जुलाई का महीना आधा बीत चुका है, लेकिन मानसून की चाल अब भी ढीली है। बारिश न होने के बावजूद उमस लगातार बढ़ रही है, और इसका सीधा असर इंसानों के साथ-साथ दुधारू पशुओं पर भी पड़ रहा है। ऐसे मौसम में गाय-भैंस का दूध घटना, दूध में फैट कम होना और पशुओं का बीमार पड़ना आम समस्या बन जाती है। सतना जिला पशु चिकित्सालय के प्रभारी डॉ. बृहस्पति भारती के मुताबिक अगर पशुपालक समय रहते खान-पान और देखभाल पर ध्यान दें तो इस नुकसान को काफी हद तक टाला जा सकता है। उनका कहना है कि उमस भरे इस मौसम में पशुओं को संतुलित और पौष्टिक आहार देना सबसे जरूरी कदम है, क्योंकि सही मात्रा में हरा चारा, दाना और पोषक तत्व मिलने से बारिश की कमी और गर्मी दोनों का असर कम हो जाता है।
हरे चारे में छुपा है दूध बढ़ाने का राज
पशुपालन विभाग इन दिनों किसानों को एमपी चरी और हाइब्रिड नेपियर जैसी हरे चारे की किस्मों की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, और कई किसानों को इसके बीज और पौधे भी मुफ्त में उपलब्ध कराए जा चुके हैं। इन किस्मों की खासियत यह है कि किसान इन्हें अपने खेत में ही उगाकर घर पर पौष्टिक और ऑर्गेनिक हरा चारा तैयार कर सकते हैं, जिससे बाजार पर निर्भरता कम हो जाती है। जिन पशुपालकों को साल भर हरे चारे की सप्लाई बनाए रखनी है, उनके लिए साइलेज यानी हरे चारे का अचार बनाना एक बेहतरीन तरीका है। इसे घर पर ही तैयार किया जा सकता है और चारे की कमी वाले महीनों में जरूरत पड़ने पर पशुओं को खिलाया जा सकता है।
दाना अचानक नहीं, धीरे-धीरे बढ़ाएं
विशेषज्ञों की सलाह है कि पशुओं के आहार में कंसंट्रेट यानी दाना मिश्रण की मात्रा एकदम से नहीं बढ़ानी चाहिए, बल्कि इसे 7 से 10 दिनों के भीतर धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए ताकि पशु का पाचन तंत्र इसे आसानी से स्वीकार कर सके। दाना हमेशा सूखे भूसे और हरे चारे के साथ मिलाकर टीएमआर यानी टोटल मिक्स राशन के रूप में देना बेहतर माना जाता है। सामान्य नियम के तौर पर गाय को हर 3 लीटर दूध पर 1 किलो अतिरिक्त कंसंट्रेट देना चाहिए, जबकि भैंस को हर 2 से 2.5 लीटर दूध पर 1 किलो अतिरिक्त दाना दिया जाना चाहिए। इस दाने में मक्का, गेहूं और चोकर के साथ-साथ प्रोटीन के लिए सरसों, बिनौला या दूसरी खलियों को शामिल करना फायदेमंद रहता है।
15 लीटर से ज्यादा दूध देने वाली गाय-भैंस पर खास नजर
अगर कोई गाय या भैंस रोजाना 15 लीटर से ज्यादा दूध दे रही है, तो सिर्फ साधारण दाना बढ़ा देना काफी नहीं है, बल्कि नुकसानदेह भी हो सकता है, क्योंकि इससे पेट खराब होने या एसिडोसिस जैसी दिक्कत पैदा हो सकती है। ऐसे ज्यादा दूध देने वाले पशुओं के लिए बाईपास फैट और बाईपास प्रोटीन के साथ-साथ रूमन बफर के तौर पर करीब 100 ग्राम मीठा सोडा देना फायदेमंद रहता है। इससे पशु का पाचन बेहतर बना रहता है और दूध उत्पादन पर भी सीधा सकारात्मक असर देखने को मिलता है।
