अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और कमोडिटी बाजारों में कूटनीतिक तनाव तथा आर्थिक आंकड़ों के चलते बड़ा फेरबदल देखा जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने यूक्रेन को इंटरसेप्टर मिसाइलें स्थानांतरित करने की औपचारिक मंजूरी नहीं दी है। इस महत्वपूर्ण रक्षा सौदे के रुकने से पूर्वी यूरोप में सुरक्षा संतुलन को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं, जिसका सीधा असर ऊर्जा और कमोडिटी बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने स्पष्ट किया है कि वाशिंगटन उन पैट्रियट मिसाइल प्रणालियों को भेजने में देरी कर रहा है, जिनका भुगतान पश्चिमी सहयोगी देश पहले ही पीयूआरएल व्यवस्था के तहत कर चुके हैं। यह नाटो द्वारा संचालित एक विशेष मंच है, जिसके तहत सदस्य देश यूक्रेन के लिए अमेरिका में निर्मित आधुनिक हथियारों की खरीद का वित्तपोषण करते हैं।
रक्षा समझौते में रुकावट और तेल शोधक कारखानों का समीकरण
युद्धक्षेत्र में बढ़ते दबाव के बीच कीव की ओर से एक नया कूटनीतिक प्रस्ताव सामने आया है। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने संकेत दिया है कि यदि अमेरिका मौजूदा अवधि के दौरान पैट्रियट मिसाइलें उपलब्ध कराने में मदद करता है, तो यूक्रेन रूसी तेल शोधक कारखानों पर अपने हमलों को रोकने पर विचार कर सकता है। लंबे समय से इन रिफाइनरियों पर हो रहे ड्रोन हमलों ने रूस की ईंधन आपूर्ति और वैश्विक तेल बाजार दोनों को प्रभावित किया है। मिसाइल रक्षा प्रणाली की आपूर्ति बाधित होने से यूक्रेन के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर रूस के हवाई हमलों का खतरा बढ़ गया है, जिससे रक्षा और ऊर्जा आपूर्ति के बीच नया संबंध स्थापित हो गया है।
डब्ल्यूटीआई कच्चे तेल में गिरावट और इसके बुनियादी कारक
भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच वैश्विक बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई कच्चा तेल दैनिक आधार पर 0.95 प्रतिशत टूटकर 98.00 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया। अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी कारोबार में डब्ल्यूटीआई एक प्रमुख प्रकार का कच्चा तेल है, जिसे ब्रेंट और दुबई क्रूड के साथ विश्व के तीन सबसे बड़े पैमानों में गिना जाता है। इस कच्चे तेल को बाजार की भाषा में लाइट और स्वीट कहा जाता है, क्योंकि इसमें गुरुत्वाकर्षण का स्तर अपेक्षाकृत कम होता है और सल्फर की मात्रा भी काफी कम पाई जाती है। कम सल्फर और हल्के घनत्व के कारण इसे रिफाइन करना बेहद आसान होता है, जिससे यह उच्च गुणवत्ता वाला ईंधन माना जाता है।
डब्ल्यूटीआई क्रूड का उत्पादन मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के भीतर होता है। इसका व्यापारिक और भौतिक वितरण कशिंग हब के जरिए किया जाता है, जिसे पूरी दुनिया में पाइपलाइनों का चौराहा माना जाता है। वैश्विक वित्तीय मीडिया और ऊर्जा व्यापारी कच्चे तेल की कीमतों का आकलन करने के लिए डब्ल्यूटीआई के भाव को सबसे प्रमुख संदर्भ के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
ऊर्जा बाजार के संचालक: मांग, आपूर्ति और डॉलर का प्रभाव
किसी भी वित्तीय संपत्ति की तरह डब्ल्यूटीआई कच्चे तेल की कीमत को निर्धारित करने में मांग और आपूर्ति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। जब वैश्विक आर्थिक विकास की रफ्तार तेज होती है, तब औद्योगिक और परिवहन गतिविधियों में तेजी आने से तेल की मांग में उछाल आता है। इसके विपरीत वैश्विक सुस्ती या मंदी के दौरान खपत घट जाती है, जिससे कीमतों पर दबाव बनता है। दूसरी तरफ राजनीतिक अस्थिरता, सशस्त्र संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध उत्पादन या जहाजरानी आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करके तेल की कीमतें बढ़ा देते हैं।
कच्चे तेल की कीमतों पर अमेरिकी डॉलर के मूल्य का भी गहरा असर पड़ता है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल का अधिकांश कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर के कमजोर होने पर अन्य मुद्राओं वाले खरीदारों के लिए तेल खरीदना सस्ता हो जाता है, जिससे मांग को समर्थन मिलता है। इसके उलट मजबूत डॉलर वैश्विक खरीदारों के लिए तेल को महंगा बना देता है, जिससे कीमतों में नरमी आने लगती है।
ओपेक और ओपेक प्लस की उत्पादन नीतियां
