दुनिया के पहले सफेद बाघ 'मोहन' की कहानी मध्य प्रदेश के सीधी जिले में स्थित पंखोरा के घने जंगलों से शुरू हुई थी। साल 1951 का वह दौर वन्यजीव इतिहास के लिए बेहद खास था, जब इसी स्थान पर एक बाघिन ने प्राकृतिक रूप से सफेद रंग के शावक को जन्म दिया था। इस एक घटना ने न केवल सीधी का नाम दुनिया भर में चमका दिया, बल्कि सफेद बाघों की पूरी वंश परंपरा की नींव भी रखी। हालांकि, आज के समय में यह स्थान अपनी उस ऐतिहासिक उपलब्धि को खोता हुआ सा नजर आता है, क्योंकि विश्व भर में सफेद बाघों की पहचान के बावजूद, जिस जमीन ने उन्हें जन्म दिया, वह आज भी गुमनामी के अंधेरे में है।
इतिहास का अनमोल पन्ना: 'मोहन' का जन्म
पंखोरा के जंगलों की भौगोलिक बनावट और यहां की ऐतिहासिक कंदराएं आज भी उस गवाह के रूप में मौजूद हैं, जहां 1951 में प्रकृति का एक अद्भुत चमत्कार हुआ था। तब रीवा रियासत के महाराजा गुलाब सिंह शिकार के लिए इन जंगलों में गए थे, तभी उनकी नजर उस सफेद शावक पर पड़ी। यह शावक अपने अन्य सामान्य पीले भाई-बहनों के बीच बिल्कुल अलग और अनोखा दिख रहा था। उसे वहां से जीवित पकड़कर रीवा के गोविंदगढ़ किले में ले जाया गया, जहाँ उसकी देखभाल और संरक्षण की पूरी व्यवस्था की गई। यही बाघ 'मोहन' के नाम से विख्यात हुआ और आगे चलकर सफेद बाघों की नई पीढ़ियों का आधार बना।
संजय टाइगर रिजर्व का वर्तमान परिदृश्य
आज पंखोरा का क्षेत्र संजय टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आता है, जो वन्यजीवों के लिए एक संपन्न और सुरक्षित आवास के रूप में स्थापित हो चुका है। हाल के वर्षों में यहां रॉयल बंगाल टाइगरों यानी सामान्य पीले बाघों की संख्या में संतोषजनक वृद्धि देखी गई है। वन विभाग द्वारा कैमरा ट्रैप के माध्यम से लगातार बाघिनों और उनके शावकों की मौजूदगी दर्ज की जा रही है, जो इस जंगल के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का प्रमाण है। बावजूद इसके, सफेद बाघ की जन्मस्थली होने का गौरव इस क्षेत्र के पर्यटन विकास के मानचित्र पर उस स्तर पर नहीं दिख पाया है, जिसका यह हकदार है।
पर्यटन की दृष्टि से संभावनाएं और चुनौतियां
पंखोरा आने वाले पर्यटकों के लिए सबसे बड़ा दुखद अनुभव यह है कि उन्हें वहां पहुंचने के बाद उस ऐतिहासिक महत्व का कोई बोध नहीं होता। वहां न तो कोई स्मारक है, न ही कोई सूचना पट्ट जो उन्हें यह बताए कि वे विश्व के पहले सफेद बाघ की जन्मभूमि पर खड़े हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस स्थान पर एक व्हाइट टाइगर इंटरप्रिटेशन सेंटर, छोटा संग्रहालय, और प्रकृति पर्यटन से जुड़ी अन्य सुविधाएं विकसित की जाएं, तो यह न केवल देश बल्कि विदेश से आने वाले वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बड़ा आकर्षण बन सकता है। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, बल्कि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में भी बड़ा सुधार आएगा।
जेनेटिक म्यूटेशन और प्रकृति का दुर्लभ संयोग
सफेद बाघों के बारे में एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि ये कोई अलग प्रजाति नहीं हैं, बल्कि रॉयल बंगाल टाइगर में होने वाला एक दुर्लभ 'जेनेटिक म्यूटेशन' है। यही कारण है कि जंगल में हर पीले बाघ से सफेद शावक का जन्म संभव नहीं होता। 1951 में 'मोहन' के मिलने के बाद से अब तक सीधी के इन जंगलों में दोबारा किसी सफेद बाघ के जन्म की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। यह दुर्लभता ही इस जगह को और भी अधिक महत्वपूर्ण बनाती है, जिसे संजोकर रखना आवश्यक है।
संरक्षण की मांग और भविष्य की राह
स्थानीय समुदाय और पर्यावरण के प्रति समर्पित लोगों का एक बड़ा वर्ग लंबे समय से इस बात पर जोर दे रहा है कि पंखोरा को महज एक जंगल न रहने दिया जाए। उनकी मांग है कि इसे 'राष्ट्रीय धरोहर' का दर्जा मिले और इसे एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। उनका तर्क है कि जिस स्थान ने विश्व को सफेद बाघों की विरासत दी, उसे इतिहास के पन्नों में सीमित कर देना उचित नहीं है। यदि सरकार और वन विभाग इस दिशा में एक ठोस कार्य योजना तैयार करें, तो सीधी केवल एक जिले के रूप में नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध जैव विविधता और अनूठी प्राकृतिक विरासत के कारण पूरे विश्व के वन्यजीव पर्यटन के नक्शे पर एक नई पहचान बना सकेगा।











