भारतीय मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये का कारोबार एक सीमित दायरे में बना हुआ है, जहां घरेलू आर्थिक गतिविधियों में तेजी और नीतिगत समर्थन इसे मजबूती दे रहे हैं। ताजा कारोबारी रुझानों के बीच अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये की विनिमय दर बीते छह महीनों के 94 से 97 के दायरे के निचले छोर पर लौट आई है। घरेलू मोर्चे पर मजबूत होती आर्थिक वृद्धि और केंद्रीय बैंक की सक्रियता ने जहां स्थानीय मुद्रा को सहारा दिया है, वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची लागत अब भी चालू खाता घाटे और रुपये की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
सेवा क्षेत्र की तेजी से चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंचा समग्र सूचकांक
अक्टूबर के कारोबारी आंकड़ों से भारतीय अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में सकारात्मक रफ्तार साफ दिखाई दे रही है। एचएसबीसी प्रारंभिक समग्र पीएमआई सितंबर के 55.9 से उछलकर अक्टूबर में 56.7 पर पहुंच गया, जो बीते चार महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। इस बढ़ोतरी को मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र में आई मजबूत मांग से गति मिली है। सेवा पीएमआई सितंबर के 55.2 की तुलना में बढ़कर 56.2 दर्ज किया गया।
दूसरी ओर, विनिर्माण क्षेत्र के प्रदर्शन में मामूली नरमी देखने को मिली है, जहां विनिर्माण पीएमआई 55.1 से फिसलकर 54.9 पर आ गया, लेकिन यह स्तर अब भी स्वस्थ औद्योगिक विस्तार को दर्शाता है। विनिर्माण उत्पादन उप-सूचकांक काफी मजबूत बना हुआ है, जबकि निर्यात आर्डरों में बीते छह महीनों की सबसे तेज गति से विस्तार दर्ज किया गया है। आर्थिक गतिविधियों का यह मजबूत प्रदर्शन भारतीय रिजर्व बैंक के संशोधित सकल घरेलू उत्पाद अनुमानों से पूरी तरह मेल खाता है।
रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप और मौद्रिक नीति की रणनीति
विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में उतार-चढ़ाव को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक लगातार सक्रिय बना हुआ है। केंद्रीय बैंक द्वारा डॉलर की मांग को नियंत्रित करने के उपायों और सीधे बाजार हस्तक्षेप ने विनिमय दर को 94 से 97 के दायरे में बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है। मूल्य दबावों में आई नरमी के कारण यह संभावना बन रही है कि रिजर्व बैंक दिसंबर की बैठक में नीतिगत दरों में बढ़ोतरी रोक सकता है, हालांकि मौद्रिक रुख सख्त बने रहने के विकल्प अब भी खुले हुए हैं।
कॉमर्जबैंक के चार्ली ले के अनुसार, केंद्रीय बैंक का सख्त रुख और मजबूत घरेलू वृद्धि रुपये को सहारा दे रहे हैं, लेकिन कच्चे तेल की ऊंची कीमतें देश के आयात बिल को बढ़ाकर चालू खाता घाटे को विस्तृत कर सकती हैं। उनका मानना है कि रुपये में टिकाऊ सुधार के लिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और अधिक स्थिर पोर्टफोलियो प्रवाह आवश्यक होगा, जिसके चलते निकट अवधि में विनिमय दर के 94 से 97 के दायरे में ही कंसोलिडेट होने का अनुमान है।
वैश्विक मुद्रा बाजारों में डॉलर की कमजोरी और अन्य मुद्राओं की चाल
वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर पर दबाव देखा जा रहा है। एशियाई सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर 0.7000 के ऊपर बना रहा और नए सिरे से डॉलर की बिकवाली के बीच सोमवार को छुए गए एक महीने के उच्च स्तर के करीब कारोबार करता दिखा। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में लगातार आ रही गिरावट और कच्चे तेल की कीमतों में मामूली नरमी ने तीन सप्ताह के निचले स्तर से डॉलर की वापसी की कोशिशों को रोक दिया है। इसके साथ ही, नवंबर में रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदें ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को समर्थन दे रही हैं, हालांकि मंगलवार से शुरू हो रही अमेरिकी फेडरल ओपन मार्केट कमेटी की दो दिवसीय बैठक से पहले बढ़त सीमित नजर आ रही है।
इसी प्रकार, जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर सोमवार को नए बिकवाली दबाव में आ गया। शुक्रवार को 18 सितंबर के बाद के सबसे निचले स्तर को छूने के बाद डॉलर की रिकवरी अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट के कारण थम गई। बैंक ऑफ जापान के सख्त रुख से जापानी येन को अतिरिक्त लाभ मिल रहा है, जिससे इस मुद्रा युग्म पर दबाव बढ़ा है। हालांकि, इस सप्ताह होने वाली फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ जापान की नीतिगत बैठकों के मद्देनजर बाजार प्रतिभागी सतर्क हैं, जिससे गिरावट का दायरा सीमित बना हुआ है।
सोने में उछाल, कच्चे तेल का रुख और अमेरिकी मध्यावधि चुनाव
कमोडिटी बाजार में सोने ने तीन महीने के निचले स्तर के करीब से धीमी वापसी की है और कमजोर डॉलर के दम पर सोमवार के एशियाई सत्र में 4,000 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर कारोबार किया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ तत्काल सैन्य कार्रवाई से इनकार करने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में हल्की नरमी आई है। इसके अलावा, फेडरल रिजर्व के अधिकारियों ने तुरंत ब्याज दरें बढ़ाने की किसी जल्दबाजी का संकेत नहीं दिया है।
क्रिप्टोकरेंसी बाजार में कमजोरी जारी है, जहां कार्डानो 0.202 डॉलर से नीचे कारोबार कर रहा है। अक्टूबर की शुरुआत से लगातार तीन हफ्तों तक 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज करने के बाद बिकवाली का दबाव बढ़ता जा रहा है, जिसे कमजोर डेरिवेटिव्स आंकड़े, मंदी के ऑन-चेन संकेत और तकनीकी दृष्टिकोण का समर्थन मिल रहा है। वैश्विक वित्तीय बाजार की नजरें अब 3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों पर भी टिकी हैं। बाजार जहां दिसंबर में फेड द्वारा एक और दर वृद्धि की उम्मीद कर रहा है, वहीं अमेरिकी कांग्रेस पर नियंत्रण की लड़ाई वित्तीय नीतिगत उम्मीदों को नया आकार दे सकती है, जो परोक्ष रूप से वर्ष 2027 में अमेरिकी मौद्रिक नीति की दिशा को प्रभावित कर सकती है।





















