खरीफ का सीजन शुरू होते ही बुंदेलखंड इलाके के किसान धान, अरहर और सोयाबीन की बुवाई में जुट गए हैं। इनमें से जो किसान धान की खेती में लागत घटाकर मुनाफा बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए एक खास तकनीक इन दिनों तेजी से चर्चा में है, जिसे किसान 'श्री विधि' के नाम से जानते हैं। कृषि एक्सपर्ट लगातार इस तकनीक को बढ़ावा दे रहे हैं और कई जगह किसानों को समझाने के लिए प्रदर्शन इकाइयां भी लगाई गई हैं।
पारंपरिक तरीके से क्यों बढ़ती है लागत
खेती को मुनाफे का धंधा बनाना है तो पुरानी पद्धतियों की जगह आधुनिक तकनीक अपनानी होगी। इससे किसान आत्मनिर्भर बनते हैं और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। बुंदेलखंड में धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है, लेकिन ज्यादातर किसान अब भी पुराने तरीके से बुवाई करते हैं, जिसमें बीज की खपत भी ज्यादा होती है और मेहनत के मुकाबले पैदावार भी सीमित रहती है।
बीज चार गुना कम, फिर भी पैदावार डेढ़ गुना ज्यादा
एनआरएलएम के पूर्व जिला कृषि प्रबंधक अनूप तिवारी के मुताबिक, पारंपरिक तरीके से धान बोने पर प्रति एकड़ करीब 40 किलोग्राम बीज लगता है, और इतनी मेहनत के बाद भी उपज सिर्फ 12 से 16 कुंतल के आसपास रहती है। वहीं श्री विधि से खेती करने पर प्रति एकड़ महज 3 से 4 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है। बीज की इतनी बड़ी बचत के बावजूद पैदावार 20 से 22 कुंतल तक पहुंच जाती है, यानी बीज की खपत बेहद कम और उपज करीब डेढ़ गुना ज्यादा।
नर्सरी से ट्रांसप्लांट तक, कैसे काम करती है श्री विधि
श्री विधि का पूरा नाम 'सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन' है। इसमें धान या अरहर की बुवाई से पहले नर्सरी तैयार की जाती है। पौधा जब 7 से 15 दिन का हो जाता है, तभी उसे खेत में रोपा जाता है। रोपाई करते समय एक जगह पर सिर्फ एक ही पौधा लगाया जाता है, ना कि गुच्छों में।
25 सेंटीमीटर की दूरी से मिलता है ज्यादा उत्पादन
श्री विधि में दो पौधों के बीच करीब 25 सेंटीमीटर की दूरी रखी जाती है। इतनी जगह मिलने से हर पौधे को फैलने का पूरा मौका मिलता है और उसे उर्वरक और पोषक तत्व भी सही मात्रा में मिल पाते हैं। यही वजह है कि पौधों में कल्ले ज्यादा निकलते हैं और वे पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बनते हैं। हालांकि इस तकनीक में एक सावधानी जरूरी है, समय-समय पर खेत की निंदाई-गुड़ाई करनी पड़ती है ताकि खरपतवार फसल को नुकसान न पहुंचाए।
पहले नतीजे, फिर अपनाने की सलाह
चूंकि यह तकनीक ज्यादातर किसानों के लिए नई है, इसलिए कृषि विभाग ने अलग-अलग जगहों पर प्रदर्शन इकाइयां लगाई हैं। इसका मकसद यही है कि किसान पहले श्री विधि से मिलने वाले नतीजे अपनी आंखों से देखें, और उसके बाद ही अपने पूरे खेत में इसे अपनाने का फैसला लें।











