बुधवार के एशियाई कारोबार के दौरान वैश्विक शेयर बाजारों में सकारात्मक रुझान देखने को मिला, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से क्षेत्रीय सूचकांकों को बड़ी राहत मिली। वैश्विक वित्तीय केंद्रों के निवेशकों ने ऊर्जा लागत में कमी का लाभ उठाया और साथ ही आगामी व्यापक आर्थिक नीति के संकेतों पर अपनी नजरें बनाए रखीं। प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों से जुड़े कूटनीतिक संवाद और ईंधन की घटती कीमतों ने मिलकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र के बाजारों के लिए एक अनुकूल माहौल तैयार किया। इसके साथ ही, बाजार प्रतिभागी फेडरल रिजर्व के वार्षिक जैक्सन होल सम्मेलन को लेकर सतर्क रुख अपना रहे हैं, जहां मौद्रिक नीति से जुड़ी भविष्य की दिशा तय होगी।
कच्चे तेल में नरमी और होर्मुज जलडमरूमध्य में कूटनीतिक हलचल
कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगातार तीसरे कारोबारी दिन गिरावट दर्ज की गई। एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड की कीमत 1% से अधिक टूटकर 80 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई। कच्चे तेल पर यह बिकवाली का दबाव अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं के कम होने के कारण देखने को मिल रहा है।
हाल के कूटनीतिक घटनाक्रमों ने आपूर्ति संकट की चिंताओं को शांत करने में मुख्य भूमिका निभाई है। ईरान और ओमान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही को लेकर बातचीत फिर से शुरू हो गई है। मंगलवार को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अपने ओमानी समकक्ष बद्र अल्बुसैदी से मुलाकात की। दोनों देशों के बीच इस रणनीतिक जलमार्ग से वाणिज्यिक नौकायन को सुचारू बनाने के लिए एक अंतरिम ढांचे पर चर्चा हुई। दुनिया भर के तेल परिवहन के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है, इसलिए इस क्षेत्र में शांति और सुरक्षा स्थापित करने के किसी भी प्रयास से बाजार में जोखिम प्रीमियम कम होता है।
जैक्सन होल सम्मेलन और फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति का नजरिया
ईंधन की सस्ती दरों से इक्विटी बाजारों को फौरी राहत जरूर मिली है, लेकिन दुनिया भर के निवेशकों का मुख्य ध्यान फेडरल रिजर्व के आगामी जैक्सन होल सम्मेलन पर केंद्रित है। टीडी सिक्योरिटीज के बाजार विश्लेषकों का मानना है कि शुक्रवार को होने वाला यह सम्मेलन इस सप्ताह की सबसे बड़ी आर्थिक गतिविधि है। दुनिया भर के बाजार प्रतिभागी फेड अध्यक्ष वॉर्श के तैयार वक्तव्य का इंतजार कर रहे हैं ताकि अमेरिकी मौद्रिक नीति के भावी रुख का आकलन किया जा सके।
बाजार को उम्मीद है कि फेड अध्यक्ष वॉर्श अपने संबोधन में अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं को अधिक स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करेंगे और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के अपने जनादेश के प्रति अधिक प्रतिबद्धता दिखाएंगे। हालांकि, टीडी सिक्योरिटीज के विश्लेषकों ने आगाह किया है कि इस सम्मेलन से भविष्य के लिए बहुत स्पष्ट मार्गदर्शन मिलने की संभावना कम है। बैंक के अनुसार, फेड अध्यक्ष का वक्तव्य मुख्य रूप से व्यापक आर्थिक स्थितियों और व्यवस्थागत बदलावों पर केंद्रित रह सकता है, न कि ब्याज दरों में कटौती या वृद्धि की किसी निश्चित समयसीमा पर।
इन आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर, टीडी सिक्योरिटीज का अनुमान है कि फेडरल रिजर्व निकट भविष्य में ब्याज दरों को मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखेगा। वर्ष की शेष अवधि में मुद्रास्फीति के ऊंचे स्तर पर बने रहने की संभावना और श्रम बाजार में आई स्थिरता को देखते हुए, फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) का पूरा ध्यान मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने पर रहेगा। विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यदि फेड चालू वर्ष के दौरान ब्याज दरों में कोई बदलाव करता है, तो कटौती की तुलना में दरों में बढ़ोतरी की संभावना अधिक होगी।
एशियाई शेयर बाजारों का आर्थिक ताना-बाना और प्रमुख सूचकांक
एशियाई महाद्वीप वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रमुख इंजन है, जो वैश्विक आर्थिक वृद्धि में लगभग 70% का योगदान देता है। इसके साथ ही, यह क्षेत्र दुनिया के कई प्रमुख शेयर बाजारों का केंद्र भी है। एशिया के विभिन्न देशों का बाजार प्रदर्शन वहां की औद्योगिक ताकत और आर्थिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
क्षेत्र की विकसित अर्थव्यवस्थाओं में जापान का निके 225 सूचकांक, जो टोक्यो स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध 225 प्रमुख कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है, और दक्षिण कोरिया का कोस्पी सूचकांक सबसे प्रमुख हैं। चीन और उससे जुड़े बाजारों में मुख्य रूप से तीन बड़े सूचकांक काम करते हैं: हांगकांग का हैंग सेंग, शंघाई कंपोजिट और शेनज़ेन कंपोजिट। वहीं, भारत एक उभरती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में वैश्विक निवेशकों को तेजी से आकर्षित कर रहा है, जहां निवेशक सेंसेक्स और निफ्टी सूचकांकों में शामिल कंपनियों में बड़े पैमाने पर पूंजी लगा रहे हैं।
