महाराष्ट्र की सत्ताधारी राजनीति में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर दो अहम मुद्दों को लेकर अंदरूनी हलचल काफी तेज हो गई है। पार्टी की कोर टीम के स्तर पर एक तरफ जहां शरद पवार गुट के साथ दोबारा हाथ मिलाने अथवा संभावित विलय के नफा-नुकसान का आकलन किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ राज्य कैबिनेट में बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले वित्त मंत्रालय को अपने पाले में वापस लाने के लिए जोर-आजमाइश चल रही है। इन दोनों मसलों पर पार्टी की आंतरिक बैठकों में नेताओं के अलग-अलग रुख के चलते अब तक कोई साझा सहमति नहीं बन सकी है।
शरद पवार खेमे के साथ विलय पर कोर टीम में दो फाड़
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित हुई एक अहम बैठक में सुनेत्रा पवार गुट की कोर टीम के वरिष्ठ नेताओं से दोनों राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टियों के एकीकरण के विषय पर सीधे तौर पर सलाह ली गई। इस परिचर्चा के दौरान पार्टी का शीर्ष नेतृत्व दो स्पष्ट विचारधाराओं में बंटा हुआ दिखाई दिया। कुछ प्रभावशाली नेताओं का मानना था कि दोनों धड़ों का एक मंच पर वापस आना राजनीतिक भविष्य और चुनावी मजबूती के लिहाज से बेहद मुफीद साबित होगा। उनका तर्क था कि बिखराव को खत्म करके एक संयुक्त ताकत के रूप में उभरना ही पार्टी के जनाधार को सुरक्षित रख सकता है।
दूसरी ओर, कोर टीम के कई अन्य नेताओं ने इस विलय प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए स्पष्ट असहमति दर्ज कराई। विरोध करने वाले नेताओं ने साफ शब्दों में कहा कि वे किसी भी सूरत में शरद पवार खेमे के साथ दोबारा एक होने के पक्ष में नहीं हैं। वरिष्ठ नेताओं के बीच विचारों में इस तीखे विरोधाभास के कारण तुरंत विलय करने के किसी भी कदम पर सर्वसम्मति नहीं बन पाई। इस खींचतान के बाद बैठक में यह रास्ता निकाला गया कि यदि तत्काल विलय पर एक राय नहीं है, तो आने वाले समय की राजनीतिक परिस्थितियों और नए घटनाक्रमों को परखने के बाद ही इस दिशा में कोई अंतिम फैसला लिया जाएगा।
पुराने प्रयासों की पृष्ठभूमि और अनसुलझे सवाल
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों धड़ों को एक साथ लाने की कवायद कोई बिल्कुल नई बात नहीं है। इससे पहले जब पार्टी की कमान अजीत पवार के हाथों में थी, तब भी दोनों खेमों को मिलाने के लिए गंभीर स्तर पर बातचीत आगे बढ़ी थी और उस दौर में इस समझौते के अंतिम चरण तक पहुंच जाने की बातें भी सामने आई थीं। हालांकि, अजीत पवार के निधन के बाद उपजी नई राजनीतिक परिस्थितियों ने इस समीकरण को काफी पेचीदा बना दिया है। कोर टीम की हालिया बैठक में उभरी असहमतियों ने यह साफ कर दिया है कि अतीत की तरह ही भविष्य में भी विलय का रास्ता बिल्कुल आसान नहीं होगा, भले ही आगे चलकर राजनीतिक दबाव के तहत इस विकल्प पर पुनर्विचार की गुंजाइश खुली रखी गई हो।
अमित शाह से 6 दिग्गज नेताओं की मुलाकात और वित्त विभाग की दावेदारी
विलय पर जारी आंतरिक मंथन के समानांतर महाराष्ट्र की सत्ता साझेदारी को लेकर भी एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला। दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में सुनेत्रा पवार गुट के 6 सबसे वरिष्ठ नेताओं ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से औपचारिक मुलाकात की। इस महत्वपूर्ण प्रतिनिधिमंडल में प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे, छगन भुजबल, दिलीप वाल्से पाटील, धनंजय मुंडे और हसन मुश्रीफ शामिल रहे। हालांकि इस उच्चस्तरीय बैठक से पार्टी प्रमुख सुनेत्रा पवार की गैरमौजूदगी ने सियासी हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दिया।
इस मुलाकात का मुख्य एजेंडा महाराष्ट्र सरकार में वित्त विभाग की जिम्मेदारी को दोबारा हासिल करना रहा। पूर्व में यह महत्वपूर्ण मंत्रालय अजीत पवार के पास था और वे ही राज्य के वित्त मंत्री के रूप में कामकाज संभाल रहे थे। अजीत पवार के असामयिक निधन के पश्चात महाराष्ट्र के कैबिनेट फेरबदल में इस प्रमुख महकमे को भारतीय जनता पार्टी ने अपने नियंत्रण में ले लिया था। अब सुनेत्रा पवार की पार्टी के इन 6 दिग्गज नेताओं ने केंद्रीय गृहमंत्री के समक्ष अपनी मांग रखते हुए तर्क दिया है कि गठबंधन की पूर्व व्यवस्था के आधार पर वित्त विभाग वापस उनकी पार्टी के पास ही होना चाहिए।



















