रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया ने अपनी जुलाई की मौद्रिक नीति बैठक के मिनट्स सार्वजनिक कर दिए हैं, जिनसे केंद्रीय बैंक के रुख का पता चलता है।
आरबीए की कार्यप्रणाली और मुख्य उद्देश्य
रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया देश के लिए ब्याज दरों का निर्धारण करने के साथ-साथ मौद्रिक नीति का संचालन भी करता है। ये फैसले गवर्नर्स के बोर्ड द्वारा साल में होने वाली 11 बैठकों के दौरान और आवश्यकता पड़ने पर बुलाई जाने वाली आपातकालीन बैठकों में लिए जाते हैं। इस बैंक का मुख्य लक्ष्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जिसका मतलब 2 से 3 प्रतिशत की दर से महंगाई को नियंत्रित रखना है। इसके साथ ही इसका उद्देश्य मुद्रा की स्थिरता, पूर्ण रोजगार और देश के नागरिकों की आर्थिक समृद्धि व कल्याण में योगदान देना भी है। इन लक्ष्यों को पाने के लिए बैंक मुख्य रूप से ब्याज दरों को घटाने या बढ़ाने का सहारा लेता है। तुलनात्मक रूप से उच्च ब्याज दरों से ऑस्ट्रेलियन डॉलर मजबूत होता है और इसके विपरीत स्थिति में मुद्रा कमजोर पड़ सकती है। इसके अलावा बैंक मात्रात्मक सहजता और कड़ाई जैसे अन्य विकल्पों का भी उपयोग करता है।
मुद्रास्फीति और विनिमय दरों का संबंध
पारंपरिक रूप से यह माना जाता रहा है कि मुद्रास्फीति किसी भी मुद्रा के लिए नकारात्मक होती है क्योंकि इससे पैसे की कुल क्रय शक्ति कम हो जाती है। हालांकि, आधुनिक दौर में सीमा पार पूंजी नियंत्रण में ढील दिए जाने के बाद स्थिति इसके बिल्कुल उलट देखने को मिली है। अब मध्यम रूप से ऊंची महंगाई दर की वजह से केंद्रीय बैंक अक्सर ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर देते हैं। इससे दुनिया भर के उन निवेशकों को आकर्षित करने में मदद मिलती है जो अपने धन को सुरक्षित और लाभदायक जगह पर निवेश करना चाहते हैं। इस प्रक्रिया से स्थानीय मुद्रा की मांग में तेजी आती है, जो ऑस्ट्रेलिया के मामले में ऑस्ट्रेलियन डॉलर है।
मैक्रोइकॉनॉमिक आंकड़े और आर्थिक सेहत
व्यापक आर्थिक आंकड़े किसी भी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का सटीक पैमाना होते हैं और इनका सीधा असर उसकी मुद्रा के मूल्य पर पड़ता है। निवेशक हमेशा सुरक्षित और तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में अपना पैसा लगाना पसंद करते हैं, न कि ऐसी जगहों पर जहां अनिश्चितता या मंदी का माहौल हो। जब बाजार में पूंजी का प्रवाह बढ़ता है, तो घरेलू मुद्रा की कुल मांग और उसका मूल्य दोनों में सुधार होता है। जीडीपी, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज पीएमआई, रोजगार आंकड़े और उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण जैसे पारंपरिक संकेतक ऑस्ट्रेलियन डॉलर को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। एक मजबूत अर्थव्यवस्था रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया को ब्याज दरों में इजाफा करने के लिए प्रेरित कर सकती है, जिससे मुद्रा को और समर्थन मिलता है।
मात्रात्मक सहजता और तरलता प्रबंधन
मात्रात्मक सहजता एक ऐसा उपाय है जिसका उपयोग उन बेहद कठिन परिस्थितियों में किया जाता है जब केवल ब्याज दरों में कटौती करना अर्थव्यवस्था में ऋण के सुचारू प्रवाह को बहाल करने के लिए नाकाफी साबित होता है। इस प्रक्रिया के तहत रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया वित्तीय संस्थानों से सरकारी या कॉर्पोरेट बॉंड खरीदने के उद्देश्य से नए ऑस्ट्रेलियन डॉलर जारी करता है, जिससे उन संस्थानों को अति आवश्यक तरलता या फंड उपलब्ध कराया जा सके। इस कदम से आमतौर पर ऑस्ट्रेलियन डॉलर पर दबाव बनता है और वह कमजोर होता है।
मात्रात्मक कड़ाई और बॉंड बाजार नीति
मात्रात्मक कड़ाई दरअसल मात्रात्मक सहजता के बिल्कुल विपरीत प्रक्रिया है। इसे तब लागू किया जाता है जब आर्थिक सुधार की प्रक्रिया पटरी पर लौट रही हो और महंगाई में तेजी आने लगे। जहां मात्रात्मक सहजता के दौरान बैंक तरलता बढ़ाने के लिए वित्तीय संस्थानों से बॉंड खरीदता है, वहीं कड़ाई के दौर में बैंक और अधिक परिसंपत्तियों की खरीद रोक देता है और अपने पास मौजूद बॉंडों की परिपक्वता पर मिलने वाले मूलधन का पुनर्निवेश करना भी बंद कर देता है। यह स्थिति ऑस्ट्रेलियन डॉलर के लिए सकारात्मक या तेजी का रुख दिखाने वाली साबित होती है।
वैश्विक वित्तीय बाजार का व्यापक परिदृश्य
विभिन्न वैश्विक मुद्राओं और परिसंपत्तियों में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर व्यापक वित्तीय बाजारों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। निवेशकों की निगाहें लगातार अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों और केंद्रीय बैंकों के आगामी बयानों पर टिकी रहती हैं, जिससे विनिमय दरों और बुलियन की चाल तय होती है। बॉंड बाजारों में नीतिगत बदलाव और तरलता समर्थन कार्यों का पैमाना भी वैश्विक निवेशकों की रणनीतियों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।



















