सुप्रीम कोर्ट ने देश की अदालतों और पुलिस थानों में इस्तेमाल होने वाली भाषा को लेकर बड़ा फैसला लिया है। शीर्ष अदालत ने हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स नाम की एक नई ड्राफ्ट गाइडबुक को मंजूरी दे दी है, जिसमें एफआईआर, चार्जशीट और सुनवाई के दौरान पीड़ितों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पुराने और अपमानजनक शब्दों को हटाने का निर्देश दिया गया है। यह गाइडबुक भोपाल स्थित नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी यानी एनजेए में तैयार की गई है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने साफ कहा है कि देशभर के सभी कोर्ट और पुलिस विभाग एफआईआर दर्ज करने से लेकर चार्जशीट बनाने और अदालती कार्यवाही तक हर चरण में इस गाइडलाइन का पालन करें। इसके पीछे मकसद यह है कि कानूनी प्रक्रिया पूर्वाग्रह से मुक्त हो, भाषा सरल हो और पीड़ितों के साथ ज्यादा संवेदनशीलता से पेश आया जाए।
कौन से शब्द हटेंगे, किनकी जगह क्या आएगा
नई गाइडबुक में उन शब्दों और सोच को हटाने पर जोर दिया गया है, जो पीड़ितों के प्रति गलत नजरिया बनाते हैं। पहले इस्तेमाल होने वाले कई पुराने शब्दों की जगह अब सम्मानजनक और तटस्थ शब्द अपनाए जाएंगे। जैसे प्रोस्टिट्यूट या कॉल गर्ल जैसे शब्दों की जगह अब सेक्स वर्कर शब्द इस्तेमाल होगा। इसी तरह प्रोसिक्यूट्रिक्स शब्द की जगह पीड़ित या सर्वाइवर लिखा जाएगा। शीलभंग और चरित्रहीन जैसे शब्द भी अब अदालती और पुलिस भाषा से बाहर हो जाएंगे, इनकी जगह अपराध और पीड़ित के अधिकारों पर केंद्रित भाषा का इस्तेमाल किया जाएगा।
पीड़ितों और गवाहों से जुड़े नए नियम
गाइडबुक में यह भी साफ किया गया है कि यौन अपराधों की सुनवाई के दौरान पीड़ित के कपड़े, उसके व्यवहार या पुराने रिश्तों के आधार पर सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए। अदालतों को सिर्फ फैक्ट्स और सबूतों के आधार पर फैसला सुनाने की हिदायत दी गई है। एक अहम बिंदु यह भी है कि नाबालिगों की सहमति को कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जाएगा। इसके अलावा गवाहों के साथ भी सम्मानजनक व्यवहार करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि वे अदालत में डर या दबाव महसूस किए बिना अपनी बात रख सकें।
दुष्कर्म मामलों में टू-फिंगर टेस्ट पर रोक बरकरार
नई गाइडबुक में दुष्कर्म के मामलों में टू-फिंगर टेस्ट पर पूरी तरह पाबंदी की बात एक बार फिर दोहराई गई है। इस जांच पद्धति को पहले से ही अपमानजनक और मामले से जुड़ी सच्चाई सामने लाने में अप्रासंगिक माना जाता रहा है।
गाइडबुक बनाने वाली कमेटी में कौन-कौन शामिल
यह गाइडबुक तैयार करने के लिए पांच सदस्यों वाली एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई गई थी। इस कमेटी की अध्यक्षता नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक जस्टिस (रिटायर्ड) अनिरुद्ध बोस ने की। कमेटी में न्यायपालिका, कानून और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ शामिल किए गए थे, जिनमें भोपाल से जुड़े दो सदस्य भी थे। उम्मीद जताई जा रही है कि इस गाइडबुक के लागू होने के बाद न्याय प्रक्रिया में लैंगिक भेदभाव कम होगा और पीड़ितों को बेहतर और ज्यादा संवेदनशील तरीके से न्याय मिल सकेगा।











