बीएनपी पारिबा ने एक महत्वपूर्ण विश्लेषण साझा किया है जिसमें बताया गया है कि किस तरह चीन से आने वाले सस्ते उत्पाद यूरो क्षेत्र के लिए एक बड़े 'डिफ्लेशनरी' (महंगाई कम करने वाले) प्रभाव के रूप में काम कर रहे हैं। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, यूरो क्षेत्र के कुल आयात का 16.9 प्रतिशत हिस्सा चीन से आता है। इस निर्भरता के कारण, चीन की किसी भी मूल्य रणनीति का सीधा असर यूरोपीय उपभोक्ता कीमतों पर पड़ना तय है।
चीन की बाजार रणनीति और यूरो का असर
बीएनपी पारिबा का अनुमान है कि यदि चीन अपने आयातित उत्पादों की कीमतों में 10 प्रतिशत की कटौती करता है, तो इसका सीधा असर यूरो क्षेत्र की 'हेडलाइन' महंगाई दर पर पड़ेगा। यह गिरावट लगभग 0.3 प्रतिशत अंकों की हो सकती है। यह निष्कर्ष यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) के हालिया शोध के अनुरूप है, जो यह दर्शाता है कि चीन लगातार अपनी वैश्विक बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए आक्रामक मूल्य निर्धारण की नीति अपना रहा है।
क्यों रसायनों जैसे क्षेत्रों में खतरा अधिक है?
चीनी बाजार में मौजूद 'ओवरकैपेसिटी' यानी जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता का खामियाजा यूरोप को भुगतना पड़ रहा है। हाल के महीनों में चीन से आने वाले सामान की कीमतों में गिरावट की रफ्तार और तेज हुई है। विशेष रूप से रसायन (केमिकल्स) जैसे क्षेत्रों में, जहां चीनी उत्पादन क्षमता सबसे ज्यादा बढ़ी है, वहां की कीमतें तेजी से गिर रही हैं, जो सीधे तौर पर यूरोप के आयातित महंगाई आंकड़ों को नीचे की तरफ धकेल रही हैं।
यूरोपीय मौद्रिक नीति के लिए चुनौती
यूरोप के लिए यह डिफ्लेशन का आयात कोई नई घटना नहीं है, लेकिन यह लंबे समय से चिंता का विषय बना हुआ है। चूंकि यूरो क्षेत्र अपनी आपूर्ति के लिए चीन पर काफी अधिक निर्भर है, इसलिए वहां की कीमतों में होने वाली हर हलचल यूरो क्षेत्र के मुद्रास्फीति चक्र को अस्थिर करती है। अप्रैल के आंकड़ों में देखा गया था कि यूरो क्षेत्र का 16.9 प्रतिशत आयात चीन से था, जो इस आर्थिक संबंध की गहराई को दर्शाता है।
वैश्विक बाजार और भू-राजनीतिक चिंताएं
मौजूदा समय में वित्तीय बाजारों में हलचल सिर्फ चीन तक सीमित नहीं है। मध्य पूर्व में पैदा हुए ताजा तनाव ने निवेशकों में बेचैनी बढ़ा दी है। इस अनिश्चितता के कारण 'सेफ हेवन' माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर की मांग में उछाल आया है, जिसका असर EUR/USD जैसी मुद्राओं पर पड़ रहा है। यह जोड़ी फिलहाल 1.1400 के निचले स्तर के आसपास कारोबार कर रही है।
सोने और मुद्राओं का प्रदर्शन
कच्चा तेल और सोने जैसी धातुओं पर भी इन भू-राजनीतिक घटनाओं का असर स्पष्ट है। सोना, जो सोमवार की गिरावट के बाद थोड़ा संभला था, मंगलवार को 4,100 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के आसपास रहा। हालांकि, मुद्रास्फीति को लेकर दोबारा पैदा हुई चिंताओं ने सोने की रिकवरी को सीमित कर दिया है।
सेंट्रल बैंक और भविष्य की गाइडेंस
एक बड़ी वैश्विक चुनौती यह भी है कि सेंट्रल बैंक अब भविष्य की दिशा बताने (फॉरवर्ड गाइडेंस) से पीछे हट रहे हैं। फेडरल रिजर्व, यूरोपीय सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ इंग्लैंड जैसे बड़े संस्थान अब बहुत कम जानकारी साझा करने की नीति अपना रहे हैं, जिससे निवेशकों के लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है कि आने वाले समय में आर्थिक कदम क्या होंगे। बुधवार को आने वाले FOMC मिनट्स पर अब सबकी नजरें टिकी हुई हैं।











