राजस्थान के नागौर जिले के बुटाटी धाम समेत तमाम ग्रामीण अंचलों में इस बार ग्वार की खेती से अन्नदाताओं को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन मौसम की बेरुखी ने सब कुछ चौपट कर दिया है। मानसून के शुरुआती दौर में अच्छी बारिश होने से किसानों ने बड़े पैमाने पर ग्वार की बुआई की थी। इस उम्मीद के साथ कि पैदावार अच्छी होगी, किसानों ने महंगे बीज, खाद, खेतों की जुताई, निराई-गुड़ाई और कीटनाशकों के छिड़काव में प्रति बीघा हजारों रुपये खर्च कर दिए थे। जब फसल पकने और फलियां बनने के अहम पड़ाव पर थी, तब अचानक बारिश का क्रम थम गया, जिसके चलते अब खेतों में लहलहाने वाली फसल पीली और काली पड़कर दम तोड़ रही है।
बारानी खेती और नमी की कमी से बढ़ी दुर्दशा
जिले के अधिकांश किसान पारंपरिक रूप से बारानी खेती पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं। लंबे समय से बारिश न होने के कारण खेतों की मिट्टी में मौजूद नमी पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इस नाजुक दौर में पौधों को जिस पानी और नमी की सख्त आवश्यकता थी, वह न मिलने के कारण फसल बुरी तरह कमजोर हो गई है। किसानों के पास सिंचाई के कोई पुख्ता साधन न होने के कारण वे अपनी आंखों के सामने फसल को सूखता देखने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में किसान अपनी बदकिस्मत तकदीर को कोसते हुए सिर्फ आसमान की तरफ टकटकी लगाए बारिश की आस कर रहे हैं।
शुष्क पश्चिमी हवाओं और कीटों ने किया बेहाल
बारिश के अभाव के बीच पिछले दिनों चली गर्म और शुष्क पश्चिमी हवाओं ने किसानों की कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आंचलिक भाषा में इन झुलसाने वाली हवाओं को ओकर के नाम से जाना जाता है। इन तेज और गर्म हवाओं के थपेड़ों से पौधों के तनों और पत्तियों में बची-कुची नमी भी बहुत तेजी से उड़ गई। इसके चलते पौधे के फूल मुरझाकर गिरने लगे और फलियों के विकसित होने से पहले ही पूरी फसल कमजोर पड़ गई। खेतों का हाल यह है कि पौधे ऊपर से लेकर नीचे तक झुलसे हुए नजर आ रहे हैं। इस दोहरी मार के बीच नमी न होने के कारण सफेद मक्खी और उकटा जैसे खतरनाक रोग-कीटों का प्रकोप भी तेजी से फैल रहा है, जिससे किसानों की नींद उड़ गई है।
लागत डूबने से अन्नदाता कर्ज के साये में
किसानों का दर्द है कि उन्होंने अपनी इस फसल को सींचने और बचाने में अपनी तरफ से कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। बाजार से बेहतरीन किस्म के महंगे बीज लाकर बुआई की गई, समय पर खेतों की निराई-गुड़ाई कराई गई और कीटों से बचाने के लिए कम से कम दो बार महंगी दवाइयों का छिड़काव भी किया गया। इसके बावजूद बादलों की बेरुखी ने सारी मेहनत और पूंजी पर पानी फेर दिया। किसानों का कहना है कि अगर वक्त पर बरसात हो जाती, तो ट्रैक्टर का किराया, खाद, मजदूरी और दवाइयों का खर्च तो निकल ही जाता, साथ ही परिवार के भरण-पोषण के लिए कुछ आमदनी भी हो जाती, लेकिन अब सिर्फ मायूसी हाथ लगी है।
पशुओं के लिए चारे का गंभीर संकट
इस आपदा का दायरा सिर्फ किसानों की जेब पर पड़ने वाली चोट तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पशुधन पर भी पड़ना तय माना जा रहा है। ग्वार और मूंग की फसल के अवशेषों से जो पौष्टिक चारा मिलता था, वह इस बार मिलने की कोई उम्मीद नहीं बची है। इसके कारण क्षेत्र के पशुपालकों के सामने अपने मवेशियों के वास्ते चारे और पानी का भारी संकट पैदा होने की आशंका है। किसानों की चेतावनी है कि यदि आने वाले कुछ दिनों में झमाझम बारिश नहीं हुई, तो ग्वार के कुल उत्पादन में भारी गिरावट आएगी और पूरे इलाके में सूखा या अकाल जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। फिलहाल नागौर का हर किसान अपनी किस्मत के लिए बादलों की ओर देखने को विवश है।



















