वैश्विक ऊर्जा बाजार एक बार फिर बड़े संकट के मुहाने पर खड़ा हो गया है, क्योंकि एक रणनीतिक पाइपलाइन को निशाना बनाए जाने के बाद पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त तेजी दर्ज की गई है। इस घटना की आधिकारिक जिम्मेदारी किसी भी समूह ने नहीं ली है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसके तार अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष से जुड़े हैं। ईरान की ओर से पहले ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर दबाव बनाया जा रहा था, ताकि वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित किया जा सके। शुरुआती दौर में कीमतों में कुछ स्थिरता जरूर आई थी, लेकिन ताजा घटनाक्रम ने हालात को फिर से अनिश्चित बना दिया है।
कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल
अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का भाव जो कुछ समय पहले 80 से 90 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में चल रहा था, वह अब उछलकर 100 डॉलर के पार निकल चुका है और 108 से 110 डॉलर के स्तर को भी छू रहा है। हालांकि घरेलू स्तर पर तेल विपणन कंपनियों ने अभी पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों में कोई बदलाव नहीं किया है, जिससे आम जनता को इसकी सीधी मार फिलहाल महसूस नहीं हो रही है, लेकिन वैश्विक पटल पर स्थिति तेजी से बदल रही है। दुनिया भर के देशों में ईंधन के दाम आसमान छूने की आशंका एक बार फिर गहरा गई है।
सऊदी अरब की लाइफलाइन पर हमला
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब सऊदी अरब की बेहद महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर हमला हुआ। यह पाइपलाइन फारस की खाड़ी के पास स्थित अबकैक के तेल भंडारों से निकलकर सऊदी अरब के रेगिस्तानी इलाके को पार करते हुए लाल सागर के तट पर स्थित यानबू बंदरगाह तक जाती है। करीब 1200 किलोमीटर लंबी इस पाइपलाइन का उपयोग इसलिए किया जाता था ताकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते को पूरी तरह बायपास करके तेल को सीधे पश्चिमी बाजारों तक पहुंचाया जा सके। जब ईरान ने होर्मुज गलियारे में अड़चनें पैदा की थीं, तब इसी पाइपलाइन के जरिए रोजाना 40 से 50 लाख बैरल तेल की आपूर्ति की जा रही थी, जबकि इसकी कुल अधिकतम क्षमता 70 लाख बैरल प्रतिदिन भेजने की है। इस मार्ग के जरिए दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का करीब 4 फीसदी हिस्सा प्रवाहित होता था।
ड्रोन हमलों से तबाह हुए पंपिंग स्टेशन
मदीना के दक्षिण-पूर्व में अल-मसाबाह क्षेत्र के पास बने एक मुख्य पंपिंग स्टेशन को ड्रोन हमलों में बुरी तरह तबाह कर दिया गया है। अंतरिक्ष से ली गई सैटेलाइट तस्वीरों में यह साफ दिखाई दे रहा है कि हमले के बाद वहां बड़े पैमाने पर आग लगी और तेल जलने के कारण आसपास की पूरी जमीन काली पड़ चुकी है। शुरुआती जानकारियों के अनुसार यह हमला इराक की दिशा से आए कई ड्रोनों द्वारा रियाद और मदीना के इलाकों में किया गया, जिससे कई पंपिंग स्टेशन जलकर खाक हो गए और कुछ लोग घायल भी हुए। सुरक्षा कारणों से सऊदी अरब को मजबूरन अपनी इस बेहद अहम पाइपलाइन का संचालन पूरी तरह रोकना पड़ा है।
क्षेत्रीय तनाव और ईरान समर्थित गुटों की भूमिका
इस ताजा हमले के पीछे किसी एक गुट का नाम सामने नहीं आया है और न ही किसी ने इसकी सीधी जिम्मेदारी स्वीकार की है, लेकिन यह घटनाक्रम पश्चिम एशिया में फैल रहे व्यापक संघर्ष का हिस्सा माना जा रहा है। यमन में सक्रिय हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर लगातार हमले किए जा रहे हैं, जबकि लेबनान में हिज़्बुल्लाह और सीरिया तथा इराक में सक्रिय कई छोटे-बड़े सशस्त्र समूहों को तेहरान का समर्थन हासिल है। रणनीतिकारों का मानना है कि ईरान के इन परोक्ष सहयोगियों के जरिए पश्चिम एशिया में तेल के तमाम रास्ते एक-एक करके संकरे होते जा रहे हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा तंत्र गंभीर खतरे में पड़ गया है।
पुरानी आशंकाओं की वापसी
फरवरी के महीने में जब संघर्ष की शुरुआत हुई थी, तब पूरी दुनिया में भारी दहशत का माहौल था कि खाड़ी देशों से होने वाली तेल सप्लाई पूरी तरह ठप हो जाएगी। हालांकि बाद में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की वैकल्पिक पाइपलाइन प्रणालियों के कारण उस झटके को काफी हद तक संभाल लिया गया था और बाजार को लगा था कि सबसे बुरा दौर बीत चुका है। लेकिन अब इस महत्वपूर्ण मार्ग के बंद हो जाने से वही पुराना खौफ और सप्लाई रुकने का डर दोबारा जीवंत हो उठा है, जिससे आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।


















