मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में इस बरसाती मौसम में खेतों के पुराने कुएं किसानों के लिए मौत का फंदा बनते जा रहे हैं। बारिश शुरू होने से ठीक पहले जब किसान सिंचाई की मोटर निकालने या ठीक करवाने के लिए बिना सोचे-समझे कुएं के भीतर उतर जाते हैं, तो महीनों से बंद पड़े कुएं में जमा हो चुकी जहरीली गैस उनकी जान ले लेती है। पिछले कुछ ही दिनों में जिले में सामने आई तीन अलग-अलग घटनाओं में चार किसानों की मौत हो चुकी है, और स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि हर मानसून सीजन में ऐसी खबरें जिले के किसी न किसी हिस्से से आती ही हैं।
कुएं में उतरते ही बेहोश होकर गिरे किसान
नवेगांव थाना क्षेत्र के सितकुटोला गांव में रहने वाले लक्ष्मण लिल्हारे अपने खेत के कुएं में उतरे थे। उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि कुएं के भीतर जहरीली गैस जमा हो चुकी है। गैस की चपेट में आते ही वे बेहोश हो गए, वहीं कुएं में गिर पड़े और उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
कुछ ही दिनों बाद किरनापुर थाना क्षेत्र के मरारीटोला गांव से भी लगभग वैसी ही खबर सामने आई। यहां अशोक कावरे नाम के किसान कुएं के भीतर उतरे और जहरीली गैस के असर से उनकी जान चली गई। इस हादसे के ठीक अगले दिन, यानी 9 जुलाई को किरनापुर थाना क्षेत्र के ही पीपरटोला गांव में एक साथ दो जानें चली गईं। मोटर सुधरवाने के इरादे से कुएं में उतरे दो दोस्त, महेश चौधरी और युवराज बिसेन, गैस के चपेट में आकर दम तोड़ बैठे। बालाघाट में हर साल बरसात से ठीक पहले ऐसे कई हादसे दर्ज होते हैं, जिनमें किसान परिवार अपने घर के कमाने वाले सदस्यों को खो बैठते हैं।
आखिर कुएं के भीतर यह गैस बनती कैसे है
जून का महीना शुरू होते ही किसान खेती की तैयारियों में जुट जाते हैं, कुओं की सफाई करते हैं और बारिश में डूबने से बचाने के लिए मोटर बाहर निकालते हैं। लेकिन जो कुआं महीनों से बंद और अछूता पड़ा रहता है, उसकी तली में जमा कीचड़ और सड़ी हुई वनस्पति धीरे-धीरे मीथेन गैस छोड़ने लगती है, और साथ ही उस बंद जगह में मौजूद ऑक्सीजन का स्तर भी काफी गिर जाता है। किसान को बाहर से इसकी कोई भनक नहीं लगती, क्योंकि गैस दिखती नहीं और गंध भी हमेशा महसूस नहीं होती। जैसे ही वह भीतर उतरता है, मीथेन के सीधे संपर्क में आने और सांस लेने लायक ऑक्सीजन की कमी से चंद मिनटों में ही उसका दम घुटने लगता है।
उतरने से पहले यह आसान जांच जरूर करें
एसडीआरएफ के जिला कमांडेंट एल के उड्डे ने बताया कि जो कुएं लंबे समय से बंद पड़े रहते हैं, उनमें जहरीली गैस बनने की आशंका सबसे ज्यादा रहती है। उनके मुताबिक किसी भी पुराने या लंबे समय से बंद कुएं में उतरने से पहले एक सरल तरीका आजमाया जा सकता है, एक बाल्टी में जलता हुआ दीया या मोमबत्ती रखकर उसे रस्सी के सहारे धीरे-धीरे कुएं के भीतर उतारा जाए। अगर लौ बीच में ही बुझ जाती है, तो इसका मतलब है कि वहां ऑक्सीजन की भारी कमी है और जहरीली गैस मौजूद है। ऐसी स्थिति में किसी को भी उस कुएं में उतरने की गलती नहीं करनी चाहिए।
अगर गैस बन चुकी हो तो कुएं को सुरक्षित कैसे बनाएं
एल के उड्डे के मुताबिक अगर कुएं में गैस जमा होने का जरा भी शक हो, तो उतरने से पहले वहां तेज धार से पानी की बौछार करनी चाहिए, इससे भीतर की हवा हिलती है और गैस का जमाव कुछ हद तक टूटता है। इसके अलावा रस्सी से बंधी पानी से भरी बाल्टी को बार-बार कुएं के भीतर पटका जाए, इससे भी अंदर जमा गैस का बड़ा हिस्सा बाहर निकल जाता है। अगर मजबूरी में कुएं के भीतर उतरना ही पड़े, तो उतरने वाले व्यक्ति को खुद को रस्सी से मजबूती से बांध लेना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर उसे तुरंत बाहर खींचा जा सके। साथ ही ऊपर कम से कम एक व्यक्ति को हर हाल में निगरानी के लिए खड़ा रखना चाहिए, जो किसी अनहोनी की स्थिति में फौरन मदद बुला सके।
गैस का शक हो तो सीधे प्रशासन से संपर्क करें
जिला होमगार्ड एवं नागरिक सुरक्षा विभाग ने आमजन से साफ अपील की है कि कुएं, सेप्टिक टैंक, बोरवेल या किसी भी बंद स्थान में बिना गैस की जांच किए, बगैर सुरक्षा उपकरण और प्रशिक्षित बचाव दल की मदद के हरगिज न उतरें। विभाग ने चेताया है कि ऐसी बंद जगहों में जहरीली गैस और ऑक्सीजन की कमी जानलेवा साबित हो सकती है, और अकेले उतरने वाला व्यक्ति चंद सेकंड में ही बेहोश हो सकता है। विभाग ने सलाह दी है कि किसी भी आपात स्थिति में देरी किए बिना तुरंत पुलिस, होमगार्ड या जिला कंट्रोल रूम को सूचना दी जाए, ताकि प्रशिक्षित बचाव दल समय रहते मौके पर पहुंच सके।



















