सांख्यिकी न्यूजीलैंड की तरफ से बुधवार को जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही यानी Q3 में न्यूजीलैंड की बेरोजगारी दर बढ़कर 5.7 प्रतिशत पर पहुंच गई है। यह आंकड़ा दूसरी तिमाही में दर्ज 5.6 प्रतिशत से अधिक है। इसके साथ ही यह बाजार के 5.5 प्रतिशत के अनुमान से भी ज्यादा रहा है, जिससे संकेत मिलता है कि देश के घरेलू श्रम बाजार में सुस्ती का दबाव बढ़ रहा है।
रोजगार के अन्य पैमानों पर भी कमजोरी देखने को मिली है। तीसरी तिमाही में न्यूजीलैंड का रोजगार परिवर्तन घटकर नकारात्मक 0.1 प्रतिशत पर आ गया, जबकि दूसरी तिमाही में इसमें 0.5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई थी। विश्लेषकों ने इस अवधि में 0.4 प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद जताई थी। इसके अलावा, देश में श्रम सहभागिता दर भी Q3 में घटकर 70.4 प्रतिशत रह गई, जो इससे पिछली तिमाही में 70.7 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इन आंकड़ों के सामने आते ही मुद्रा बाजार में न्यूजीलैंड डॉलर पर बिकवाली का असर देखा गया और NZD/USD जोड़ी 0.61 प्रतिशत की गिरावट के साथ 0.5583 के स्तर पर कारोबार करती नजर आई।
अर्थव्यवस्था और मुद्रा के मूल्यांकन में श्रम बाजार की अहमियत
किसी भी अर्थव्यवस्था की सेहत का सटीक आकलन करने के लिए श्रम बाजार की स्थितियां सबसे बुनियादी आधार मानी जाती हैं। यही वजह है कि विदेशी मुद्रा बाजार में किसी देश की मुद्रा का मूल्य तय करने में रोजगार संबंधी आंकड़े बेहद प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। जब रोजगार के अवसर अधिक होते हैं और बेरोजगारी की दर निचले स्तर पर रहती है, तो आम उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता बढ़ती है। उपभोक्ताओं द्वारा की जाने वाली यह खरीदारी आर्थिक विकास की गति को तेज करती है, जिससे स्वाभाविक रूप से स्थानीय मुद्रा की मांग और उसका मूल्य मजबूत होता है।
इसके विपरीत, जब श्रम बाजार में भारी सख्ती होती है, यानी खाली पदों को भरने के लिए कामगारों की किल्लत पैदा हो जाती है, तो इसका असर मुद्रास्फीति और मौद्रिक नीति पर भी पड़ता है। श्रमिकों की कम आपूर्ति और कंपनियों की तरफ से अधिक मांग के चलते वेतन में बढ़ोतरी होने लगती है। जब तक अर्थव्यवस्था संतुलित गति से आगे बढ़ती है, तब तक यह चक्र सकारात्मक रहता है, लेकिन सुस्ती के दौर में रोजगार में कमी आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार को मंद कर देती है।
वेतन वृद्धि की रफ्तार और केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीतियां
अर्थव्यवस्था में वेतन किस रफ्तार से बढ़ रहा है, यह नीति निर्माताओं के लिए एक निर्णायक पैमाना होता है। जब कामगारों के वेतन में तेज इजाफा होता है, तो परिवारों के पास खर्च करने के लिए अधिक नकदी उपलब्ध होती है। इस अतिरिक्त पूंजी से बाजार में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ती है, जो अंततः कीमतों में उछाल का कारण बनती है। ऊर्जा की कीमतों जैसे अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाले मुद्रास्फीति कारकों की तुलना में वेतन वृद्धि को अधिक स्थायी और बुनियादी मुद्रास्फीति का प्रमुख घटक माना जाता है, क्योंकि एक बार बढ़े हुए वेतन को कंपनियां आमतौर पर वापस नहीं घटाती हैं। इसी कारण दुनियाभर के केंद्रीय बैंक ब्याज दरों पर निर्णय लेते समय वेतन आंकड़ों पर बहुत बारीकी से नजर रखते हैं।
