अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की चाल एक बार फिर तेज हो गई है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज जलसंधि के बंद होने की खबरों ने सप्लाई को लेकर चिंता खड़ी कर दी, और इसी झटके में सोमवार को WTI कच्चा तेल एक महीने से ज्यादा के सबसे ऊंचे स्तर पर जा पहुंचा। एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान यह चढ़कर करीब $84.40 से $84.45 के दायरे में आ गया, जो 12 जून के बाद का सबसे ऊंचा भाव है। इसी जुलाई की शुरुआत में तेल कई महीनों के निचले स्तर तक फिसल गया था, और वहां से अब तक की रिकवरी को इन ताजा घटनाओं ने और मजबूती दे दी है।
WTI यानी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट अमेरिका का बेंचमार्क क्रूड ऑयल है, और इसकी कीमत में यह उछाल किसी सामान्य कारोबारी हलचल का नतीजा नहीं है। असल वजह भू-राजनीतिक है। जब दुनिया के एक बड़े तेल गलियारे यानी होर्मुज जलसंधि के रास्ते पर सवालिया निशान लगता है, तो बाजार तुरंत मान लेता है कि आपूर्ति में रुकावट आ सकती है, और यही डर कीमतों को ऊपर धकेल देता है।
क्यों उबल रहा है कच्चा तेल
तेल की कीमत तय करने में सबसे बड़ी भूमिका मांग और आपूर्ति की होती है, ठीक बाकी किसी भी संपत्ति की तरह। दुनिया की अर्थव्यवस्था तेज दौड़ती है तो मांग बढ़ती है और तेल महंगा होता है, जबकि सुस्ती के दौर में मांग घटने से दाम गिरते हैं। लेकिन मांग-आपूर्ति के इस समीकरण को राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और प्रतिबंध पल भर में उलट सकते हैं, क्योंकि ये आपूर्ति की धारा को बाधित कर देते हैं। मौजूदा तेजी की जड़ भी यही है, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता टकराव और होर्मुज जलसंधि की बंदी।
ताजा बाजार आंकड़ों के मुताबिक फिलहाल कच्चा तेल करीब $82.63 के स्तर पर कारोबार कर रहा है, जो पिछले बंद भाव $82.49 से मामूली 0.17% ऊपर है। बीते 52 हफ्तों में इसका दायरा $54.98 से लेकर $119.48 तक रहा है, जो बताता है कि इस बाजार में उतार-चढ़ाव कितना बड़ा हो सकता है।
तकनीकी तस्वीर तेजड़ियों के साथ
चार्ट पर नजर डालें तो पलड़ा साफ तौर पर तेजी वालों के पक्ष में झुका दिखता है। पिछले हफ्ते 4 घंटे के चार्ट पर कीमत ने 200 पीरियड के सिंपल मूविंग एवरेज (SMA) को पार किया, और उसके बाद मई से जुलाई की गिरावट के 38.2% फिबोनाची रिट्रेसमेंट स्तर के ऊपर भी निकल गई। यह दोनों संकेत मिलकर खरीदारों का हौसला बढ़ाते हैं।
मोमेंटम के पैमाने भी इसी सकारात्मक सुर में हैं। रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI) मूल विश्लेषण में करीब 76 के ओवरबॉट यानी अत्यधिक खरीदारी वाले इलाके में मंडरा रहा था, वहीं मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डायवर्जेंस (MACD) पॉजिटिव जोन में बना हुआ था। इसका मतलब यह हुआ कि हालात भले ही खिंचे हुए दिखें, ऊपर की ओर दबाव बरकरार है। ताजा लाइव आंकड़ों में RSI कुछ ठंडा होकर करीब 59 पर आ गया है, जबकि MACD हिस्टोग्राम अब भी तेजी का इशारा दे रहा है, यानी रुझान अभी टूटा नहीं है।
