कैट (CAT) परीक्षा में 99 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले और कॉर्पोरेट जगत में भारी-भरकम पैकेज पाने का विकल्प रखने वाले कर्नल अनुराग उपाध्याय ने अपनी जिंदगी का एक अलग ही रास्ता चुना। उन्होंने उस आरामदायक रास्ते को छोड़कर भारतीय सेना की स्पेशल फोर्सेज की वर्दी पहनना बेहतर समझा। उन्होंने 3 PARA (SF) में अपनी सेवाएं दीं और इसके अलावा वह 12 PARA (SF) की रेजिंग टीम का भी अहम हिस्सा रहे। मौत को करीब से देखने और कई कठिन अभियानों का हिस्सा बनने वाले इस जांबाज अधिकारी ने साल 2008 में आए दिल के दौरे जैसी गंभीर स्वास्थ्य चुनौती को भी मात दी थी और पूरी ताकत के साथ अपनी ड्यूटी पर लौट आए थे।
जिंदगी का एक कठिन मोड़ और लॉक्ड-इन सिंड्रोम
अगस्त 2025 का समय इस साहसी योद्धा के जीवन में एक बहुत ही कठिन और दर्दनाक मोड़ लेकर आया। एक गंभीर स्ट्रोक की वजह से उन्हें बेहद दुर्लभ चिकित्सीय स्थिति यानी लॉक्ड-इन सिंड्रोम का सामना करना पड़ा। इस गंभीर बीमारी और उसके बाद उपजी अन्य चिकित्सीय जटिलताओं के कारण डॉक्टरों को उनके दोनों पैरों को घुटनों के नीचे से काटना पड़ा। आज की तारीख में उनका पूरा शरीर गतिहीन और पैरालाइज्ड हो चुका है, लेकिन उनका दिमाग और उनकी चेतना आज भी उतनी ही पैनी और सतर्क है जितनी किसी सैन्य मिशन के दौरान हुआ करती थी। वह अपने आस-पास की हर चीज को पूरी तरह समझ रहे हैं और देख रहे हैं।
आंखों के इशारों से संवाद और सोशल मीडिया पर अपील
चूंकि शरीर का कोई अन्य हिस्सा काम नहीं कर रहा है, इसलिए कर्नल अनुराग अपनी आंखों की पुतलियों की हलचल और अल्फाबेट स्कैनिंग के जरिए अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचा रहे हैं। इस मुश्किल समय में उनके साथी अधिकारी कर्नल अमित कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम से देश के नाम एक भावुक और गंभीर संदेश साझा किया है। इस अपील का उद्देश्य किसी भी तरह की दया या सहानुभूति हासिल करना नहीं है, बल्कि उस उम्मीद और संभावना की तलाश करना है जो इस वीर सैनिक के जीवन को बेहतर बना सके।
किन विशेषज्ञों और तकनीकों की है तलाश
कर्नल अनुराग के स्वास्थ्य में सुधार लाने और उनकी दैनिक जीवन शैली को आसान बनाने के लिए कुछ खास क्षेत्रों के विशेषज्ञों की आवश्यकता जताई गई है। इनमें ऐसे न्यूरोलॉजिस्ट और न्यूरो-रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ शामिल हैं जो लॉक्ड-इन सिंड्रोम के मामलों को संभालने में विशेष महारत रखते हैं। इसके अलावा आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से लैस एडवांस रिहैबिलिटेशन सेंटर की भी तलाश की जा रही है। साथ ही ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI), आई-ट्रैकिंग और विभिन्न असिस्टिव तकनीकों पर काम करने वाले शोधकर्ताओं से भी संपर्क साधने की अपील की गई है ताकि उनकी संवाद करने की रफ्तार को तेज किया जा सके।



















