मांसाहारी भोजन के शौकीनों के बीच चिकन की लोकप्रियता हमेशा बनी रहती है, लेकिन आम तौर पर मिलने वाले ज्यादा तेल और गरिष्ठ मसालों वाले पकवानों से हटकर पारंपरिक स्वाद तलाशने वालों के लिए एक खास ठिकाना चर्चा में है। झारखंड के जमशेदपुर शहर में पारंपरिक तौर-तरीकों से पकाया जाने वाला पोड़म चिकन खानपान के प्रेमियों को खूब भा रहा है। बिष्टुपुर इलाके की प्रसिद्ध खाओ गली में शाम ढलते ही इस अनूठे पकवान की महक लोगों को अपनी ओर खींचने लगती है, जहां शाम 6 बजे से इस देसी स्वाद का लुत्फ उठाया जा सकता है।
विशाल हांसदा की ट्राइबल रसोई में देसी अंदाज
इस स्ट्रीट फूड ठिकाने को ट्राइबल रसोई नाम से पहचाना जाता है, जिसका संचालन विशाल हांसदा करते हैं। इस स्टॉल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां चिकन पकाने के लिए किसी आधुनिक उपकरण या भारी मसालों का सहारा नहीं लिया जाता, बल्कि झारखंड की सदियों पुरानी जनजातीय पाक कला का इस्तेमाल होता है। विशाल हांसदा इस पारंपरिक व्यंजन को उसकी मूल विधि के अनुसार तैयार करते हैं, जिससे इसका देसी रूप और असली जायका पूरी तरह बरकरार रहता है।
साल के पत्तों और लकड़ी की आंच पर पकाने की विधि
पोड़म चिकन बनाने की प्रक्रिया बेहद दिलचस्प और सादगी भरी है। सबसे पहले चिकन के टुकड़ों को बुनियादी मसालों के साथ मैरिनेट किया जाता है। इसके बाद इन टुकड़ों को प्राकृतिक साल के पत्तों में अच्छी तरह लपेटा जाता है। पत्तों में बंधे चिकन को फिर लकड़ी की धीमी आंच पर सेका जाता है। लकड़ी की आग और साल के पत्तों के प्राकृतिक गुणों के कारण यह चिकन करीब 15 मिनट में पककर पूरी तरह तैयार हो जाता है। पत्तों के भीतर अपनी ही भाप और रस में पकने से इसका मांस बेहद रसीला और खुशबूदार बन जाता है।
स्वाद, सेहत और परोसने का पारंपरिक तरीका
तैयार होने के बाद इस गरमा-गरम पोड़म चिकन को ताजे कटे प्याज और तीखी हरी चटनी के साथ ग्राहकों को परोसा जाता है। साल के पत्तों की सोंधी सुगंध और लकड़ी के धुएं का हल्का अहसास इसके स्वाद को साधारण चिकन करी या फ्राइड चिकन से बिल्कुल जुदा बना देता है। इसके अलावा, सेहत के लिहाज से भी यह एक बेहतर विकल्प साबित होता है। चिकन प्रोटीन का एक बढ़िया स्रोत माना जाता है, लेकिन उसकी पौष्टिकता इस बात से तय होती है कि उसे कैसे पकाया गया है। चूंकि इसमें भारी तेल और तेज मसालों का इस्तेमाल नहीं होता, इसलिए लोग बिना किसी भारीपन के इसके स्वाद का आनंद ले पाते हैं।
बजट के अनुकूल दाम और बढ़ती लोकप्रियता
इस स्वादिष्ट जनजातीय पकवान की एक और बड़ी वजह इसका किफायती होना है। ट्राइबल रसोई में महज 50 रुपये के दाम पर चिकन के 10 से 12 पीस परोसे जाते हैं। इतने कम खर्च में पौष्टिक और अनोखा चिकन मिलना छात्रों और बजट में खाने के शौकीनों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बन गया है। शाम होते ही बिष्टुपुर की खाओ गली में लगने वाली भीड़ इस बात का सबूत है कि पारंपरिक और सादा खानपान आज भी लोगों की पहली पसंद बन सकता है।



















