मध्य पूर्व में गहराते भू-राजनीतिक संकट और लगातार बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच वैश्विक वित्तीय बाजारों में भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है। इस अनिश्चितता के दौर में दुनिया भर के निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश में अमेरिकी डॉलर की तरफ तेजी से रुख कर रहे हैं, जिससे वैश्विक मुद्रा बाजार में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी मुद्रा के प्रदर्शन को मापने वाला अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) मजबूती के साथ आगे बढ़ रहा है। कारोबारी सत्र के दौरान 100.65 के निचले स्तर तक लुढ़कने के बाद, इस इंडेक्स ने शानदार वापसी की और यह 100.95 के स्तर के आसपास मजबूती से कारोबार कर रहा है। डॉलर इंडेक्स में आई यह तेज रिकवरी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक स्तर पर निवेशक जोखिम लेने से बच रहे हैं और किसी भी बड़े संकट की स्थिति में डॉलर को ही सबसे सुरक्षित पनाहगाह मान रहे हैं।
सैन्य हमले और डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी चेतावनी
वित्तीय बाजारों में इस बड़े बदलाव का मुख्य कारण अमेरिका और ईरान के बीच तेजी से बढ़ता तनाव है। स्थिति तब और ज्यादा गंभीर हो गई जब अमेरिकी सेना ने ईरान के ठिकानों पर लगातार नौवीं रात अपने सैन्य हमले जारी रखे। इन निरंतर हमलों ने पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र को एक बड़े युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिस पर दुनिया भर के देश कड़ी नजर बनाए हुए हैं। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बेहद कड़ा बयान जारी किया है। अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट लिखते हुए उन्होंने अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा को लेकर एक सख्त संदेश दिया। डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में लिखा, "हर बार जब ईरान किसी अमेरिकी सैनिक की हत्या करेगा, तो उसे उस हत्या की कई गुना भारी कीमत चुकानी होगी!" उनके इस तीखे और आक्रामक बयान ने बाजार की इस आशंका को और पुख्ता कर दिया है कि यह संकट जल्द टलने वाला नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की मांग लगातार बनी हुई है।
यमन की नौसैनिक नाकाबंदी और कच्चे तेल में उबाल
इस संघर्ष का असर केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सप्लाई चेन को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। ईरान के समर्थक माने जाने वाले यमन के अंसार अल्लाह समूह ने एक बेहद आक्रामक कदम उठाते हुए सऊदी अरब के खिलाफ तत्काल नौसैनिक नाकाबंदी की घोषणा कर दी है। इस नाकाबंदी ने क्षेत्रीय समुद्री परिवहन और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं, क्योंकि यह इलाका वैश्विक तेल व्यापार की जीवन रेखा माना जाता है। इन परस्पर विरोधी और तनावपूर्ण घटनाओं के बीच कमोडिटी बाजार, विशेषकर कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) कच्चा तेल 79.48 डॉलर के निचले स्तर तक गिरने के बाद जबरदस्त वापसी करते हुए 82 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। यह कीमत पिछले एक महीने में सबसे उच्चतम स्तर के करीब है। ऊर्जा की बढ़ती कीमतें वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा हैं, क्योंकि इससे महंगाई दर के फिर से बेकाबू होने का डर बना हुआ है, जो केंद्रीय बैंकों के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है।
कूटनीतिक प्रयास और युद्धविराम की उम्मीदें
एक तरफ जहां सैन्य हमले और आर्थिक नाकाबंदी की खबरें हावी हैं, वहीं दूसरी तरफ कूटनीतिक स्तर पर शांति वार्ता के प्रयास भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हैं। तनाव को कम करने के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ लगातार पर्दे के पीछे काम कर रहे हैं। शांति प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए मध्यस्थों ने सैन्य हमलों पर 10 दिनों के ठहराव (विराम) का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते को फिर से जीवित करने के लिए संभावनाएं तलाशना है। इस कूटनीतिक पहल ने बाजार में थोड़ी उम्मीद जगाई है, खासकर इसलिए क्योंकि दोनों देशों के अधिकारियों ने यह संकेत दिया है कि वे अभी भी बातचीत के लिए खुले हैं। शेयर बाजार और मुद्रा बाजार के कारोबारी इन कूटनीतिक संकेतों और जमीनी हकीकत के बीच सावधानी से संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
फेडरल रिजर्व की नीतियां और ब्याज दरों का अनुमान
भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के अलावा, वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा अमेरिकी केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीतियों पर भी बहुत हद तक निर्भर करती है। सीएमई फेडवॉच टूल के ताजा आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय बाजार यह मानकर चल रहे हैं कि सितंबर में होने वाली नीतिगत बैठक में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी किए जाने की 63% संभावना है। कड़े मौद्रिक फैसलों की इस प्रबल उम्मीद ने अमेरिकी डॉलर को एक मजबूत सहारा दिया है। जब ऊंचे ब्याज दरों की संभावना के साथ अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान डॉलर की बढ़ती मांग जुड़ जाती है, तो यह डॉलर इंडेक्स को एक अभेद्य मजबूती प्रदान करता है। गौरतलब है कि अगले सप्ताह होने वाले महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले से पहले फेडरल रिजर्व के अधिकारी 'ब्लैकआउट पीरियड' से गुजर रहे हैं, जिसका मतलब है कि वे मौद्रिक नीति को लेकर सार्वजनिक रूप से कोई बयान नहीं दे सकते। ऐसे में, फेड अधिकारियों की तरफ से किसी नए संकेत के अभाव में, ग्रीनबैक की चाल पूरी तरह से मध्य पूर्व में होने वाले घटनाक्रमों से ही तय होगी।
स्विस फ्रैंक की स्थिति और व्यापक मुद्रा पुनर्गठन
व्यापक मुद्रा बाजार में हो रहे इस उथल-पुथल के बीच, स्विस फ्रैंक के खिलाफ अमेरिकी डॉलर का प्रदर्शन सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला रहा है। ऐतिहासिक रूप से, स्विस फ्रैंक को दुनिया की प्रमुख सुरक्षित मुद्राओं में गिना जाता है, और जब भी यूरोप या दुनिया में कोई बड़ा संकट आता है, तो बड़े संस्थागत निवेशक इसकी ओर भागते हैं। हालांकि, आज की प्रमुख मुद्राओं के प्रतिशत परिवर्तन को दर्शाने वाले आंकड़ों से पता चलता है कि अमेरिकी डॉलर का सबसे मजबूत प्रदर्शन स्विस फ्रैंक के ही खिलाफ रहा है। यह विशिष्ट विनिमय दर गतिशीलता इस बात को रेखांकित करती है कि वर्तमान में डॉलर की मांग किस अभूतपूर्व स्तर पर है। जब भू-राजनीतिक संकट मध्य पूर्व से जुड़ा हो और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सीधे तौर पर बाधित कर रहा हो, तो अमेरिकी मुद्रा की दोहरी भूमिका सामने आती है। डॉलर केवल एक भू-राजनीतिक सुरक्षित पनाहगाह ही नहीं है, बल्कि यह वैश्विक तेल व्यापार (पेट्रोडॉलर) की प्राथमिक मुद्रा भी है। यह विशेषता इसे स्विस फ्रैंक जैसे पारंपरिक सुरक्षित विकल्पों पर एक अद्वितीय बढ़त प्रदान करती है।
मुद्रा बाजार पर असर: पाउंड और यूरो में भारी गिरावट
अमेरिकी डॉलर की बेतहाशा मजबूती का सीधा और नकारात्मक असर दुनिया की अन्य प्रमुख मुद्राओं पर पड़ा है। सप्ताह की शुरुआत में ब्रिटिश पाउंड में भारी बिकवाली का दबाव देखा गया, क्योंकि निवेशकों ने वैश्विक अनिश्चितता को देखते हुए अपना पैसा डॉलर में सुरक्षित करना बेहतर समझा। डॉलर की मजबूती के कारण GBP/USD मुद्रा जोड़ी गिरकर 1.3420 के करीब कई दिनों के निचले स्तर पर आ गई है। जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर खतरा मंडराता है, तो ब्रिटेन जैसी आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ता है। इस भारी गिरावट के बाद अब विदेशी मुद्रा बाजार की नजरें मंगलवार को जारी होने वाली यूके एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट (ब्रिटेन की रोजगार रिपोर्ट) पर टिकी हैं। इसी तरह, यूरोपीय मुद्रा यूरो भी डॉलर के दबाव से खुद को बचा नहीं पाई। EUR/USD मुद्रा जोड़ी में गिरावट का दौर जारी है और यह फिसलकर 1.1400 के स्तर की ओर आ गई है, जहां विश्लेषकों का मानना है कि इसे शुरुआती समर्थन मिल सकता है। मध्य पूर्व के संकट के कारण डॉलर की तेज शुरुआत ने अन्य सभी मुद्राओं को दबाव में रखा है। अब यूरोजोन के निवेशकों का ध्यान घरेलू आंकड़ों पर है, जिनमें यूरोलैंड और जर्मनी के लिए ज़ेडईडब्ल्यू इकोनॉमिक सेंटीमेंट के आंकड़े महत्वपूर्ण होंगे।
ब्याज दरों और संकट के बीच सोने की कीमतों में झूल
इन सभी आर्थिक और भू-राजनीतिक बदलावों का सीधा असर बहुमूल्य धातुओं के बाजार पर भी देखने को मिल रहा है। युद्ध और आर्थिक संकट के समय सोने को हमेशा एक सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन फिलहाल सोने की चाल बेहद अनिश्चित है। सप्ताह की शुरुआत में सोने ने शुक्रवार की अपनी तेजी को पलट दिया और फिलहाल यह 4,000 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर के आसपास भारी उतार-चढ़ाव के साथ कारोबार कर रहा है। सोने के बाजार को चलाने वाले कारक इस समय काफी जटिल हैं। एक तरफ जहां मध्य पूर्व में सैन्य हमलों के कारण युद्ध का बढ़ता खतरा सोने जैसी सुरक्षित धातु को समर्थन दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों की उम्मीद इसके लिए एक बड़ी बाधा बनी हुई है। ऊंची ब्याज दरें अमेरिकी डॉलर को मजबूत करती हैं, जिससे बिना ब्याज वाली संपत्ति में निवेश करना कम आकर्षक हो जाता है। इसलिए, दुनिया भर के कमोडिटी व्यापारी इस समय सोने की हर चाल पर सूक्ष्मता से नजर रखे हुए हैं।


