अलग-अलग केंद्रीय बैंक अपनी प्राथमिकताओं और कानूनी जनादेश के हिसाब से श्रम बाजार की स्थितियों को महत्व देते हैं। कुछ केंद्रीय बैंकों के पास केवल महंगाई नियंत्रित करने का ही नहीं, बल्कि रोजगार को लेकर भी स्पष्ट वैधानिक लक्ष्य होते हैं। उदाहरण के तौर पर, अमेरिकी फेडरल रिजर्व यानी फेड के पास अधिकतम रोजगार को बढ़ावा देने और स्थिर कीमतें बनाए रखने का दोहरा जनादेश है। वहीं दूसरी ओर, यूरोपीय सेंट्रल बैंक यानी ईसीबी का एकमात्र मुख्य दायित्व मुद्रास्फीति को तय सीमा के भीतर नियंत्रित रखना है। हालांकि औपचारिक जनादेश चाहे जो भी हो, सभी प्रमुख नीति निर्माताओं के लिए श्रम बाजार का स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था की दिशा समझने और महंगाई के रुझानों को मापने का सबसे महत्वपूर्ण जरिया बना रहता है।
वैश्विक मुद्रा बाजारों में उतार-चढ़ाव का दौर
वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में अन्य प्रमुख मुद्राओं में भी मंगलवार देर रात और बुधवार को हलचल देखी गई। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों की गहमागहमी के बीच ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ा। इसके साथ ही अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के संभावित कूटनीतिक समाधान की प्रगति में रुकावट आई, जब ईरान ने किसी भी समझौते के करीब पहुंचने के दावों को खारिज कर दिया। इस भू-राजनीतिक तनाव के बीच AUD/USD जोड़ी 0.44 प्रतिशत टूटकर 0.6965 के स्तर पर कारोबार करती दिखी।
उधर जापानी मुद्रा की बात करें तो मंगलवार के एशियाई सत्र में USD/JPY जोड़ी में हल्की गिरावट दर्ज की गई और यह पिछले दिन की 158.00 की बढ़त के एक हिस्से को गंवाती हुई नजर आई। कूटनीतिक उम्मीदों और अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले अमेरिकी डॉलर पर बने दबाव के चलते यह बदलाव आया। जापानी अधिकारियों द्वारा बाजार में हस्तक्षेप के जोखिमों ने जापानी येन को सहारा दिया, हालांकि बैंक ऑफ जापान द्वारा अगली ब्याज दर वृद्धि के समय को लेकर बनी अनिश्चितता ने इस बढ़त को सीमित रखा। नतीजतन, यह जोड़ी एक सीमित दायरे में फंसी रही, जिससे ट्रेडर्स को कोई भी दिशात्मक दांव लगाने से पहले सतर्क रुख अपनाने की आवश्यकता है।
कमोडिटी और क्रिप्टो संपत्तियों का ताजा रुख
कमोडिटी बाजार में सोने की कीमतों में भी मंगलवार को कमजोरी देखने को मिली। ईरान के केशम द्वीप पर अमेरिकी हमले के घटनाक्रम के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई, जिससे सोने पर दबाव बना। हाजिर सोना यानी XAU/USD लगभग 0.93 प्रतिशत की दैनिक गिरावट के साथ 3,909 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार करता दिखा। दूसरी तरफ, ऊर्जा की ऊंची कीमतों और ईरान में जारी संघर्ष ने अमेरिकी डॉलर इंडेक्स को निचले स्तरों से उबरने में मदद की, लेकिन घरेलू राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण यह इंडेक्स 102.00 के स्तर से नीचे सीमित दायरे में ही बना रहा।
क्रिप्टोकरेंसी बाजार में भी दबाव का माहौल बना हुआ है। क्रिप्टो एक्सचेंज बिटफिनेक्स के विश्लेषण के अनुसार, बिटकॉइन निकट भविष्य में 77,000 डॉलर से 80,000 डॉलर के बीच सीमित दायरे में फंसा रह सकता है। यदि बिटकॉइन में 81,300 डॉलर की तरफ कोई उछाल आता भी है, तो वहां इसे बिकवाली के भारी दबाव का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि हाजिर बाजार में मांग अभी भी कमजोर बनी हुई है। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक टकराव, राजनीतिक घटनाक्रम और केंद्रीय बैंकों की नीतियों से जुड़े सवाल तमाम परिसंपत्ति वर्गों में सतर्कता का माहौल बनाए हुए हैं।