बघेलखंड की देसी तरकीबें आज भी असरदार
डॉ. भारती के अनुसार बघेलखंड क्षेत्र में आसानी से मिलने वाली अलसी, राई, बिनौला और कॉटन आधारित कंसंट्रेट को अगर सही तरीके से खिलाया जाए तो ये दूध और फैट दोनों बढ़ाने में मदद करते हैं। बिनौले को खिलाने से पहले रातभर पानी में भिगोकर रखना चाहिए और सुबह उसे अच्छी तरह उबाल लेना चाहिए, ताकि उसमें मौजूद गॉसिपोल नाम का हानिकारक तत्व पूरी तरह खत्म हो जाए। इसी तरह कॉटन खली को खिलाने से 4 से 5 घंटे पहले पानी में भिगोना जरूरी होता है। अलसी को हल्का भूनकर दरदरा पीस लेना चाहिए और रोजाना सिर्फ 100 से 200 ग्राम तक ही इसे दाने में मिलाना चाहिए। राई को साबुत खिलाने की बजाय दरदरा पीसकर दलिया के साथ पकाकर देना बेहतर रहता है, और इसकी मात्रा कुल दाने के 10 से 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं रखनी चाहिए। इन सभी चीजों को सूखे भूसे और हरे चारे के साथ अच्छी तरह मिलाकर खिलाने पर ही असली फायदा मिलता है।
हरा चारा कम हो तो खांड-बेसन बनेगा सहारा
अगर किसी पशुपालक के पास पर्याप्त हरा चारा उपलब्ध नहीं है, तो पशुओं के आहार में पौष्टिक विकल्प शामिल करना जरूरी हो जाता है। डॉ. भारती के मुताबिक खांड और बेसन को पानी में पकाकर देने से पशुओं को तुरंत ऊर्जा और अच्छी मात्रा में प्रोटीन मिल जाता है। इससे शरीर की कमजोरी कम होती है, दूध में प्रोटीन और फैट की मात्रा बढ़ती है, पाचन तंत्र मजबूत बना रहता है, और गर्मी व उमस से पशु पर पड़ने वाला तनाव भी कम हो जाता है। हालांकि अगर पशुओं को पहले से ही पर्याप्त मात्रा में एमपी चरी या दूसरा हरा चारा मिल रहा है, तो इस तरह के अतिरिक्त उपायों की जरूरत काफी कम पड़ जाती है।
खली भिगोने का सही तरीका जानना जरूरी
सरसों, बिनौला या मूंगफली की खली को कभी भी सीधे पशुओं के सामने नहीं डालना चाहिए। इसे खिलाने से 4 से 6 घंटे पहले 1 भाग खली और 2 से 3 भाग पानी के अनुपात में भिगो देना चाहिए, ताकि यह अच्छी तरह फूल जाए और उसमें मौजूद हानिकारक तत्व निष्क्रिय हो जाएं। ध्यान रहे कि खली को कभी उबालना नहीं चाहिए, क्योंकि उबालने से उसमें मौजूद जरूरी प्रोटीन और पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। जब खली पूरी तरह मुलायम हो जाए, तभी उसे सूखे भूसे और हरे चारे के साथ मिलाकर पशुओं को खिलाना चाहिए। गर्मी और उमस भरे इस मौसम में खली को 8 से 10 घंटे से ज्यादा पानी में भिगोकर नहीं रखना चाहिए, क्योंकि इतने समय के बाद उसमें खमीर उठने और फंगस लगने का खतरा बढ़ जाता है। सही खान-पान और संतुलित आहार अपनाकर पशुपालक इस मुश्किल मौसम में भी अपने दुधारू पशुओं को स्वस्थ रख सकते हैं और दूध उत्पादन में आने वाली गिरावट से बच सकते हैं।











