जोधपुर जिले की तिंवरी तहसील के अंतर्गत आने वाले बिंजवाड़िया गांव में हाल ही में कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने स्थानीय किसानों के लिए एक विशेष जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। मानसून का आगमन भारतीय कृषि के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण समय होता है, और इसी को ध्यान में रखते हुए किसानों को पारंपरिक रसायनों के बिना बेहतर फसल उगाने के गुर सिखाए गए। कृषि विश्वविद्यालय के अधीन कार्यरत किसान कौशल विकास केंद्र द्वारा इस कार्यक्रम का संचालन किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की खेती पर होने वाली लागत को न्यूनतम करना था। शिविर के दौरान उपस्थित विशेषज्ञों ने प्राकृतिक खेती, जैविक खाद के निर्माण और फसलों को कीड़ों व रोगों से बचाने के वैज्ञानिक तरीकों पर गहराई से प्रकाश डाला।
मिट्टी की सेहत सुधारने और लागत घटाने पर जोर
इस विशेष जागरूकता कार्यक्रम में किसान कौशल विकास केंद्र की नोडल अधिकारी डॉ. प्रियंका स्वामी ने उपस्थित किसानों को प्राकृतिक खेती के दीर्घकालिक लाभों के बारे में विस्तार से समझाया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि किसान रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे कम करें, तो न केवल मिट्टी की उपजाऊ क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होगा, बल्कि खेती के खर्चों में भी भारी कटौती की जा सकती है। डॉ. प्रियंका स्वामी ने किसानों से अपील की कि वे लगातार कृषि विश्वविद्यालय और कौशल विकास केंद्र के संपर्क में रहें और समय-समय पर आयोजित होने वाले ऐसे तकनीकी प्रशिक्षण सत्रों का पूरा लाभ उठाएं, जिससे उनकी फसलों की उत्पादकता और गुणवत्ता बनी रहे।
जैविक खाद का वैज्ञानिक उपयोग और पर्यावरण का संरक्षण
प्रशिक्षण सत्र के अगले चरण में प्रशिक्षण अधिकारी नीलिमा मकवाना ने पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने किसानों को जैविक खाद तैयार करने की वैज्ञानिक विधियों और उसके सटीक इस्तेमाल के तरीकों के बारे में व्यावहारिक जानकारियां दीं। नीलिमा मकवाना ने कहा कि वर्तमान समय की मांग है कि रासायनिक खेती के इनपुट का उपयोग बहुत ही संतुलित और सोच-समझकर किया जाए। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने की अपील की, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए कृषि भूमि की उर्वरता सुरक्षित रह सके।
वैज्ञानिक तरीकों से फसल प्रबंधन और खेतों का दौरा
कार्यक्रम में मौजूद कृषि विशेषज्ञ सुभाष बाजिया ने क्षेत्र की विशिष्ट जलवायु और वहां की मिट्टी की संरचना के अनुकूल विकसित की गई उन्नत फसल किस्मों के बारे में जानकारी साझा की। उन्होंने फसलों की वैज्ञानिक बुवाई और उचित प्रबंधन तकनीकों के बारे में विस्तार से बताया। इस प्रशिक्षण सत्र की सबसे खास बात यह रही कि केवल व्याख्यान देने तक ही बात सीमित नहीं रही, बल्कि इसके बाद विशेषज्ञों का पूरा दल खुद किसानों के खेतों तक गया। वहां उन्होंने खड़ी फसलों का बारीकी से निरीक्षण किया और किसानों की व्यावहारिक समस्याओं को मौके पर ही सुनकर उनके त्वरित और आसान समाधान सुझाए। इस व्यावहारिक मार्गदर्शन से किसानों को आगामी मानसून सत्र में अपनी फसलों की बेहतर देखरेख करने में मदद मिलेगी।
रोगग्रस्त पौधों की जांच और किसानों की सकारात्मक प्रतिक्रिया
खेटों के निरीक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे पौधों के नमूने भी एकत्र किए जो किसी रोग से ग्रस्त थे। कृषि अनुसंधान केंद्र के सह आचार्य डॉ. अशोक मीणा ने इन नमूनों की गहन जांच की। उन्होंने किसानों को रोग के लक्षणों की सही पहचान करना सिखाया, उनके पीछे के वैज्ञानिक कारणों को समझाया और फिर प्राकृतिक व वैज्ञानिक दोनों प्रकार के उपचारों के बारे में विस्तार से बताया। इस प्रशिक्षण शिविर में बिंजवाड़िया और आसपास के क्षेत्रों से आए बड़ी संख्या में किसानों ने बेहद उत्साह के साथ भाग लिया। किसानों ने इस पूरी पहल की जमकर सराहना की और इसे वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत बताया। उन्होंने कृषि विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की कि वे भविष्य में भी ऐसे जानकारीपरक और व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन नियमित अंतराल पर करते रहें ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों को लगातार वैज्ञानिक मदद मिलती रहे।













