अमेरिकी क्रूड ऑयल में बुधवार को लगभग 2 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई, जिसके बाद यह पिछले तीन महीनों के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। मध्य पूर्व के देशों में चल रहे संघर्ष के और अधिक गंभीर होने के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहने की आशंकाएं लगातार गहरी होती जा रही हैं। इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच कीमतों में यह बड़ा उछाल देखने को मिला है।
गोल्डमैन सैक्स का अनुमान और बाजार की स्थिति
जाने-माने वित्तीय संस्थान गोल्डमैन सैक्स का आकलन है कि यदि समुद्री परिवहन से जुड़ी बाधाएं और अधिक विकट होती हैं, तो कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI अमेरिकी क्रूड इस बुधवार को अपने बढ़ते रुझान को जारी रखते हुए रिपोर्ट लिखे जाने के समय 93.85 डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा था, जो उस दिन 1.77 प्रतिशत की बढ़त को दर्शाता है। मध्य पूर्व में भड़की शत्रुता के कारण आपूर्ति प्रणालियों पर पड़ने वाले असर ने कीमतों को तीन महीने के उच्च स्तर पर पहुंचा दिया है।
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव
अमेरिका और ईरान के बीच मंगलवार को हुई सीधी झड़पों के बाद से इस संघर्ष ने एक नया मोड़ ले लिया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब में तेल सुविधाओं को निशाना बनाकर इस टकराव में अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई है, जिसके जवाब में रियाद ने भी यमन के भीतर कई ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की है। इस तरह के लगातार हमलों से यह खतरा पैदा हो गया है कि यह लड़ाई पूरे क्षेत्र में फैल सकती है, जिससे तेल की कीमतों में एक बड़ा भू-राजनीतिक प्रीमियम हमेशा बना हुआ है।
हॉर्मूज जलडमरूमध्य पर मंडराता खतरा
खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास का क्षेत्र अत्यधिक तनाव की चपेट में है, जहां जहाजों पर लगातार हो रहे हमलों के कारण तेल का आवागमन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इस संघर्ष की शुरुआत से पहले, यह रणनीतिक जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता था, जिसका अर्थ है कि यहां किसी भी प्रकार की लंबी बाधा ऊर्जा बाजारों के लिए बेहद गंभीर साबित हो सकती है।
टीडी सिक्योरिटीज का दृष्टिकोण
टीडी सिक्योरिटीज के अनुसार, बाजार में संघर्ष के थमने के कोई स्पष्ट संकेत न मिलने के कारण क्रूड की कीमतों में तेजी का दौर जारी है। फर्म का यह भी मानना है कि सीमित हमलों और आर्थिक दबाव की रणनीति ऊर्जा बाजार को लगातार कड़े प्रतिबंधों की स्थिति में धकेल रही है। हालांकि कच्चे तेल के बाजार में कुछ हद तक स्थिरता देखी गई है, लेकिन नए हमलों और चीनी बाजार की बढ़ती सक्रियता के कारण भविष्य में आपूर्ति का संकट और गहरा सकता है। फर्म का कहना है कि चीनी रिफाइनिंग क्षमता का उपयोग करने से उत्पाद बाजार का दबाव कम हो सकता है, लेकिन यह स्थिति क्रूड ऑयल के मोर्चे पर दबाव को और बढ़ा देगी।
WTI क्रूड ऑयल की विशेषताएं
WTI ऑयल एक विशेष प्रकार का कच्चा क्रूड ऑयल है जो अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचा जाता है। इसका पूरा नाम वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट है, जो ब्रेंट और दुबई क्रूड के साथ तीन प्रमुख प्रकारों में से एक माना जाता है। इस तेल को 'लाइट' और 'स्वीट' भी कहा जाता है क्योंकि इसमें घनत्व और सल्फर की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। इसे एक उच्च गुणवत्ता वाला तेल माना जाता है जिसे आसानी से रिफाइन किया जा सकता है। इसकी उत्पत्ति संयुक्त राज्य अमेरिका में होती है और इसे कुशिंग हब के माध्यम से वितरित किया जाता है, जिसे दुनिया का पाइपलाइन क्रॉसरोड्स कहा जाता है।
मूल्य निर्धारण और बाजार के मुख्य चालक
किसी भी अन्य संपत्ति की तरह, आपूर्ति और मांग ही WTI क्रूड ऑयल की कीमतों के मुख्य कारक होते हैं। वैश्विक आर्थिक वृद्धि मजबूत होने पर मांग बढ़ती है और कमजोर होने पर इसमें गिरावट आती है। इसके अलावा राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और प्रतिबंध भी आपूर्ति को बाधित कर सकते हैं। प्रमुख तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक (OPEC) के निर्णय भी कीमतों को तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। चूंकि तेल का कारोबार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर की कमजोरी या मजबूती सीधे तौर पर कच्चे तेल की सामर्थ्य को प्रभावित करती है।
सूची रिपोर्ट और ओपेक की भूमिका
अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट यानी API और एनर्जी इंफॉर्मेशन एजेंसी यानी EIA द्वारा जारी की जाने वाली साप्ताहिक तेल इन्वेंट्री रिपोर्ट भी कीमतों पर सीधा प्रभाव डालती है। इन्वेंट्री में होने वाले बदलाव आपूर्ति और मांग के उतार-चढ़ाव को दर्शाते हैं। EIA के आंकड़ों को सरकार समर्थित एजेंसी होने के कारण अधिक विश्वसनीय माना जाता है। दूसरी ओर, ओपेक 12 तेल उत्पादक देशों का एक ऐसा समूह है जो साल में दो बार बैठक करके उत्पादन कोटा तय करता है। जब ओपेक कोटा घटाता है, तो आपूर्ति कम हो जाती है और कीमतें ऊपर चली जाती हैं। इस समूह में रूस जैसे गैर-ओपेक देश भी शामिल होकर ओपेक प्लस बनाते हैं।



