अगर कीमत नीचे फिसलती है तो पहला सहारा 38.2% रिट्रेसमेंट यानी $81.40 पर मिलेगा। इससे ज्यादा बड़ी गिरावट आई तो नजरें 23.6% रिट्रेसमेंट के $75.91 और 200 पीरियड SMA के $76.97 पर टिकेंगी। इससे भी आगे $67.04 के आसपास का चक्रीय निचला स्तर एक दूरस्थ, मजबूत ढांचागत फर्श की तरह काम कर सकता है।
WTI है क्या और क्यों है खास
WTI अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बिकने वाले कच्चे तेल की एक किस्म है। दुनिया में क्रूड की तीन बड़ी किस्में हैं, ब्रेंट, दुबई क्रूड और WTI। इसे "लाइट" और "स्वीट" तेल कहा जाता है, क्योंकि इसका घनत्व अपेक्षाकृत कम है और सल्फर की मात्रा भी थोड़ी होती है। यही वजह है कि इसे बेहद उम्दा और आसानी से रिफाइन होने वाला तेल माना जाता है। यह अमेरिका में निकाला जाता है और कुशिंग हब के जरिए बाजार तक पहुंचता है, जिसे "दुनिया का पाइपलाइन चौराहा" कहा जाता है। WTI तेल बाजार का एक बेंचमार्क है और इसकी कीमत मीडिया में अक्सर उद्धृत होती है।
अमेरिकी डॉलर की कीमत भी WTI के भाव पर सीधा असर डालती है, क्योंकि तेल का कारोबार मुख्य रूप से डॉलर में होता है। जब डॉलर कमजोर पड़ता है तो तेल बाकी मुद्राओं वालों के लिए सस्ता हो जाता है और मांग बढ़ सकती है, जबकि मजबूत डॉलर का असर इसके उलट होता है।
इन्वेंट्री रिपोर्ट का असर
तेल के दाम को हर हफ्ते हिलाने वाला एक बड़ा कारक है भंडार यानी इन्वेंट्री की रिपोर्ट। अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) और एनर्जी इंफॉर्मेशन एजेंसी (EIA) हर हफ्ते तेल भंडार के आंकड़े जारी करते हैं। भंडार में बदलाव मांग और आपूर्ति की बदलती तस्वीर दिखाता है। अगर आंकड़ों में भंडार घटता दिखे तो इसे मांग बढ़ने का संकेत माना जाता है और कीमत ऊपर जाती है, जबकि भंडार बढ़ने का मतलब है आपूर्ति ज्यादा, जिससे दाम नीचे आते हैं। API की रिपोर्ट हर मंगलवार आती है और EIA की उसके अगले दिन। दोनों के नतीजे आमतौर पर मिलते-जुलते होते हैं, 75% मौकों पर इनमें एक दूसरे से 1% के भीतर का ही फर्क रहता है। सरकारी एजेंसी होने के कारण EIA के आंकड़ों को ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है।
ओपेक और उसका दबदबा
ओपेक यानी पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन 12 तेल उत्पादक देशों का समूह है, जो साल में दो बार होने वाली बैठकों में अपने सदस्य देशों के लिए उत्पादन का कोटा तय करता है। इनके फैसले अक्सर WTI की कीमत को हिला देते हैं। जब ओपेक कोटा घटाता है तो आपूर्ति कसती है और तेल महंगा होता है, और जब उत्पादन बढ़ाता है तो असर ठीक उल्टा होता है। ओपेक+ इसी का विस्तारित रूप है, जिसमें ओपेक से बाहर के दस और देश जुड़ते हैं, जिनमें सबसे अहम रूस है।
कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि जब तक ईरान को लेकर तनाव और होर्मुज की अनिश्चितता बनी रहेगी, तेल में तेजी का पलड़ा भारी रह सकता है। लेकिन RSI का ओवरबॉट होना यह भी याद दिलाता है कि तेजी काफी खिंच चुकी है, और किसी भी राहत या भू-राजनीतिक ठंडक पर कीमतें तेजी से नीचे के सहारों की ओर लौट सकती हैं।



