तेल निर्यातक देशों का संगठन जिसे ओपेक कहा जाता है, 12 प्रमुख तेल उत्पादक देशों का एक समूह है। यह समूह साल में दो बार आयोजित होने वाली अपनी औपचारिक बैठकों में सदस्य देशों के लिए सामूहिक उत्पादन कोटा निर्धारित करता है। जब ओपेक उत्पादन कोटे में कटौती करने का फैसला करता है, तो इससे बाजार में आपूर्ति कम हो जाती है और तेल की कीमतें तेजी से ऊपर चढ़ने लगती हैं। इसके विपरीत जब यह संगठन उत्पादन बढ़ाने का निर्णय लेता है, तो आपूर्ति बढ़ने से कीमतों में नरमी आती है।
बाजार में ओपेक प्लस की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो ओपेक के 12 सदस्यों के अलावा दस गैर-ओपेक उत्पादक देशों का एक विस्तारित मंच है। इस विस्तारित समूह में सबसे प्रमुख भागीदार रूस है। रूस और ओपेक मिलकर वैश्विक तेल आपूर्ति के बड़े हिस्से को नियंत्रित करते हैं, इसलिए उनकी समन्वित नीतियां बाजार की दिशा तय करने में निर्णायक साबित होती हैं।
साप्ताहिक इन्वेंट्री आंकड़े: एपीआई बनाम ईआईए
कच्चे तेल की कीमतों की अल्पकालिक दिशा निर्धारित करने में अमेरिकी पेट्रोलियम संस्थान यानी एपीआई और ऊर्जा सूचना एजेंसी यानी ईआईए की साप्ताहिक इन्वेंट्री रिपोर्टों की अहम भूमिका होती है। इन रिपोर्टों में अमेरिका के वाणिज्यिक तेल भंडारों में होने वाले बदलावों को दर्ज किया जाता है, जो बाजार में मांग और आपूर्ति के वास्तविक संतुलन को दर्शाते हैं। यदि इन्वेंट्री में गिरावट दर्ज की जाती है, तो इसका अर्थ है कि मांग मजबूत बनी हुई है, जिससे तेल की कीमतों को मजबूती मिलती है। वहीं भंडारों में वृद्धि अधिक आपूर्ति का संकेत देती है, जिससे कीमतें गिरती हैं।
एपीआई अपने आंकड़े प्रत्येक मंगलवार को सार्वजनिक करता है, जबकि सरकारी एजेंसी ईआईए अपनी विस्तृत रिपोर्ट अगले दिन यानी बुधवार को जारी करती है। दोनों एजेंसियों के आंकड़े लगभग 75 प्रतिशत मामलों में एक दूसरे के बेहद करीब रहते हैं और उनमें अंतर 1 प्रतिशत से भी कम होता है। हालांकि आधिकारिक सरकारी संस्था होने के कारण संस्थागत निवेशक ईआईए के आंकड़ों को अधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक मानते हैं।
मुद्रा बाजार: ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और जापानी येन की चाल
विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार दो दिनों की बढ़त दर्ज की है। जोखिम लेने की सुधरती धारणा के बीच ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा 0.50 प्रतिशत से अधिक की मजबूती के साथ 0.6980 पर कारोबार करती दिखी। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को चीन के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी और खुदरा बिक्री के मजबूत आंकड़ों से भी ठोस समर्थन मिला है, क्योंकि चीन ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
दूसरी ओर सोमवार के एशियाई कारोबारी सत्र में यूएसडी और जेपीवाई की जोड़ी 158.00 के स्तर के आसपास रक्षात्मक रुख बनाए हुए रही। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में हालिया गिरावट के चलते अमेरिकी डॉलर दो सप्ताह के निचले स्तर के करीब दबाव में रहा। इसके साथ ही मुद्रा बाजार में जापानी अधिकारियों द्वारा संभावित हस्तक्षेप के जोखिम और बैंक ऑफ जापान के गवर्नर काज़ुओ उएदा के सख्त रुख वाले बयानों ने जापानी येन को सहारा दिया। हालांकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाओं और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने डॉलर के नुकसान को सीमित रखने का काम किया है।
सोने में नरमी और संस्थागत क्रिप्टो निवेश
सुरक्षित निवेश मानी जाने वाली पीली धातु यानी सोना मंगलवार के शुरुआती एशियाई सत्र में फिसलकर लगभग 4,135 डॉलर प्रति औंस पर आ गया। ऊर्जा की कीमतों में गिरावट के बावजूद अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के ऊंचे स्तर पर टिके रहने से सोने पर बिकवाली का दबाव बढ़ा। सोना बार-बार 4,200 डॉलर के स्तर को पार करने में नाकाम रहने के बाद एक सीमित दायरे में फंसा हुआ है। व्यापारी अब अगले सप्ताह होने वाली फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक से पहले अमेरिकी ब्याज दरों के दृष्टिकोण का मूल्यांकन कर रहे हैं। इस बीच डिजिटल संपत्ति बाजार में मल्टीकॉइन कैपिटल ने अपने हेज फंड में हाइपरलिक्विड को सबसे बड़ी होल्डिंग घोषित किया है, जिससे यह साफ होता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई में बढ़ती दिलचस्पी के बावजूद प्रमुख निवेशक क्रिप्टो परिसंपत्तियों पर अपना भरोसा बनाए हुए हैं।





















