव इस प्रकार देखे जाते हैं
- पोषक तत्वों की भारी कमी: गर्भावस्था और शिशु को दूध पिलाने की प्रक्रिया में मां के शरीर में मौजूद आयरन, फोलेट और महत्वपूर्ण विटामिन्स का भंडार पूरी तरह खत्म हो जाता है। बिना पर्याप्त समय दिए दोबारा गर्भवती होने पर शरीर इन आवश्यक तत्वों की भरपाई नहीं कर पाता, जिससे महिला गंभीर एनीमिया और कमजोरी का शिकार हो सकती है।
- अपरिपक्व प्रसव और जन्म के समय कम भार: चिकित्सीय अध्ययनों में यह पाया गया है कि दो गर्भधारण के बीच कम फासला होने से प्रीटर्म डिलीवरी, यानी समय से पहले प्रसव होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा पैदा होने वाले नवजात का वजन सामान्य से काफी कम रह सकता है, जिससे उसकी शुरुआती रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है।
- मांसपेशियों और जोड़ों में पुराना दर्द: लगातार गर्भधारण की स्थिति में गर्भाशय, कमर, पेल्विक हिस्से और पैरों को समुचित आराम नहीं मिल पाता। इससे महिलाओं में पीठ दर्द, रीढ़ की हड्डी में खिंचाव और जोड़ों में स्थाई दर्द की शिकायतें तेजी से बढ़ने लगती हैं।
लंबा अंतराल रखने के फायदे और कुछ चुनौतियां
दूसरी तरफ, यदि दो बच्चों के जन्म के बीच 5 वर्ष या उससे अधिक का लंबा फासला रखा जाता है, तो इसके भी अपने अलग परिणाम सामने आते हैं। इतने लंबे अंतराल में महिला को पहले बच्चे के लालन-पालन, उसे आत्मनिर्भर बनाने और खुद को मानसिक तौर पर पूरी तरह स्थिर करने का भरपूर अवसर मिल जाता है। परिवार का वातावरण भी नए बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाता है।
हालांकि, इसका दूसरा चिकित्सीय पहलू यह है कि पहली गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर और गर्भाशय ने जो लचीलापन और शारीरिक अनुकूलता हासिल की थी, वह धीरे-धीरे कम होने लगती है। पांच साल बाद शरीर एक तरह से पहली बार गर्भधारण करने जैसी स्थिति में लौटने लगता है, जिससे प्रसव पीड़ा और शारीरिक बदलावों से दोबारा उसी तरह जूझना पड़ सकता है जैसा पहले बच्चे के वक्त हुआ था।
दूसरा शिशु प्लान करते समय इन सावधानियों पर दें ध्यान
यदि कोई दंपति अपनी दूसरी संतान के स्वागत की योजना बना रहा है, तो उन्हें कई व्यावहारिक और चिकित्सकीय पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए
- सी-सेक्शन का पिछला इतिहास: अगर पहली डिलीवरी सामान्य न होकर सिजेरियन ऑपरेशन के जरिए हुई थी, तो आंतरिक टांकों और गर्भाशय की दीवार को पूरी ताकत हासिल करने के लिए कम से कम 18 से 24 महीने का समय अनिवार्य रूप से दिया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई सर्जिकल जटिलता न आए।
- बढ़ती उम्र और फर्टिलिटी स्तर: उम्र का असर महिला और पुरुष दोनों की प्रजनन क्षमता और शारीरिक ऊर्जा पर पड़ता है। यदि मां की आयु 35 वर्ष के पार पहुंच रही है, तो गर्भधारण की योजना बनाने से पूर्व स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलकर ओवेरियन रिजर्व और संपूर्ण स्वास्थ्य की नियमित जांच अवश्य करानी चाहिए।
- मानसिक और पारिवारिक तैयारी: पहले से मौजूद छोटे बच्चे की परवरिश करते हुए दूसरी गर्भावस्था के शारीरिक और भावनात्मक उतार-चढ़ाव को संभालना आसान नहीं होता। इसके लिए जरूरी है कि मां खुद को मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार महसूस करे और परिवार का सक्रिय सहयोग उसके साथ हो।
- विशेषज्ञ परामर्श: किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले महिला की फिटनेस, पिछली डिलीवरी की मेडिकल फाइल और व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थितियों की समीक्षा किसी अनुभवी डॉक्टर से कराई जानी चाहिए।

















