ऋषिकेश में बहती पावन गंगा नदी के किनारे, खूबसूरत प्राकृतिक नज़ारे और जीवंत कैफे संस्कृति हमेशा से दुनिया भर के सैलानियों को अपनी ओर खींचते रहे हैं। लेकिन इन दिनों देवभूमि के इस मशहूर पर्यटन स्थल पर एक नए और अनोखे अंदाज़ की चाय काफी सुर्खियां बटोर रही है। यह चाय सिर्फ अपने लाजवाब स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि एक बेहद अनोखे प्रयोग के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है। यहां चाय खत्म करने के बाद लोगों को खाली कप फेंकने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि वे उस पूरे कप को ही बड़े चाव से खा जाते हैं। इस पर्यावरण-अनुकूल पहल ने न केवल पर्यटकों का दिल जीता है, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच भी इसे लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है।
गंगा किनारे स्वाद और सेहत का अनोखा संगम
ऋषिकेश के वीरभद्र मंदिर रोड पर स्थित बैम्बू कैफे इस नई और पर्यावरण के अनुकूल पहल का मुख्य केंद्र बना हुआ है। इस कैफे के संचालक अनुज मित्तल ने चाय प्रेमियों के लिए कुछ अलग और बेहतर करने की ठानी। उन्होंने पारंपरिक चाय के बजाय एक ऐसा विकल्प पेश किया जो स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिए भी फायदेमंद है। इस खास चाय को बनाने में तुलसी जैसी कई प्राकृतिक और औषधीय जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे इसकी महक और स्वाद दोनों ही बेहद लाजवाब हो जाते हैं। लेकिन इस पूरी चाय की सबसे बड़ी खासियत इसका वह बर्तन है जिसमें इसे परोसा जाता है।
कूड़ेदान की जगह पेट में जाता है यह अनोखा कप
अमूमन चाय पीने के बाद डिस्पोजेबल प्लास्टिक या पेपर कप कचरे के डिब्बे में फेंक दिए जाते हैं, जो पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट पैदा करते हैं। हालांकि, इस कैफे में ऐसा बिल्कुल नहीं होता। यहां मिलने वाला चाय का कप पूरी तरह से खाने योग्य है। इसे विशेष रूप से मूंगफली और कुछ अन्य पौष्टिक खाद्य सामग्रियों की मदद से तैयार किया जाता है। कप के भीतरी हिस्से में चॉकलेट की एक मोटी परत लगाई जाती है। यह चॉकलेट न केवल गरम चाय को कप से बाहर बहने या कप को गलने से बचाती है, बल्कि चाय के खत्म होते-होते उसमें एक मीठा और अनोखा स्वाद भी घोल देती है। जब लोग अपनी गरम चाय पूरी पी लेते हैं, तो वे इस कप को एक स्वादिष्ट बिस्किट की तरह चबाकर खा जाते हैं। इस तरह से शून्य कचरा का लक्ष्य आसानी से हासिल हो जाता है।
नोएडा से नाता और मुंबई से मिली प्रेरणा
इस कमाल के विचार को धरातल पर उतारने वाले अनुज मित्तल ने इसके पीछे की पूरी कहानी साझा की है। उन्होंने बताया कि वह इन खाने योग्य कपों को उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर से मंगवाते हैं। हालांकि उन्हें कप बनाने की पूरी निर्माण प्रक्रिया और तकनीक की गहरी जानकारी तो नहीं है, लेकिन वे इतना जरूर जानते हैं कि इसमें मूंगफली जैसी प्राकृतिक चीजों का उपयोग होता है और भीतरी चॉकलेट की परत इसके स्वाद को दोगुना कर देती है। इस अनूठी पर्यावरण-अनुकूल चाय की कीमत केवल 40 रुपये रखी गई है, जो आम लोगों के बजट में बेहद आसानी से फिट बैठती है।
अनुज मित्तल ने यह भी बताया कि इस अनोखे प्रयोग की शुरुआत करने का ख्याल उन्हें देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से आया था। लगभग 4 से 5 साल पहले जब वह मुंबई के सफर पर थे, तब उन्होंने वहां पहली बार इस तरह की खाने योग्य कप वाली चाय देखी थी। तभी उनके मन में यह विचार आया कि क्यों न इस अद्भुत और पर्यावरण को बचाने वाले विचार को ऋषिकेश जैसे पावन और खूबसूरत शहर में शुरू किया जाए। इसके बाद उन्होंने अपने बैम्बू कैफे में इसे आजमाया और आज यह पूरे शहर में एक लोकप्रिय ट्रेंड बन चुका है।
सुबह से रात तक चाय प्रेमियों का जमावड़ा
यह कैफे सुबह के शांत और सुहावने वातावरण में 6 बजे ही खुल जाता है और देर रात लगभग 11 से 12 बजे तक ग्राहकों का स्वागत करता रहता है। सुबह की ताजी हवा में चाय की चुस्की लेने वाले लोगों से लेकर, शाम के समय दोस्तों के साथ महफिल सजाने वाले युवाओं तक, हर समय यहां लोगों की भारी चहल-पहल देखी जा सकती है। प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने और एक नया अनुभव देने की इस कोशिश की पर्यावरण प्रेमी दिल खोलकर सराहना कर रहे हैं। ऋषिकेश आने वाला हर सैलानी अब इस अनूठी चाय का स्वाद लेने के लिए बैम्बू कैफे की तरफ रुख कर रहा है।



