विभिन्न एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र
एशिया के अलग-अलग देशों के बाजारों की अपनी विशिष्ट ताकतें हैं जो आर्थिक चक्रों के दौरान उनके विकास को गति देती हैं
- प्रौद्योगिकी और नवाचार: जापान, दक्षिण कोरिया और चीन के शेयर बाजारों में प्रौद्योगिकी कंपनियों का दबदबा है। ये कंपनियां सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी हैं।
- वित्तीय सेवाएं: हांगकांग और सिंगापुर अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के बड़े केंद्र हैं, जहां के बाजारों में वित्तीय संस्थान सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- विनिर्माण और उद्योग: चीन और जापान में ऑटोमोबाइल निर्माण और भारी इंजीनियरिंग उपकरण बनाने वाली विनिर्माण कंपनियों की तूती बोलती है।
- उपभोक्ता और ई-कॉमर्स क्षेत्र: भारत और चीन में तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग रिटेल, एफएमसीजी और ई-कॉमर्स से जुड़ी कंपनियों को मजबूत आधार प्रदान कर रहा है।
एशियाई बाजारों की चाल तय करने वाले मुख्य कारक
एशियाई शेयर बाजार कई घरेलू और वैश्विक कारकों से संचालित होते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण घटक कंपनियों के तिमाही और वार्षिक वित्तीय परिणाम होते हैं, जो शेयर की कीमतों का वास्तविक आधार तय करते हैं। इसके अलावा, प्रत्येक देश के बुनियादी आर्थिक आंकड़े, केंद्रीय बैंकों के मौद्रिक फैसले और सरकारों की राजकोषीय नीतियां भी निवेशकों के फैसलों को प्रभावित करती हैं।
राजनीतिक स्थिरता, कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मानक, तकनीकी प्रगति और कानून का शासन ऐसे कारक हैं जो विदेशी निवेशकों के भरोसे को बनाए रखते हैं। अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर, अमेरिकी शेयर बाजार यानी वॉल स्ट्रीट का प्रदर्शन भी एशियाई बाजारों पर सीधा असर डालता है, क्योंकि एशियाई व्यापारी अक्सर रातों-रात अमेरिकी बाजारों में हुए उतार-चढ़ाव से संकेत लेते हैं। इसके अतिरिक्त, वैश्विक बाजार का जोखिम के प्रति नजरिया भी इक्विटी मूल्यांकन को प्रभावित करता है, क्योंकि निश्चित आय वाले बॉन्ड की तुलना में शेयरों को अधिक जोखिम वाला निवेश माना जाता है।
एशियाई बाजारों में निवेश से जुड़े जोखिम और चुनौतियां
एशियाई बाजारों में विकास की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन यहां निवेश करने के साथ कुछ क्षेत्रीय जोखिम भी जुड़े हुए हैं। एशिया के देशों में राजनीतिक व्यवस्थाएं भिन्न हैं, जहां पूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से लेकर सख्त शासन प्रणालियां तक मौजूद हैं। इसके परिणामस्वरूप, कंपनियों की पारदर्शिता, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और नियमन से जुड़े मानकों में काफी अंतर देखने को मिलता है।
सीमा विवाद, व्यापारिक तनाव और भू-राजनीतिक टकराव के कारण अक्सर क्षेत्रीय शेयर बाजारों में तेज उतार-चढ़ाव आता है। इसके अलावा, प्राकृतिक आपदाएं भी बाजार की स्थिरता को प्रभावित करती हैं। विदेशी मुद्रा की विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है। स्थानीय मुद्रा के मजबूत होने से विदेशों में उत्पाद महंगे हो जाते हैं, जिससे निर्यातकों का मुनाफा घट सकता है, जबकि कमजोर मुद्रा से अंतरराष्ट्रीय बिक्री को बढ़ावा मिलता है।
विदेशी मुद्रा बाजार: पाउंड और यूरो की स्थिति
विदेशी मुद्रा बाजार में ब्रिटिश पाउंड (GBP/USD) ने सोमवार की गिरावट से उबरते हुए मंगलवार को मामूली बढ़त दर्ज की। हालांकि, अमेरिकी डॉलर पर बने बिकवाली के दबाव के बावजूद पाउंड की तेजी 1.3650 के स्तर के पास प्रतिरोध का सामना करती दिखी।
दूसरी ओर, यूरो (EUR/USD) मंगलवार को वॉल स्ट्रीट की समाप्ति के बाद 1.1670 के स्तर के आसपास मामूली बढ़त बनाने में सफल रहा। यूरो ने पिछले दो दिनों की गिरावट का सिलसिला तोड़ते हुए 1.1700 के स्तर को अपनी सीमा में बनाए रखा है। आगामी कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर अमेरिका के जुलाई महीने के पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (PCE) मुद्रास्फीति आंकड़ों और दूसरी तिमाही (Q2) के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के संशोधित आंकड़ों पर टिकी रहेगी।
सोने की कीमतों में उछाल, 15 सप्ताह के उच्च स्तर की ओर
बुधवार के एशियाई कारोबार के दौरान कीमती धातुओं में नया खरीदारी समर्थन देखने को मिला। सोने की कीमतें 4,697 डॉलर प्रति औंस के 15 सप्ताह के नए उच्चतम स्तर की ओर बढ़ती नजर आईं। इसके साथ ही सोने ने 4,650 डॉलर के स्तर से नीचे आई क्षणिक गिरावट से उबरने में सफलता पाई।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर के नरम रुख ने सोने के खरीदारों को नया बल प्रदान किया है। निवेशक जुलाई महीने के अमेरिकी कोर PCE मूल्य सूचकांक आंकड़ों के जारी होने से पहले अपने पोर्टफोलियो को फिर से संतुलित कर रहे हैं, जो फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।



















