हर मां-बाप चाहते हैं कि उनका बच्चा अनुशासित और जिम्मेदार बने, लेकिन जिन तरीकों का सहारा ज्यादातर घरों में लिया जाता है, वो फायदे की जगह उल्टा नुकसान कर सकते हैं. करीब 7,500 बच्चों पर हुई एक स्टडी के मुताबिक, जो पैरेंट्स अपने 3 साल के बच्चों पर बार-बार चिल्लाते हैं, उन बच्चों में 9 साल की उम्र तक मानसिक तनाव का खतरा डेढ़ गुना बढ़ जाता है. वहीं 1.6 लाख से ज्यादा बच्चों पर हुई एक और स्टडी में सामने आया कि थप्पड़ मारने या हाथ उठाने से बच्चे बातूनी, गुस्सैल और जिद्दी बन जाते हैं. अगर नीचे बताए गए ये 5 तरीके आपके घर में भी अपनाए जाते हैं, तो अब वक्त है इन पर दोबारा सोचने का.
हर छोटी बात पर चिल्लाना
बच्चे से जरा सी गलती हुई नहीं कि कई पैरेंट्स सीधे चीखने-चिल्लाने पर उतर आते हैं. उस पल में बच्चा डर के मारे चुप जरूर हो जाता है, लेकिन इस डर का मतलब सीखना नहीं होता. बच्चे को यह समझ नहीं आता कि उसने आखिर गलत क्या किया, उसे बस इतना लगता है कि गलती करने का मतलब है सामने वाले का गुस्सा झेलना. नतीजा यह होता है कि बच्चा धीरे-धीरे अपनी बातें आपसे छुपाने लगता है और आपस की बॉन्डिंग कमजोर पड़ने लगती है.
टीवी, गेम या बाहर जाना बंद करना
"अब से टीवी बंद", "आज कोई खेलने नहीं जाएगा", ऐसी बातें कहकर पैरेंट्स अक्सर बच्चे की पसंदीदा चीज छीन लेते हैं, यह सोचकर कि इससे वो सुधर जाएगा. लेकिन हकीकत में बच्चे का ध्यान अपनी गलती पर नहीं, बल्कि इस बात पर टिका रहता है कि उसकी मनपसंद चीज उससे दूर क्यों की गई. जितनी ज्यादा रोक-टोक होगी, बच्चा उतना ही जिद्दी और बागी होता चला जाएगा.
हाथ उठाना या मारना
बहुत से पैरेंट्स मानते हैं कि कभी-कभार का एक थप्पड़ बच्चे को लाइन पर रखने के लिए जरूरी है. मार के डर से बच्चा उस वक्त भले ही मान जाए, पर वो कभी यह नहीं समझ पाता कि उसका किया गया काम गलत क्यों था, वो सिर्फ दर्द से डरना सीख जाता है. डॉक्टर भी कहते हैं कि मारपीट बच्चों के मन में गुस्सा भर देती है. शरीर की चोट तो कुछ दिनों में भर जाती है, लेकिन मन पर लगी चोट उम्र भर पीछा नहीं छोड़ती.
ताने मारना या शर्मिंदा करना
"तुमसे कुछ नहीं होगा", "तुम बहुत आलसी हो", ऐसे तानों से बच्चे का कॉन्फिडेंस पूरी तरह चकनाचूर हो जाता है. बच्चे इन बातों को सच मानने लगते हैं और कोशिश करना ही छोड़ देते हैं. वे अपनी भावनाओं को अंदर ही अंदर दबाने लगते हैं. किसी बच्चे में हीन भावना भरकर उसे अच्छा इंसान नहीं बनाया जा सकता.
चौबीसों घंटे टोकते रहना
"जूते यहां क्यों फेंके", "होमवर्क कब खत्म होगा", "कमरा साफ करो", जब यही बातें सुबह से शाम तक टेप रिकॉर्डर की तरह बार-बार दोहराई जाती हैं, तो बच्चे इन्हें अनसुना करना सीख जाते हैं. उनके लिए इन शब्दों की कोई अहमियत नहीं रह जाती. जिम्मेदारी समझने के बजाय वे आपसे और आपकी बातों से दूर भागने लगते हैं.
डांट नहीं, प्यार से समझाना काम आता है
अनुशासन का मकसद बच्चे के मन में डर बिठाना नहीं, बल्कि उसे सही और गलत का फर्क समझाना है. उसे यह बताना जरूरी है कि उसकी गलती से आखिर क्या नुकसान हुआ. जब बच्चा बिना किसी डर के अपनी भूल को समझता है, तो बदलाव उसके अंदर से आता है और वो टिकाऊ भी होता है. यह सच है कि बच्चे के गुस्सा दिलाने पर शांत रहना आसान नहीं होता, लेकिन जब आप चिल्लाने की बजाय ठंडे दिमाग से बात करते हैं, तो बच्चा सिर्फ मान ही नहीं जाता, बल्कि बात को समझता भी है.











